अध्याय 7 / 12
साथ किसके
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
बोर्ड में हार कर इंदुमती जंग को घर के भीतर ले आती है और बड़ी बहू को चोर कहलवाना शुरू कर देती है, यहाँ तक कि आठ साल की मिष्टी भी माँ से पूछ बैठती है कि क्या वो सच में चोर है और उस बंद कमरे का राज़ क्या है। कुनाल पर से त्रिशा का यक़ीन पहली बार डगमगाता है, और तभी संवेदना का बहाना बना कर सूर्यवंशी का चिकना आदमी हवेली के फाटक पर आ खड़ा होता है, ये जताता हुआ कि दुश्मन के लिए दरवाज़ा घर के भीतर से ही खुल चुका है।
बोर्डरूम की उस अधूरी जंग की अगली सुबह, जब लखनऊ अभी धुंध में लिपटा था, राजवंश हवेली के पिछले फाटक पर एक अनजान गाड़ी आ कर रुकी। ... एक आदमी उतरा, एक भूरा, पुराना, फीता बँधा लिफ़ाफ़ा इंदुमती के हाथ में थमाया, और बिना नाम बताए लौट गया। ... बोर्ड में काग़ज़ से हारी हुई सास अब वो हथियार घर की देहरी के भीतर ले आई थी, जिसका कोई तोड़ नहीं। ... पर हवेली को अभी इतना ही पता था कि आज माँजी का ग़ुस्सा आसमान छू रहा है।
और उस सुबह इंदुमती ने वो किया, जो वो कल शीशे के उस कमरे में नहीं कर पाई थी। ... जो जंग वो बोर्डरूम में हार आई थी, उसे उसने घर की चौखट के भीतर छेड़ दिया। ... हर रिश्तेदार के कान में, हर नौकर की देहरी पर एक ही बात बहने लगी। ... कि बड़ी बहू चोर है। कि उसने एक मरते बूढ़े को बहका कर वसीयत हथिया ली। कि जिस घर ने उसे रोटी दी, उसी घर की पीठ में उसने छुरा घोंपा है।
नीचे रसोई में, रामदुलारी ये सब सुन रही थी, और उसका ख़ून खौल रहा था। ... वही रामदुलारी, जिसने इस घर के तीनों बेटों को अपनी गोद में खिलाया था, जो चर्वी के आने से बरसों पहले से इस देहरी की हर ईंट को जानती थी। ... जब चर्वी सुबह की चाय के लिए नीचे उतरी, तो बुढ़िया से रहा नहीं गया।
"चोर! ... हे राम, इस घर की ज़ुबान को लक़वा मार जाए। ... बहू रानी, आपने सुना? ऊपर बैठ कर माँजी एक-एक को यही रटा रही हैं, कि आप चोर हैं। ... अरे जिस हाथ ने दस साल इस घर का चूल्हा जलाए रखा, इस डूबते कारोबार को अपने ख़ून से सींचा, आज उसी हाथ को चोर कह रहे हैं। ... मेरा बस चले न, तो..."
"रहने दो, अम्मा। ... तुम्हारा बस चले, तो तुम पूरी हवेली को कड़छी ले कर दौड़ा लो। ... और फिर हम दोनों साथ में जेल जाएँ। ... बोलने दो उन्हें। ... लफ़्ज़ों से मैं नहीं टूटती। ... मैं दस साल इन्हीं लफ़्ज़ों को पी कर ज़िंदा हूँ।"
"बहू रानी, ये बार पहले जैसी नहीं है। ... कल आधी रात माँजी ने किसी को फ़ोन किया था, बहुत देर तक। ... और आज मुँह-अँधेरे वो लिफ़ाफ़ा आया। ... मुझे डर इस बात का नहीं कि वो आपको चोर कह रही हैं। ... मुझे डर उस पुरानी बात का है, बिटिया। ... उस रात की। ... जिसे इस घर ने दस बरस पहले मिट्टी में दबा दिया था।"
"कौन सी पुरानी बात, अम्मा? ... काग़ज़ से हार कर अब वो उस तरफ़ जाएँगी, जहाँ मेरा दिमाग़ नहीं, मेरा ज़ख़्म रहता है। ... मैं जानती थी, ये चाल आएगी। ... बोर्ड की हर चाल का हिसाब होता है, अम्मा। ... पर जो हथियार वो अब उठा रही हैं, उसका कोई हिसाब नहीं होता।"
"और सबसे बुरा तो ये है, बिटिया। ... ये आग अब बड़ों तक नहीं रुकी। ... आज सुबह मिष्टी बिटिया रसोई में आई थी, दूध लेने। ... और वहीं खड़े-खड़े, उसने भी सब सुन लिया। ... माँजी का एक-एक लफ़्ज़।"
और उस एक नाम को सुनते ही, जैसे चर्वी के भीतर एक और औरत जाग उठी। ... चेयरपर्सन नहीं। बड़ी बहू नहीं। सिर्फ़ एक माँ। ... मिष्टी, आठ साल की, बेख़ौफ़, सीधी बात करने वाली, इस पूरे तपते घर की इकलौती बची हुई हँसी। ... चर्वी उसे ढूँढ़ती हुई ऊपर के आँगन में पहुँची, जहाँ वो अकेली, घुटनों में ठोड़ी दबाए, सीढ़ियों पर बैठी थी।
"मिष्टी? ... यहाँ अकेली क्यों बैठी हो, मेरी गुड़िया? ... आज स्कूल नहीं जाना?"
"मुझे नहीं जाना। ... मुम्मा, दादी कह रही थीं कि आप चोर हो। ... क्या आपने सच में चोरी की? ... दादी की तिजोरी से? ... या बड़े पापा की वो कुर्सी वाली चीज़? ... प्रिया कहती है, चोर जेल जाते हैं, मुम्मा। ... क्या... क्या आपको भी ले जाएँगे?"
और वहीं, उस खुले आँगन में, चर्वी को एक साथ दो चीज़ें सँभालनी थीं। ... एक तरफ़ पूरा साम्राज्य, एक बोर्ड की जंग, एक सास का उठाया हुआ ज़हरीला हथियार।
और दूसरी तरफ़, ये आठ साल की बच्ची, जिसकी आँखों में आज पहली बार अपनी माँ के लिए एक डर तैर रहा था। ... इन दोनों में से चर्वी के लिए भारी कौन था, ये किसी को बताने की ज़रूरत नहीं थी।
"इधर आओ। ... मेरी तरफ़ देखो, मिष्टी। ... सीधे आँखों में। ... तुम्हारी मुम्मा ने अपनी पूरी ज़िंदगी में, कभी, किसी की, एक सुई तक नहीं चुराई। ... सुन रही हो? ... एक धागा तक नहीं।"
"फिर दादी ऐसा क्यों कहती हैं? ... दादी तो बड़ी हैं, मुम्मा। ... और बड़े तो झूठ नहीं बोलते न?"
"बड़े भी... कभी-कभी डर जाते हैं, गुड़िया। ... और जब लोग बहुत डर जाते हैं न, तो कभी-कभी ऐसी बातें कह देते हैं, जो सच नहीं होतीं। ... पर तुम दादी से नफ़रत मत करना। ... वो भी इसी घर की हैं, तुम्हारी अपनी हैं। ... बस इतना याद रखना, कि तुम्हारी मुम्मा चोर नहीं है। ... और बाक़ी सारी लड़ाई, तुम मुझ पर छोड़ दो।"
"मुम्मा... एक और बात। ... दादी कह रही थीं कि आपकी वजह से इस घर का एक बच्चा... कभी आया ही नहीं। ... वो ऊपर वाला बंद कमरा। ... उसमें किसका सामान है, मुम्मा? ... आप उसके सामने से कभी क्यों नहीं गुज़रतीं?"
और उस एक मासूम सवाल ने वो कर दिया, जो कल के पूरे बोर्डरूम की जंग नहीं कर पाई थी। ... चर्वी का पत्थर जैसा चेहरा, एक पल को, काँप गया। ... दस साल पहले उस बंद कमरे में जो साँस कभी नहीं चली, वो आज उसकी अपनी बेटी की ज़ुबान से, इंदुमती के लफ़्ज़ों में, लौट आई थी। ... यही थी उस हथियार की धार, जो अभी नीचे एक लिफ़ाफ़े में बंद पड़ा था।
"वो कमरा... एक बहुत पुरानी, बहुत उदास बात है, मिष्टी। ... और वो तुम्हारी वजह से नहीं है। ... किसी की भी वजह से नहीं। ... एक दिन, जब तुम थोड़ी और बड़ी हो जाओगी, मैं तुम्हें सब बताऊँगी। ... पूरा सच। ... मेरा वादा। ... पर आज नहीं, गुड़िया। ... आज बस इतना जान लो, कि तुम्हारी मुम्मा तुमसे बेइंतहा प्यार करती है।"
"ठीक है। ... मैं दादी को बता दूँगी कि आप चोर नहीं हो। ... और प्रिया को भी। ... और जिसने भी दोबारा आपको चोर कहा न, मैं उससे कट्टी कर लूँगी। ... हमेशा के लिए। ... मुम्मा... पापा को पता है कि आप चोर नहीं हो?"
और उस एक सवाल ने चर्वी को वहाँ छू लिया, जहाँ बोर्डरूम की कोई चाल नहीं पहुँचती। ... कल गलियारे में, दस साल में पहली बार, रणबीर की आँखों में वो सवाल उठा था। ... वो तुम थीं? ... पर दस साल का जमा हुआ यक़ीन एक रात में नहीं पिघलता। ... चर्वी ने बेटी का माथा चूमा, और उसका जवाब एक हँसी में टाल दिया।
"पापा को भी सब पता चल जाएगा, गुड़िया। ... बस थोड़ा वक़्त आने दो। ... अब भागो, रामदुलारी अम्मा के पास। ... उसने तुम्हारे लिए गुड़ वाले चावल बनाए हैं। ... और हाँ, आज उससे एक भी सवाल मत पूछना, वरना वो एक जवाब में सुबह की शाम कर देगी।"
मिष्टी के भागते ही, आँगन में कोई और आ खड़ा हुआ। ... त्रिशा। इस घर की सबसे छोटी बेटी, रणबीर और कुनाल की बहन, जो बचपन से अपने चमकीले कुनाल भैया पर जान छिड़कती आई थी। ... पर कल बोर्डरूम में उसने पहली बार अपने उसी भैया के चेहरे की चमक जमते देखी थी। ... और तब से उसके भीतर कोई चीज़ चैन से नहीं बैठ रही थी।
"भाभी। ... मुझे आपसे एक बात पूछनी है। ... और मुझे सीधा जवाब चाहिए। ... कल बोर्ड में आपने कुनाल भैया के बारे में जो कहा... वो सूर्यवंशी वाली बात... वो झूठ था न? ... बोलिए कि वो झूठ था, भाभी। ... बस एक बार कह दीजिए।"
और चर्वी समझ गई कि ये सवाल नहीं था। ... ये एक गुज़ारिश थी। ... एक बहन की, जो चाहती थी कि कोई उससे कह दे कि उसका भैया आज भी वही हीरो है, जिसे वो बचपन से पूजती आई है। ... और चर्वी झूठ बोल कर उसे वो चैन दे सकती थी। ... पर उसने नहीं दिया।
"मैं तुमसे झूठ नहीं कहूँगी, त्रिशा। ... अपनी बेटी से नहीं कहा, तुमसे भी नहीं कहूँगी। ... पर मैं तुमसे ये भी नहीं कहूँगी कि अपने भाई से नफ़रत करो। ... मैं बस तुमसे एक सवाल पूछती हूँ। ... और उसका जवाब मुझे मत देना। ... अपने दिल पर हाथ रख कर, ख़ुद को देना।"
"कल जब मैंने भरी मेज़ पर सूर्यवंशी का नाम लिया... तो तुमने अपने भैया का चेहरा देखा था? ... एक बेगुनाह आदमी चौंकता है, त्रिशा। ... भड़कता है, गुस्सा करता है। ... पर जिसका चेहरा एक पल में डर से जम जाए... ... वो चौंकता नहीं। ... वो पकड़ा जाता है।"
"नहीं। ... कुनाल भैया ऐसा नहीं कर सकते। ... वो इस घर से प्यार करते हैं, भाभी! ... पर... पर कल रात... वो सूर्यवंशी वालों से फ़ोन पर बात कर रहे थे। ... मैंने अपने कानों से सुना। ... और वो आवाज़... भाभी, वो मेरे भैया की आवाज़ नहीं थी। ... वो किसी बहुत डरे हुए आदमी की आवाज़ थी।"
और कहते-कहते त्रिशा ख़ुद ठिठक गई, जैसे उसने वो बात ज़ोर से कह दी हो, जिसे वो ख़ुद से भी छुपा रही थी। ... उसके अपने ही लफ़्ज़ों ने उसे पकड़ लिया था। ... दस साल में पहली बार, इस घर की एक बेटी के मन में, अपने सुनहरे भाई को ले कर, शक की एक नन्ही-सी दरार पड़ गई थी।
"मैं तुमसे कुछ मानने को नहीं कह रही, त्रिशा। ... बस अपनी आँखें खुली रखना। ... आज इस घर में हर कोई एक पाला चुन रहा है। ... माँजी का, कुनाल का, किरती का। ... मैं नहीं चाहती कि तुम भी बिना सोचे-समझे किसी तरफ़ खड़ी हो जाओ। ... तुम बस सच की तरफ़ रहना, बेटा। ... बाक़ी सब अपने आप ठीक हो जाएगा।"
"और अगर सच वो निकला... जो मैं सोचना भी नहीं चाहती? ... मुझे नहीं पता मैं किसके साथ हूँ, भाभी। ... पर... पर कल रात के बाद, मैं आपके ख़िलाफ़ भी नहीं हूँ।"
और त्रिशा वहीं खड़ी रह गई, आधी अपने भैया की तरफ़, आधी उस भाभी की तरफ़, जिसे कल तक वो चोर समझती आई थी। ... तभी नीचे, हवेली के मुख्य फाटक पर एक हॉर्न गूँजा। ... एक लंबी, चमकती, काली गाड़ी अंदर आई और सीधे पोर्च में आ कर रुकी। ... और उस गाड़ी पर बना वो निशान, एक सुनहरा सूरज, चर्वी ने पहले भी देखा था। ... रामदुलारी की रसोई से मिली एक भनक में, कुनाल की किराए की उसी काली गाड़ी पर।
गाड़ी से एक आदमी उतरा। ... महँगा सूट, तराशी हुई मुस्कान, और हाथ में सफ़ेद फूलों का एक बड़ा-सा गुलदस्ता। ... वो इस घर में मातम-पुर्सी के लिबास में आया था, पर उसकी आँखों में अफ़सोस का एक क़तरा तक नहीं था। ... चर्वी धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरी। ... और वो आदमी मुड़ कर, सीधे, उसकी तरफ़ देखने लगा।
"आप ज़रूर इस घर की बड़ी बहू होंगी। ... चर्वी जी। ... मेरा नाम रणविजय सूर्यवंशी है। ... सूर्यवंशी ग्रुप की तरफ़ से। ... यशवंत जी के गुज़र जाने का बेहद अफ़सोस हुआ। ... हमारे दोनों घरानों के बीच जो भी रहा हो, मौत के आगे वो सब बहुत छोटा पड़ जाता है। ... बस, अपनी संवेदना देने चला आया।"
"संवेदना के लिए फूल भेजे जाते हैं, सूर्यवंशी जी। ... इतनी दूर, ख़ुद चल कर नहीं आया जाता। ... और वो भी उस घर में, जिसका नाम सुन कर मेरे ससुर की मुट्ठी अपने-आप भिंच जाया करती थी। ... आप संवेदना देने नहीं आए। ... आप कुछ देखने आए हैं। ... कि जो घर आप ख़रीदने चले हैं, वो अंदर से कितना कमज़ोर पड़ चुका है।"
"वाह। ... आप तो यशवंत जी से भी दो क़दम आगे निकलीं। ... सुना था इस घर की बड़ी बहू सीधी-सादी, रसोई सँभालने वाली है। ... पर एक बात कहूँ, चर्वी जी? ... मैं इस देहरी पर पहली बार नहीं आया हूँ। ... और इस घर तक का रास्ता मुझे किसी बाहरी ने नहीं, इसी घर के एक अपने ने दिखाया है।"
"आपका घर बहुत ख़ूबसूरत है, चर्वी जी। ... ज़रा ख़याल रखिएगा। ... आजकल दरवाज़े बाहर से नहीं, अंदर से खुलते हैं।"
और वो आदमी अपनी काली गाड़ी में बैठ कर उतनी ही ख़ामोशी से लौट गया, जितनी ख़ामोशी से आया था। ... सफ़ेद फूलों का वो गुलदस्ता पोर्च की सीढ़ियों पर यूँ ही पड़ा रह गया, किसी मौत की नहीं, किसी चेतावनी की तरह। ... और उसका आख़िरी वाक्य चर्वी के भीतर किसी घंटे की तरह बज रहा था। ... दरवाज़े अंदर से खुलते हैं।
चर्वी उस ख़ाली पोर्च में जड़ खड़ी रह गई। ... ऊपर बालकनी से त्रिशा भी ये सब देख रही थी, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था, क्योंकि अब उसे भी वो फ़ोन वाली आवाज़ पूरी तरह याद आ गई थी। ... एक तरफ़ हवेली के भीतर वो लिफ़ाफ़ा रखा था, दस साल पुराना ज़ख़्म, जो अब जाग चुका था। ... और दूसरी तरफ़, फाटक पर वो भेड़िया, जो अब छुप कर नहीं, हाथ में फूल लिए, सामने से चला आया था।
चर्वी जानती थी कि ये दरवाज़ा किसने खोला। ... कुनाल ने। ... पर आज, पहली बार, उसे समझ आया कि दुश्मन अब दीवारों के बाहर नहीं खड़ा। ... वो देहरी लाँघ कर, मुस्कुराता हुआ, भीतर आ चुका था। ... और जिस घर को बचाने के लिए वो अपनी हर साँस लड़ा रही थी, उसी घर के एक अपने ने, उसी सबसे पुराने दुश्मन के लिए, दरवाज़ा खोल कर खड़ा कर दिया था।
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