अध्याय 1 / 12
वसीयत का वार
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
लखनऊ की राजवंश हवेली में पचास साल का जश्न है, और पूरा शहर छोटे देवर कुनाल को ख़ानदान बचाने का सेहरा पहना रहा है, जबकि असल में हर सौदा बड़ी बहू चर्वी ने चुपचाप बंद किया है। सास इंदुमती उसे नौकरानी की तरह हुक्म देती है, पति रणबीर से रिश्ता दस साल पुरानी बर्फ़ है, और बीच में सिर्फ़ नन्ही मिष्टी की हँसी बची है। उसी रात बूढ़े बाऊजी चल बसते हैं, और वसीयत के पढ़े जाने पर, कुनाल का ताज पक्का मान बैठे परिवार के सामने, वकील सेठी वो नाम पढ़ते हैं जो किसी ने सोचा भी नहीं था, चर्वी।
आतिशबाज़ी आसमान में फटी, और पूरे लखनऊ ने एक साथ सिर उठा कर देखा।
राजवंश ग्रुप के पचास साल। शहर का हर बड़ा नाम आज रात इसी हवेली के लॉन पर था, हाथों में शरबत के गिलास, होंठों पर एक ही नाम।
कुनाल। कुनाल राजवंश। वो चमकीला छोटा बेटा, जिसने कथित तौर पर डूबते ख़ानदान को अकेले अपने कंधों पर उठा लिया था। और आज रात, मंच पर, चाँदी के माइक के पीछे, वो अपनी कहानी ख़ुद सुना रहा था।
"दस साल पहले लोग कहते थे राजवंश डूब जाएगा। ... और आज? आज राजवंश के नाम का अचार हर घर की रसोई में है, हर थाली में है।"
तालियाँ लॉन में गूँज उठीं।
"लोग पूछते हैं, कुनाल, ये चमत्कार कैसे किया? मैं कहता हूँ... बस मेहनत। और थोड़ी सी हिम्मत।"
फिर वो एक पल को रुका। किसी ने पीछे से पूछ लिया था, पिछली तिमाही का मुनाफ़ा कितना रहा। कुनाल की मुस्कान एक पल को काँपी। उसे नंबर याद नहीं था। उसे नंबर कभी याद नहीं रहते थे।
तभी उसकी जेब में फ़ोन थरथराया। उसने चोर नज़र से स्क्रीन की तरफ़ देखा। एक मैसेज। भेजने वाली का नाम लिखा था, भाभी।
"बाईस करोड़, सैंतालीस लाख। पिछले साल से इकतीस फ़ीसदी ज़्यादा। ये हैं राजवंश के नंबर, दोस्तो।"
फिर तालियाँ बजीं। कुनाल ने हाथ हिलाया, जैसे वो हर नंबर उसने ख़ुद अपने पसीने से कमाया हो।
और लॉन के दूसरे कोने में, बत्तियों की रौशनी से दूर, एक औरत खड़ी थी। सीधी-सादी सूती साड़ी, कानों में छोटे से झुमके, हाथ में वही फ़ोन जिससे अभी अभी वो मैसेज गया था।
चर्वी राजवंश। इस घर की बड़ी बहू।
जिस सौदे के नंबर कुनाल अभी मंच पर पढ़ रहा था, वो सौदा चर्वी ने कल रात दो बजे बंद किया था। अकेले, अपने कमरे की मद्धम रौशनी में, जब पूरा घर सो रहा था। किसी को नहीं पता था। और सच कहें, तो किसी को जानना भी नहीं था।
तभी एक तेज़, रौबदार आवाज़ पास आई।
"चर्वी। यहाँ खम्भे की तरह खड़ी क्या कर रही हो?"
इंदुमती राजवंश। इस हवेली की मालकिन। कुनाल और रणबीर की माँ, और चर्वी की सास।
"मेहमानों के गिलास ख़ाली पड़े हैं, रसोई में हलवाई गड़बड़ कर रहा है, और तुम्हें फ़ोन से फ़ुरसत नहीं। बहू हो तुम, कोई मेहमान नहीं। जाओ, जा कर देखो।"
"जी, माँजी। ... अभी देखती हूँ।"
आवाज़ में रत्ती भर शिकायत नहीं। वही नरम, झुकी हुई बहू, जिसे ये घर दस साल से हुक्म देता आया था।
"और हाँ..." इंदुमती ने मंच की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो गर्व उतर आया जो चर्वी के लिए कभी नहीं आया था। "मेरे कुनाल के लिए गरम जलेबी भिजवाना, ख़ास तौर से। मेरे बेटे ने आज पूरे शहर के सामने इस ख़ानदान का सिर ऊँचा कर दिया।"
"जी, माँजी।"
चर्वी ने सिर झुका लिया। उसने वो नंबर नहीं गिनाए जो उसने कमाए थे। उसने वो रातें नहीं गिनाईं जो उसने जागी थीं। उसने बस अपना पल्लू ठीक किया, और चुपचाप रसोई की तरफ़ चल दी।
क्योंकि इस घर में तालियाँ हमेशा कुनाल के हिस्से आती थीं। ... और काम, हमेशा चर्वी के।
रसोई के पास, अँधेरे गलियारे में, चर्वी एक पल को रुकी। जेब से फ़ोन निकाला, कान से लगाया। और जब वो बोली, तो उसकी आवाज़ बदल चुकी थी।
"मिस्टर वर्मा, सिंगापुर वाली किश्त सुबह नौ बजे से पहले ट्रांसफ़र होनी चाहिए। ब्याज की शर्त वही रहेगी जो मैंने कल रात तय की थी। एक पैसा ऊपर नहीं। और हाँ, ये बातचीत सिर्फ़ मेरे और आपके बीच है। राजवंश की तरफ़ से जो भी बोला जाएगा, वो कुनाल सर बोलेंगे।"
वही औरत। एक मिनट पहले 'जी, माँजी' कहती नरम बहू, और अब, इस अँधेरे कोने में, वो सर्द, सधी हुई रणनीतिकार जिसके एक इशारे पर करोड़ों इधर से उधर हो जाते थे। ... दो आवाज़ें, एक ही गले में। और घर सिर्फ़ पहली वाली को पहचानता था।
रात गहरा गई। मेहमान चले गए, बत्तियाँ बुझ गईं, और हवेली फिर उसी पुरानी ख़ामोशी में लौट आई।
ऊपर की मंज़िल पर, गलियारे के एक सिरे पर एक कमरा था जिसमें रणबीर राजवंश की बत्ती अब भी जल रही थी। और दूसरे सिरे पर एक कमरा, जहाँ चर्वी रहती थी। बीच में एक लंबा, ख़ामोश गलियारा, और उससे भी लंबी दस साल की चुप्पी। पति और पत्नी। एक ही छत के नीचे, दो अजनबियों की तरह।
तभी गलियारे में एक दरवाज़ा खुला। रणबीर बाहर निकला, हाथ में कुछ फ़ाइलें। उसकी और चर्वी की नज़रें एक पल को टकराईं। दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। बस एक हल्की सी गर्दन झुकी, एक औपचारिक सा 'गुड नाइट', और रणबीर मुँह फेर कर दूसरी तरफ़ चल दिया। दस साल से उनकी हर मुलाक़ात इसी सर्द फ़ासले पर आ कर दम तोड़ देती थी।
पर उस ठंडी हवेली में एक कमरा ऐसा भी था जहाँ अब भी हँसी बची थी।
"मम्मा, आज कुनाल चाचू को इतनी सारी तालियाँ क्यों मिलीं?"
आठ साल की मिष्टी। चर्वी की बेटी, रज़ाई के अंदर से बस आँखें निकाले।
"क्योंकि चाचू ने मंच पर अच्छी-अच्छी बातें कीं, बेटा। ... अब सो जाओ।"
"पर काम तो आप करती हो न। मैंने देखा है। रात को आप जागती हो, नंबर लिखती हो, फ़ोन पर बातें करती हो। चाचू तो बस बोलते हैं।"
चर्वी का हाथ एक पल को मिष्टी के बालों में रुक गया।
"बच्चे इतना नहीं सोचते, मिष्टी। जिसे जो अच्छा लगता है, वो वही करता है। मुझे नंबर अच्छे लगते हैं। चाचू को तालियाँ।"
"मम्मा... पापा हमारे साथ खाना क्यों नहीं खाते?"
इस बार चर्वी के पास तुरंत कोई जवाब नहीं आया।
"पापा बहुत थक जाते हैं, बेटा। ... चलो, आँखें बंद करो।"
"और वो ऊपर वाला बंद कमरा? जिसकी चाबी किसी के पास नहीं है? दादी कहती हैं उसमें कभी मत जाना।"
चर्वी की उँगलियाँ मिष्टी के बालों में जम गईं। ऊपर की मंज़िल पर, गलियारे के अंधेरे कोने में, एक दरवाज़ा था जो दस साल से बंद था। उस पर एक ताला था, और ताले पर धूल, और धूल के नीचे एक ऐसा ग़म जिसे इस घर ने ज़िंदा दफ़ना दिया था।
"वो बस एक पुराना कमरा है, मिष्टी। ... उसमें कुछ नहीं है। सो जाओ अब।"
मिष्टी की आँखें मुँदने लगीं। चर्वी बहुत देर तक वहीं बैठी रही, अपनी बेटी की साँसें गिनती हुई, उस इकलौती गर्माहट को थामे जो इस बर्फ़ जैसे घर में अब भी बाक़ी थी।
उसी रात, जब चर्वी अपने कमरे की तरफ़ लौट रही थी, गलियारे के दूसरे छोर से एक कमज़ोर सी आवाज़ आई।
"बहू... चर्वी बेटा, ज़रा इधर आना।"
बाऊजी। यशवंत राजवंश। इस ख़ानदान के मुखिया, अब सत्तर के, बीमारी से झुके हुए, पर आँखों में वही पुरानी चमक बाक़ी थी।
चर्वी उनके कमरे में गई। बाऊजी बिस्तर पर तकिये के सहारे बैठे थे, हाथ में एक पुरानी, धुँधली सी तस्वीर।
"इतनी रात तक जागे हुए हैं, बाऊजी? दवाई का वक़्त कब का निकल गया। लाइए, मैं देती हूँ।"
"दवाई रहने दे, बेटा। ... आज बस बात करने दे। बहुत बरसों से एक बात सीने पर पत्थर बनी पड़ी है।"
उन्होंने चर्वी का हाथ अपने काँपते हाथों में ले लिया।
"दस साल पहले, जब ये घर डूब रहा था, तो मैंने तुझसे एक वादा माँगा था। चुप रहने का। अपना नाम छुपाने का। अपनी सारी मेहनत किसी और के नाम कर देने का।"
"बाऊजी, ये पुरानी बातें अब..."
"सुन तो सही, बेटा। ... एक बाप को अपनी बेटी के कंधों पर अपने घर के पाप नहीं लादने चाहिए। और मैंने लादे। दस साल तक तूने वो बोझ चुपचाप ढोया। बिना नाम, बिना शिकायत। और मैं... मैं बस देखता रहा।"
चर्वी कुछ नहीं बोली। कुछ ज़ख़्म इतने गहरे होते हैं कि उन पर लफ़्ज़ नहीं ठहरते।
"पर अब और नहीं। मैंने आख़िरकार हिसाब बराबर कर दिया है, चर्वी। जो तेरा था, वो अब तुझे मिलेगा। और इस बार इस घर का कोई भी तुझसे तेरा हक़ नहीं छीन पाएगा।"
"बाऊजी, आप थके हुए हैं। ... ये सब कल बात करते हैं। अभी आराम कीजिए।"
"बस एक बात याद रखना, बेटा। ... इस घर में सबसे ऊँचा सिर तेरा है। इसलिए नहीं कि तू सबसे ऊपर है, बल्कि इसलिए कि तूने सबसे ज़्यादा झुक कर सबको उठाया है। भगवान तुझे वो सब लौटा दे, जो इस घर ने तुझसे छीना।"
चर्वी की आँखें भर आईं। दस साल में पहली बार, इस घर में किसी ने उसका शुक्रिया कहा था। उसने झुक कर बाऊजी का माथा चूमा, उनकी रज़ाई ठीक की, और सिरहाने की बत्ती बुझा दी।
"सो जाइए, बाऊजी। ... सुबह चाय के साथ इत्मीनान से बात करेंगे।"
पर वो सुबह कभी नहीं आई।
उस रात, नींद में, यशवंत राजवंश ने आख़िरी साँस ली। चुपचाप, बिल्कुल वैसे ही जैसे वो जीये थे। हाथ में अब भी वही पुरानी तस्वीर थमी हुई।
सुबह हवेली रोने की आवाज़ों से जागी। इंदुमती का विलाप दीवारों से टकराया। कुनाल बुत बना खड़ा रह गया। और चर्वी... चर्वी ने चुपचाप हर रस्म सँभाली। हर मेहमान, हर आँसू, हर इंतज़ाम, जैसे वो हमेशा सँभालती आई थी।
पर इस पूरे घर में एक ही इंसान था जो उसका सच जानता था। और अब वो भी चला गया था। चर्वी को लगा, जैसे उसका आख़िरी गवाह उसे अकेला छोड़ कर चला गया हो।
तेरहवीं बीत गई। और उसके ठीक अगले दिन, वकील साहब की सफ़ेद गाड़ी हवेली के फाटक पर आ कर रुकी।
बैठक का कमरा भरा हुआ था। इंदुमती बीचोंबीच, सिर ऊँचा, चेहरे पर वो यक़ीन जो सिर्फ़ ताक़त देती है। उसके ठीक बगल में कुनाल, पैर पर पैर चढ़ाए, जैसे ताज पहनने से पहले की बस एक औपचारिकता का इंतज़ार कर रहा हो।
और एक कोने में चर्वी। वही सादी साड़ी, वही झुकी नज़र। किसी ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।
वकील सेठी ने अपना चश्मा ठीक किया और मेज़ पर एक मोहरबंद लिफ़ाफ़ा रखा।
"शुरू कीजिए, वकील साहब। ज़्यादा वक़्त मत लगाइए। इस घर का वारिस कौन है, ये सब जानते हैं। बस काग़ज़ी कार्रवाई बाक़ी है।"
"माँ ठीक कहती हैं। बाऊजी अच्छी तरह जानते थे कि ग्रुप किसके हाथों में सुरक्षित है। पढ़िए, वकील साहब।"
सेठी ने एक पल को चर्वी की तरफ़ देखा। फिर मोहर तोड़ी, काग़ज़ खोला, और यशवंत राजवंश की आख़िरी इच्छा पढ़नी शुरू की।
पहले छोटे हिस्से। हवेली, ज़मीन, गहने, बैंक के खाते। पूरा कमरा एक ही नाम के इंतज़ार में साँस रोके बैठा था। कुनाल।
फिर सेठी एक पल को रुके। उन्होंने चश्मे के ऊपर से पूरे कमरे पर एक नज़र दौड़ाई। और फिर उन्होंने वो लाइन पढ़ी, जिसने उस कमरे की हवा जमा दी।
"मैं, यशवंत राजवंश, अपने पूरे कारोबार की, राजवंश ग्रुप की सम्पूर्ण बागडोर, अपने बेटों को नहीं सौंपता। ... मैं उसे सौंपता हूँ, जिसने पिछले दस साल से इस घर को, और इस डूबते कारोबार को, सच में चलाया है। बिना नाम के। बिना पहचान के। बिना एक शब्द शुक्रिया के।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इंदुमती की मुस्कान चेहरे पर ही जम गई। कुनाल आगे झुक आया, जैसे उसने कुछ ग़लत सुन लिया हो।
"क्या मतलब है इसका? ... नाम पढ़िए, वकील साहब। साफ़-साफ़ बताइए, किसका नाम है इस वसीयत में?"
सेठी ने काग़ज़ से नज़र उठाई। और उस कमरे में, जहाँ हर कोई कुनाल का नाम सुनने बैठा था, एक बिल्कुल दूसरा नाम गूँजा। वो नाम, जिसे इस घर ने दस साल तक सिर्फ़ 'बड़ी बहू' कह कर पुकारा था।
"चर्वी। ... चर्वी राजवंश।"
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