Chapter 9 of 12
टूटा घर
शेखर की दग़ा की ठंडी गिनती के बाद जंग बोर्डरूम से निकल कर हवेली की सीढ़ियाँ चढ़ जाती है, और दादी की बातों से डरी हुई नन्ही मिष्टी अपनी ज़िद से, बरसों बाद, अपने माँ-बाप को एक ही कमरे में ले आती है। उसी रात चर्वी और रणबीर की दस साल में पहली सच्ची बात होती है, जहाँ उस खोए हुए बेटे का ग़म किनारों पर उभर आता है और दोनों उस एक रात की अपनी-अपनी अलग कहानी थामे रह जाते हैं, जबकि अपनी माँ की खुली बेरहमी और चर्वी की बरसों की ख़ामोश सफ़ाई देख कर रणबीर के यक़ीन में पहली दरार पड़ती है। आख़िर में सोई हुई मिष्टी के सिरहाने रणबीर पिघल कर वो बात कहने ही वाला होता है जो शायद इस टूटे घर को जोड़ देती, तभी दरवाज़े
मेज़ पर वो दग़ाबाज़ गिनती अब भी पड़ी थी, काली स्याही में इंदुमती का नाम, और उसके नीचे शेखर का टूटा हुआ वादा। ... बोर्ड की उस हार को चर्वी पत्थर बन कर पी चुकी थी। ... दिन भर हवेली में एक अजीब, जमा हुआ सन्नाटा पसरा रहा। ... खाने की मेज़ पर शेखर ने एक बार भी नज़र नहीं उठाई, बस अपनी थाली के निवाले गिनता रहा, और किरती की कमर पर बँधी चाबियाँ उस चुप्पी में कुछ ज़्यादा ही खनकती रहीं। ... पर उस रात, हवेली की जंग बोर्डरूम से निकल कर सीढ़ियाँ चढ़ आई, दो चोटियों वाले एक नन्हे तूफ़ान की शक्ल में, और सीधे चर्वी के कमरे में आ धमकी।
"मुम्मा! ... आप सच बताओ, दादी झूठ बोलती हैं या सच? ... आज प्रिया कह रही थी कि उसकी मम्मी कह रही थीं, कि आप इस घर का पैसा चुरा कर जेल चली जाओगी। ... मैंने उसकी गुड़िया की चोटी खींच दी और कट्टी कर ली। ... पर मुम्मा, आप जेल नहीं जाओगी न?"
और चर्वी के भीतर, जो पत्थर दस साल के तानों से नहीं पिघला था, वो एक बच्ची के इस सवाल पर दरकने लगा। ... बोर्ड की हार वो पी सकती थी। ... पर बेटी की आँखों में उतरा ये डर, ये उससे नहीं पिया जा रहा था।
"इधर आ, मेरी बच्ची। ... सुन। ... तेरी मुम्मा ने इस घर से आज तक एक सुई तक नहीं चुराई। ... बल्कि जो कुछ था, वो सब इसी घर को देती आई है। ... और जेल तो चोर जाते हैं, बेटा। ... तेरी मुम्मा तो इस पूरे राजवंश की मालकिन है। ... दादी को बस थोड़ा वक़्त लगेगा, इस बात को मानने में।"
"पक्का? ... तो क़सम खाओ। ... मिष्टी की क़सम। ... और सुनो, अगर आप सच में मालकिन हो, तो प्रिया की मम्मी से कह दो न, कि झूठ बोलना बंद करें। ... मालकिन का तो सबको कहना मानना पड़ता है।"
"काश, बेटा। ... काश इस घर में भी कोई मालकिन का कहना मानता। ... ले। ... तेरी क़सम। ... तेरी मुम्मा कहीं नहीं जा रही। ... न जेल, न कहीं और। ... अब बोल, और क्या हुक्म है मालकिन की मालकिन का?"
"तो फिर दादी आपसे इतना ग़ुस्सा क्यों हैं? ... और पापा? ... पापा तो कुछ बोलते ही नहीं, न आपकी तरफ़, न दादी की तरफ़। ... मुम्मा, पापा रोज़ रात अलग कमरे में क्यों सोते हैं? ... मेरी सारी सहेलियों के मम्मी-पापा एक ही कमरे में सोते हैं।"
दस साल से इस घर के बड़े-बड़े लोग इस सवाल के इर्द-गिर्द दबे पाँव चलते आए थे। ... और आज आठ साल की मिष्टी ने उसे सीधे, बिना किसी डर के, बीचों-बीच रख दिया। ... चर्वी के पास इसका कोई ऐसा जवाब नहीं था, जो एक बच्ची को दिया जा सके।
"बड़ों की बातें हैं, मिष्टी। ... कभी-कभी दो लोग एक ही घर में रहते हुए भी थोड़ा दूर हो जाते हैं। ... पर इसका ये मतलब नहीं कि..."
"मुझे ये सब नहीं पता। ... मुझे बस इतना पता है कि आज रात मुझे अकेले नींद नहीं आएगी। ... मुझे डर लगता है, मुम्मा, दादी कहती हैं आप एक दिन चली जाओगी। ... आज आप भी मेरे कमरे में सोओगी, और पापा भी, दोनों। ... वरना मैं सारी रात नहीं सोऊँगी। ... बस, कह दिया।"
और वहीं, अनजाने में, उस नन्ही बच्ची ने वो कर दिखाया जो दस साल में कोई वसीयत, कोई रिश्तेदार, कोई त्योहार नहीं कर पाया था। ... उसने अपने माँ-बाप को, बरसों बाद, एक ही कमरे में आने पर मजबूर कर दिया।
बाहर, बोर्ड की जंग एक पल को नहीं रुकी थी। ... सुधा अब भी वो झूठे नंबरों वाली फ़ाइल कुनाल तक पहुँचा रही थी, फाटक पर सूर्यवंशी के सुनहरे सूरज की परछाईं अब भी मँडरा रही थी, और मेज़ पर वो झुका हुआ काँटा अब भी उसके ख़िलाफ़ था। ... पर आज रात चर्वी ने तय किया कि वो एक और मोर्चा सँभालेगी, वो जो बरसों से बंद पड़ा था। ... अपना घर। ... अपना टूटा हुआ ब्याह।
उस रात, बरसों बाद, चर्वी रणबीर के कमरे के दरवाज़े पर आ खड़ी हुई। ... एक ही छत, एक ही गलियारा, पर इन दो दरवाज़ों के बीच दस साल की बर्फ़ जमी थी। ... उसने हाथ उठाया, एक पल झिझकी, फिर धीरे से दस्तक दी।
"चर्वी? ... तुम? ... इतनी रात। ... सब ठीक तो है? ... मिष्टी को कुछ..."
"मिष्टी ठीक है। ... बस डरी हुई है। ... उसने ज़िद पकड़ ली है कि आज रात हम दोनों उसके कमरे में सोएँगे, दोनों। ... मैं मना कर सकती थी, पर वो पूरी रात नहीं सोती। ... तुम्हें आना होगा, रणबीर। ... सिर्फ़ उसके लिए।"
रणबीर ने एक पल अपनी पत्नी को देखा। ... वही चेहरा, जिसे वो रोज़ खाने की मेज़ पर देखता था, और कभी नहीं देखता था। ... आज पहली बार उसे लगा कि उस चेहरे पर थकान की एक ऐसी परत है, जो एक रात की नहीं, बरसों की है।
"ठीक है। ... आता हूँ। ... वो आजकल बहुत सहमी रहती है न। ... कल भी पूछ रही थी कि क्या ये घर टूट जाएगा। ... और आज शाम खाने पर शेखर की आँखें देखीं तुमने? ... वो किसी से नज़र नहीं मिला पा रहा था। ... इस घर में कुछ ठीक नहीं चल रहा, चर्वी। ... और मुझे लगने लगा है कि मैं बहुत कुछ देख ही नहीं रहा था।"
"चर्वी... रुको। ... एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आज सुबह माँ ने भरे कमरे में तुमसे चाबियाँ वापस माँगीं, किरती के सामने। ... और ये शेखर वाले वोट की बात। ... सब कह रहे हैं कि तुमने कुर्सी के लालच में बाऊजी को बहका कर वसीयत लिखवाई। ... पर मैं दस दिन से देख रहा हूँ, चर्वी। ... तुमने एक बार भी पलट कर जवाब नहीं दिया, एक बार भी सफ़ाई नहीं दी। ... कोई सच में चोर हो, तो वो चीख़-चीख़ कर ख़ुद को बेगुनाह नहीं बताता क्या?"
और चर्वी के सीने में एक हूक-सी उठी। ... दस साल में ये पहली बार था कि रणबीर ने वो देखा, जो हमेशा सबके सामने था और किसी को नहीं दिखता था। ... पर वो नहीं जानता था कि जिस चुप्पी पर आज उसे शक हो रहा है, वो चुप्पी उसी के परिवार को बचाने के लिए ओढ़ी गई थी।
"सफ़ाई उसे दी जाती है, रणबीर, जो कोई सुनना चाहता हो। ... इस घर ने दस साल पहले तय कर लिया था कि मैं क्या हूँ। ... उसके बाद मेरे बोलने या न बोलने से क्या फ़र्क़ पड़ता?"
"और तुमने भी तो तय कर लिया था न। ... तुमने भी दस साल में एक बार नहीं पूछा। ... आज पहली बार पूछ रहे हो।"
"मैंने? ... चर्वी, तुम जानती हो मैंने क्या खोया है उस साल। ... हम दोनों ने। ... तुम्हें लगता है वो मैं भूल सकता हूँ?"
"माँ कहती हैं, कि उस रात तुम अपने काम, अपनी फ़ाइलों, अपनी उस डूबती कंपनी के पीछे भागती न रहतीं, तो शायद... शायद हमारा बेटा आज ज़िंदा होता। ... तुमने कुर्सी चुनी थी उस रात, चर्वी। ... और उसकी क़ीमत एक मासूम ने चुकाई।"
"रुको। ... आगे मत कहो। ... दस साल से तुम्हारी माँ की ये कहानी मेरे ज़िंदा गोश्त में गड़ी है, रणबीर। ... और तुम्हें सच में लगता है कि उस रात जो हुआ, उसकी सबसे बड़ी क़ीमत तुमने चुकाई? ... तुमने?"
"छोड़ो। ... इस बात का कोई अंत नहीं। ... और आज रात मिष्टी हमारा इंतज़ार कर रही है। ... बस इतना याद रखना, रणबीर, कि उस रात की कहानी तुमने आज तक सिर्फ़ एक तरफ़ से सुनी है। ... सिर्फ़ एक तरफ़ से।"
और रणबीर वहीं ठिठक गया। ... सिर्फ़ एक तरफ़ से। ... दस साल में किसी ने उससे ये नहीं कहा था कि उस रात की कोई दूसरी तरफ़ भी हो सकती है। ... वो कहानी तो पत्थर पर खुदी सच्चाई थी, जो माँ ने उसके कान में उँडेली थी। ... पर आज पहली बार, उस पत्थर में एक बारीक-सी दरार चमक उठी।
रात गहरा चुकी थी। ... मिष्टी के कमरे में एक मद्धम नीली रोशनी जल रही थी। ... बिस्तर के एक ओर चर्वी बैठी थी, दूसरी ओर रणबीर, और बीच में उनकी बेटी, दोनों का एक-एक हाथ थामे।
"पापा, आप इस तरफ़। ... मुम्मा, आप इस तरफ़। ... और दोनों पक्का प्रॉमिस करो, जब तक मैं सो न जाऊँ, कोई उठ कर नहीं जाएगा। ... पिंकी प्रॉमिस। ... दोनों की उँगली, अभी।"
और राजवंश साम्राज्य के दो सबसे थके हुए लोगों ने, जिनके बीच बोर्डरूम की जंग और बर्फ़ के दस साल खड़े थे, एक आठ साल की बच्ची की नन्ही उँगलियों में अपनी उँगलियाँ फँसा कर पिंकी प्रॉमिस किया। ... एक पल को उस कमरे में न वसीयत थी, न वोटों की गिनती, न कोई पाला। ... बस एक घर था, जो टूटा ज़रूर था, पर जिसकी साँस अब भी चल रही थी। ... और उसी साँस के बीच, मिष्टी धीरे-धीरे नींद में उतरने लगी।
"पापा... मुम्मा... देखो न, अब आप दोनों एक साथ बैठे हो। ... कित्ता अच्छा लग रहा है। ... रोज़ ऐसे क्यों नहीं बैठते? ... पापा, आज मुम्मा वाला गाना सुनाओ न... वही, जो मुम्मा कभी-कभी ऊपर वाले बंद कमरे में अकेले गाती हैं।"
चर्वी का हाथ एक पल को थम गया। ... वो गाना, जो वो सिर्फ़ ऊपर के उस बंद कमरे में गाती थी, जिसे दस साल से किसी ने नहीं खोला। ... रणबीर ने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा। ... उसे तो पता ही नहीं था कि उसकी पत्नी अब भी, चुपके से, उस बंद दरवाज़े के पीछे जा कर कुछ गाती है।
"तुम... तुम उस कमरे में जाती हो? ... मुझे लगता था वो कमरा दस साल से बंद है। ... मैं तो उस गलियारे से गुज़रना भी नहीं चाहता। ... क्या गाती हो वहाँ, चर्वी?"
"वही लोरी, जो कभी उसके लिए तैयार की थी। ... जो कभी गाई ही नहीं जा सकी। ... साल में कुछ रातें ऐसी आती हैं, रणबीर, जब वो लोरी सीने में इतनी भारी हो जाती है कि उसे कहीं तो उतारना पड़ता है। ... तुमने अपना ग़म अलग कमरे में बंद कर लिया। ... मैंने अपना, उस बंद कमरे में।"
और उस मद्धम नीली रोशनी में, बरसों बाद, रणबीर ने अपनी पत्नी को सच में देखा। ... वो औरत, जिसे उसने अपने ग़म का मुजरिम मान लिया था, ख़ुद भी उसी ग़म को दस साल से अकेले, चुपचाप ढो रही थी। ... एक बंद कमरे में, एक अनगाई लोरी के साथ। ... उसे माँ की बरसों पुरानी बात याद आई, कि ये औरत पत्थर है, इसे कोई ग़म छूता ही नहीं। ... पर पत्थर लोरियाँ नहीं गाते। ... और रणबीर के भीतर कुछ पिघलने लगा।
"चर्वी... शायद... शायद मैंने दस साल एक ही कहानी सुनी, और कभी तुमसे नहीं पूछा कि उस रात तुम पर क्या बीती। ... मुझे लगता है कि मैंने कहीं बहुत बड़ी..."
"देखो, मिष्टी सो गई। ... और आज पहली बार, बरसों बाद, मुझे लग रहा है कि शायद हम दोनों... शायद हम..."
और वो वाक्य, जो शायद दस साल की बर्फ़ में पहली सच्ची दरार बन जाता, रणबीर की ज़ुबान पर काँपता हुआ आधा ही रह गया। ... उसका हाथ चर्वी के हाथ की तरफ़ बढ़ा। ... कमरे की हवा एक पल को गरम, नरम हो उठी। ... दस साल में पहली बार, वो सच के इतने क़रीब आए थे।
दरवाज़े पर, दहलीज़ की परछाईं में, इंदुमती खड़ी थीं। ... कब से, कोई नहीं जानता था। ... उनके कमरे में वो फीते वाला भूरा लिफ़ाफ़ा अब भी बंद पड़ा था, पर आज उन्हें उसे खोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। ... कुछ ज़ख़्मों को कुरेदने के लिए काग़ज़ नहीं, सिर्फ़ एक वाक्य काफ़ी होता है।
"वाह। ... क्या मंज़र है। ... एक ही कमरे में, एक ही बच्ची के सिरहाने। ... कितना सुंदर।"
"बस बेटा, इतना याद रखना, कि इसी औरत के इसी प्यार ने इस घर से हमारा पहला वारिस छीना था। ... तेरा बेटा, रणबीर। ... भूल गया उस रात को? ... मैं आज तक नहीं भूली, कि ये औरत हमें क्या क़ीमत दे कर गई है।"
और जैसे किसी ने खुली खिड़की से बर्फ़ीली हवा का एक झोंका अंदर छोड़ दिया हो। ... रणबीर का बढ़ता हुआ हाथ हवा में ही रुक गया। ... उसकी आँखों में अभी-अभी जो नरमी उतरी थी, वो एक पल में जम कर पत्थर हो गई। ... वो दरार, जो अभी-अभी चमकी थी, माँ के एक ही ज़हरीले वाक्य ने फिर से भर दी।
"मुझे... मुझे जाना चाहिए। ... मिष्टी सो गई है। ... देर हो रही है, चर्वी।"
और वो, जो एक पल पहले अपनी पत्नी की तरफ़ बढ़ा था, अब उठ कर, बिना पलटे, दरवाज़े की ओर चल दिया, जहाँ उसकी माँ जीत की एक हल्की मुस्कान लिए खड़ी थी। ... चर्वी सोई हुई मिष्टी का हाथ थामे बैठी रह गई। ... दस साल की बर्फ़ में जो एक दरार अभी-अभी पड़ी थी, इंदुमती के एक वाक्य ने उसे फिर से सील कर दिया था। ... इतने बरसों में पहली बार वो दोनों सच कहने के इतने क़रीब आए थे। ... और इतने क़रीब आ कर, एक बार फिर, ठीक उसी दहलीज़ पर हार गए थे।
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