DesiHub

Chapter 12 of 12

रणबीर की आँखें

बड़ी बहू by Avni Oberoi

कमरे में जो सन्नाटा उतरा, वो जीत का सन्नाटा नहीं था। ... एक-एक कर डायरेक्टर उठे, काग़ज़ समेटे, और चुपचाप बाहर निकल गए, किसी ने चर्वी की तरफ़ देखा तक नहीं। ... कुनाल कुर्सी में धँसा हुआ, साँस भर रहा था, उसका उधार का ताज हमेशा के लिए गिर चुका था।

पर कमरे के बीचोंबीच रणबीर वहीं खड़ा था, वो पीली अस्पताल की फ़ाइल हाथ में जकड़े, जैसे पैर ज़मीन में जड़ गए हों। ... उसकी आँखों में अब कुनाल का फ़रेब नहीं, सिर्फ़ एक शब्द बचा था, बेटा।

सेठी ने एक नज़र रणबीर पर डाली, कुछ कहना चाहा, फिर चुप रह गया, ये वक़्त उसका नहीं था। ... कुनाल के लड़खड़ाते क़दम दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, त्रिशा घबराई हुई उसका हाथ थामे उसे बाहर ले गई। ... पर रणबीर को न कुनाल की तबाही दिख रही थी, न बहन की फ़िक्र, सिर्फ़ वो एक शब्द बार-बार गूँज रहा था, बेटा।

इंदुमती सबसे पहले उठी। ... काग़ज़ की जंग वो हार चुकी थी, ये वो जानती थी, पर उसकी रीढ़ अब भी तनी हुई थी, क्योंकि आख़िर में जो पत्ता उसने खेला, उसने कमरे का पूरा रुख़ पलट दिया था। ... वो चर्वी के पास से यूँ गुज़री जैसे कोई मुक़दमा जीत कर निकलता है, हारी हुई नहीं।

चर्वी ने अपने भीतर कुछ बिखरता महसूस किया, पर इस काँच की मेज़ पर नहीं। ... उसने फ़ाइलें समेटीं, हाथ काँपने नहीं दिए, और गलियारे की तरफ़ बढ़ गई, क्योंकि इस घर के सामने टूटना उसने दस साल पहले ही छोड़ दिया था।

"रुको।" ... "चर्वी, रुको। ... मुझे बात करनी है। ... अभी।"

गलियारे में और कोई नहीं बचा था, सिर्फ़ काँच की दीवारों के पार दोपहर की धूप, और उनके बीच वो पीली फ़ाइल। ... चर्वी रुक गई, ठीक उसी देहरी पर जहाँ घंटों पहले उसने बोर्ड जीता था, पर मुड़ी नहीं।

"क्या पूछना है, रणबीर? ... वही, जो तुमने बोर्ड में पूछा था? ... या कोई नया सवाल आज इस गलियारे के लिए बचा कर रखा है?"

"यहाँ नहीं, चर्वी। ... ये बात गलियारे में खड़े हो कर पूछने वाली नहीं है। ... आज रात, हवेली में, जब मिष्टी सो जाए।"

चर्वी के पास मना करने का कोई ठोस बहाना नहीं था, और शायद वो ख़ुद भी अब मना नहीं करना चाहती थी। ... दस साल का यही तो इंतज़ार था, कि रणबीर ख़ुद एक दिन कोई सवाल पूछे।

"ठीक है। ... आज रात।"


ये वही कमरा था, जिसमें कभी दोनों साथ रहते थे, इससे पहले कि बर्फ़ जम गई, और अलग कमरे इस घर की चुप्पी का हिस्सा बन गए। ... आज दस साल बाद, चर्वी उसी कमरे की देहरी पर खड़ी थी, मेहमान की तरह।

शाम को हवेली में, रणबीर के कमरे का दरवाज़ा भीतर से बंद हुआ, दस साल में शायद पहली बार दोनों एक ही कमरे में, एक ही सवाल के साथ। ... मेज़ पर वही पीली फ़ाइल पड़ी थी, अब भी बंद।

"दस साल, चर्वी। ... दस साल मैंने माँ की एक ही बात पर यक़ीन किया, कि तुम्हारी महत्वाकांक्षा ने मेरे बेटे को खाया। ... और तुमने कभी, एक बार भी, मुझसे नहीं कहा कि ये झूठ है।" ... "क्यों, चर्वी? ... आख़िर क्यों चुप रही?"

"क्योंकि जब मैंने पहली बार कहना चाहा, तुमने सुना ही नहीं, रणबीर। ... तुम अपने ग़म में इतने डूबे थे कि तुम्हें एक दोषी चाहिए था, और माँ ने वो दोषी तुम्हारी उँगली पर रख दिया, मैं। ... उसके बाद मैंने सीख लिया, इस घर में सच बोलने से ज़्यादा फ़ायदा चुप रहने में है।"

"तो अब बोल रही हो? ... आज, जब पूरा बोर्ड तुम्हारे साथ खड़ा है, तब सच याद आया?" ... "या आज भी वही आधा सच दोगी, जो तुमने दस साल दिया?"

"याद है तुम्हें, रणबीर, बाऊजी की सालगिरह वाली सुबह? ... मैं पाँच बजे रसोई में हलवाइयों का हिसाब जोड़ रही थी, और तुम अपने कमरे में कुनाल की तक़रीर पर तालियाँ बजाने का रिहर्सल कर रहे थे। ... उस दिन भी मैंने कुछ नहीं कहा।" ... "...मैंने बहुत पहले सीख लिया था, इस घर में मेरी बात का कोई वज़न नहीं।"

"मुझे... मुझे ये याद भी नहीं, चर्वी। ... मैंने कभी ग़ौर ही नहीं किया कि तुम कमरे में हो भी या नहीं।"

"मैं आज तुम्हें इतना दे सकती हूँ, रणबीर, मैंने अपने बेटे को कभी किसी कुर्सी के लिए दाँव पर नहीं लगाया। ... इससे ज़्यादा, उस रात की एक-एक बात, आज नहीं बता सकती। ... वो सच सिर्फ़ मेरा नहीं है। ... वो सच बोला गया, तो ये पूरा घर, जिसे बाऊजी ने जोड़ने में उम्र लगा दी, एक रात में राख हो जाएगा।"

"हर बार यही घर, यही परिवार। ... तुम अपनी सफ़ाई भी इस घर को बचाने की शर्त पर देती हो? ... कोई इंसान ऐसा कैसे कर सकता है, चर्वी, दस साल अपने पति को भी अपनी सफ़ाई का हक़ न देना?"

"क्योंकि उस रात मैंने अपना बेटा खोया, रणबीर, और उसी रात मुझसे मेरा शोक भी छीन लिया गया। ... मुझे रोने का वक़्त नहीं मिला, मुझे तुम्हारी माँ की इज़्ज़त बचाने का काम मिला। ... तुम अपने ग़म में डूबे रहे, और मैं अपने ग़म को दफ़ना कर इस घर का हिसाब सँभालती रही।" ... "...दोनों ने एक ही बेटा खोया, रणबीर, पर सिर्फ़ एक को रोने की इजाज़त मिली।"

उसी लम्हे नीचे के कमरे में मिष्टी सो रही थी, अनजान कि उसके मम्मी-पापा की दस साल पुरानी बर्फ़ आज रात दरार खा रही थी। ... चर्वी ने एक पल को उस बंद दरवाज़े की तरफ़ देखा, जैसे याद दिला रही हो, इस जंग की असली क़ीमत आख़िर में कौन चुकाएगा।

और पहली बार, इस पूरी लड़ाई में, रणबीर की आँखों में ग़ुस्से की जगह कुछ और उभर आया, हिसाब लगाने वाला एक चेहरा, बिलकुल वैसा जैसा उसने आज सुबह बोर्डरूम में चर्वी के चेहरे पर देखा था।

"रुको... ... एक मिनट रुको। ... आज सुबह तुमने बोर्ड में कहा, बैंक गारंटियों पर दस्तख़त पिछले छह महीने के थे, और उन छह महीनों में बाऊजी चम्मच तक नहीं उठा पाते थे। ... तुम इतनी बारीक़ी से तारीख़ें गिनती हो, चर्वी।" ... "तो फिर माँ की कही उस रात की तारीख़ पर तुमने कभी एक शब्द क्यों नहीं कहा?"

"क्योंकि तुमने कभी तारीख़ पूछी ही नहीं, रणबीर। ... तुमने बस वो मान लिया, जो माँ ने कहा। ... एक बार भी हिसाब नहीं लगाया।"

"अच्छा, एक और तारीख़ बताओ मुझे, चर्वी। ... जिस दिन माँ ने मुझे बताया कि तुम्हारी वजह से हमने बेटा खोया, वो अस्पताल से लौटने के कितने दिन बाद था?"

"तीन दिन बाद, रणबीर। ... तीन दिन तक तुम्हारी माँ ने मुझसे एक लफ़्ज़ नहीं कहा, और चौथे दिन तुम्हें बुला कर पूरी कहानी सुनाई, बिना मुझे उस कमरे में बुलाए।"

और रणबीर ने, दस साल में पहली बार, अपने ही ग़म का हिसाब लगाना शुरू किया, वैसे ही जैसे चर्वी बरसों से इस घर का हिसाब लगाती आई थी। ... माँ ने उसे बताया था, चर्वी उस रात दफ़्तर के काग़ज़ों के लिए घर से निकली थी। ... पर सुधा की चोरी, सूर्यवंशी का सौदा, कुनाल के जाली दस्तख़त, ये सब भी तो काग़ज़ ही थे, और हर बार माँ की कही बात में एक छेद निकला था।

उसे वो रात याद आई, जब माँ ने पहली बार उसे बताया था कि चर्वी उस काली, बरसाती रात दफ़्तर के काग़ज़ों के लिए घर से निकल गई थी, बिना किसी की परवाह किए। ... उस वक़्त उसने कभी नहीं पूछा था, ऐसी बरसात में कौन बहू अकेले दफ़्तर के लिए निकलती है, वो भी उस हालत में। ... आज, दस साल बाद, वो सवाल पहली बार उसके भीतर जागा।

"दस साल, चर्वी। ... दस साल इस घर ने तुम्हें चोर कहा, नौकरानी की तरह हुक्म चलाया, और तुमने एक बार, सिर्फ़ एक बार भी अपनी सफ़ाई में मुँह नहीं खोला। ... कुनाल झूठ बोलता, तो काँप जाता, गिड़गिड़ाता। ... तुम पर हर इल्ज़ाम लगा, और तुम बस चुप रहीं। ... एक दोषी इतना चुप कैसे रह सकता है, चर्वी?"

"क्योंकि दोषी सफ़ाई देते हैं, रणबीर। ... जिसके पास खोने को कुछ नहीं बचा, वो सफ़ाई नहीं देता, बस अपना काम करता रहता है।" ... "...मैंने बहुत पहले सफ़ाई देना छोड़ दिया था।"

"चर्वी, मुझे... मुझे सच चाहिए। ... पूरा सच।"

"पूरा सच आज की रात तुम्हारी बर्दाश्त से बाहर है, रणबीर। ... इतना काफ़ी है कि तुम आख़िरकार ख़ुद हिसाब लगा रहे हो।"

"चर्वी... मुझे माफ़ कर दो, अगर मैंने कभी..." ... "...मुझे सच में नहीं पता था।"

"मुझे माफ़ी नहीं चाहिए, रणबीर। ... मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए था, कि तुम एक बार पूछते।"

रणबीर वहीं बैठ गया, अपने ही दस साल के ग़म के मलबे में, हर पुराना दिन नए सिरे से खँगालता हुआ। ... माँ का काँपता हाथ, वो अस्पताल की फ़ाइल, वो कहानी जो उसने कभी परखी ही नहीं थी। ... और सामने खड़ी वो औरत, जिसने कभी अपनी सफ़ाई नहीं माँगी।

रणबीर ने वो पीली फ़ाइल फिर से हाथ में उठाई, वही फ़ाइल जो सुबह उसकी माँ ने मेज़ पर सरकाई थी। ... उसके हाथ काँप रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे शायद बरसों पहले उस रात काँपे होंगे, जिस रात के बारे में उसने कभी ख़ुद हिसाब नहीं लगाया था।

"तो फिर आज बता दो, चर्वी। ... आख़िरी बार पूछ रहा हूँ।" ... "अगर तुमने वो किया जो माँ कहती हैं, तो अभी बता दो, मैं तुम्हें जाने दूँगा, कोई सवाल नहीं करूँगा। ... पर अगर तुमने नहीं किया..." ... "...तो फिर मैं दस साल किसे सज़ा देता रहा, चर्वी?"

कमरे में सिर्फ़ घड़ी की सुई की आवाज़ बची, और वो पीली फ़ाइल मेज़ पर पड़ी, दोनों के बीच एक चुप्पी की तरह। ... चर्वी ने रणबीर की आँखों में देखा, दस साल की बर्फ़ के पीछे वो आदमी जो आख़िरकार हिसाब लगाना सीख गया था।

"अपनी माँ से पूछो, रणबीर..." ... "...उसने उस रात क्या दस्तख़त किया था।"

इतना कह कर चर्वी दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गई, रणबीर को उसके अपने सवाल के मलबे में अकेला छोड़ कर। ... दरवाज़ा बंद हुआ, पर रणबीर के कानों में वो एक वाक्य बजता रहा, जिसका जवाब अब वो अपनी माँ के सामने खड़े हुए बिना कभी नहीं पा सकता था।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.