Chapter 2 of 12
नई मालकिन
वसीयत में चर्वी का नाम पढ़े जाते ही घर उबल पड़ता है, और इंदुमती उसे एक बीमार, बहके हुए बूढ़े की बड़बड़ाहट कह कर ठुकरा देती है। रामदुलारी की वफ़ादारी और किरती की मीठी साज़िश के बीच चर्वी उस कारोबार का हिसाब लगाती है जो सबकी सोच से कहीं ज़्यादा बीमार है, और आख़िर में इंदुमती पूरे ख़ानदान के सामने उसे सात दिन का अल्टीमेटम दे देती है, कि कुर्सी वापस कुनाल के नाम कर दे, वरना।
उस एक नाम ने पूरे कमरे की हवा जमा दी थी। ... चर्वी राजवंश। वो नाम अब भी दीवारों से टकरा रहा था, और किसी को यक़ीन नहीं हो रहा था कि उन्होंने सही सुना है।
इंदुमती के चेहरे पर जमी वो यक़ीन भरी मुस्कान अब टूट कर किसी और ही चीज़ में बदल रही थी। कुनाल का पैर पर चढ़ा पैर धीरे से नीचे उतरा, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।
"फिर से पढ़िए, वकील साहब।" ... "और इस बार ज़रा ध्यान से। ज़रूर कहीं कोई भूल हुई है।"
पर सेठी ने काग़ज़ नीचे नहीं रखा। उन्होंने चश्मे के ऊपर से एक बार इंदुमती को देखा, और फिर वही एक-एक लफ़्ज़ दोबारा, ज्यों का त्यों दोहरा दिया। चर्वी राजवंश।
"ये वसीयत नहीं है। ... ये एक मरते हुए, बहके हुए इंसान की बड़बड़ाहट है। मेरे पति बीमारी में अपने होश खो बैठे थे, और किसी ने उनके काँपते हाथ से ये लिखवा लिया।"
और फिर इंदुमती की जलती हुई नज़र कमरे के उस कोने में जा टिकी, जहाँ चर्वी सिर झुकाए खड़ी थी। वही सादी साड़ी, वही ख़ामोश चेहरा।
"तुमने। ... तुमने उस बूढ़े को अपनी मीठी बातों में फँसा कर ये करवाया, है न? दस साल की सेवा का यही सिला सोचा था तुमने, बहू? मेरे बेटों का हक़ छीन लोगी?"
"माँजी... मैंने बाऊजी से कभी कुछ नहीं माँगा। न ये नाम, न ये कुर्सी। जो कुछ इस काग़ज़ में लिखा है, वो मेरे लिए भी उतना ही अचानक है, जितना आपके लिए।"
"झूठ। ... इस घर की बहू, और राजवंश ग्रुप की मालकिन? हुंह। जिस दिन एक बहू मेरे पति की कुर्सी पर बैठेगी, उस दिन इस हवेली की नींव हिल जाएगी। मेरे जीते जी, ये हरगिज़ नहीं होगा।"
कुनाल अब तक एक शब्द नहीं बोल पाया था। जिस ताज को वो अपने सिर की बस एक औपचारिकता मान बैठा था, वो अभी अभी किसी और के नाम लिख दिया गया था। और उस किसी और का चेहरा, वो रोज़ नाश्ते की मेज़ पर देखता था।
इंदुमती उठ खड़ी हुई, पल्लू सँभाला, और पूरे कमरे पर एक आख़िरी, बर्फ़ीली नज़र दौड़ाई।
"ये काग़ज़ इस घर में कोई मायने नहीं रखता। ... राजवंश का वारिस वही होगा जो हमेशा से तय था। और तुम, बड़ी बहू, तुम वापस अपनी रसोई में, अपनी जगह पर लौट जाओ।"
और इंदुमती चली गई, अपने पीछे एक ऐसा सन्नाटा छोड़ कर जो चीख़ से भी भारी था। चर्वी वहीं खड़ी रही, हाथ में वो काग़ज़ थामे जिसने उसे रातों-रात इस घर की मालकिन भी बना दिया था, और चोर भी।
उस रात हवेली की ऊपरी मंज़िल भले बर्फ़ में जम गई हो, पर नीचे रसोई में एक चूल्हा अब भी जल रहा था। और उस चूल्हे के पास एक ही इंसान था जिसकी वफ़ादारी आज भी नहीं डगमगाई थी।
"हुंह! मालकिन कहती हैं, वापस रसोई में जाओ।" ... "ये ले, बहूरानी, गरम दूध पी ले। सुबह से एक निवाला नहीं गया तेरे गले से। तेरहवीं भी तूने सँभाली, सबके आँसू भी तूने पोंछे, और ताना अब भी तेरे ही हिस्से आया।"
"तुम्हारे हाथ का दूध पीने बैठूँगी न, रामदुलारी काकी, तो सारी थकान भूल जाऊँगी। ... बाक़ी बातें रहने दो।"
"रहने कैसे दूँ! ... अरे मैंने इन दोनों भाइयों को अपनी गोद में खिलाया है। कुनाल बाबा को तो आज तक दो और दो जोड़ने नहीं आते, और पूरा शहर उन्हीं के गले में हार डाल रहा है।"
"और जो औरत रात के दो-दो बजे तक बैठ कर पूरे कारोबार का हिसाब सीधा करती है, उससे कहते हैं, जा, कुनाल के लिए गरम जलेबी भिजवा। ... वाह री क़िस्मत।"
रामदुलारी की बात में वो सच था जिसे ये पूरा घर देखना नहीं चाहता था। और चर्वी बस हल्के से मुस्कुरा दी। क्योंकि जो बात काकी आज ग़ुस्से में कह रही थीं, वही बात दस साल से चुपचाप चर्वी की ज़िंदगी थी।
"बहूरानी... एक बात कहूँ? ... बाऊजी चले गए, पर जाते जाते जो कर गए, ठीक कर गए। इस घर ने तेरे साथ जो किया, ख़ास कर उस रात..." "ना ना, छोड़। मुझे नहीं बोलना चाहिए। पुरानी, दबी हुई बातें हैं।"
"कौन सी रात, काकी?"
"कोई नहीं, बहूरानी। ... मेरी बुढ़िया ज़ुबान बहक जाती है। तू दूध पी। मैं रोटी सेंकती हूँ।"
चर्वी कुछ नहीं बोली। पर उसकी आँखें एक पल को ऊपर की मंज़िल की तरफ़ उठ गईं, उस बंद कमरे की तरफ़, जिसका ताला दस साल से नहीं खुला था। कुछ राज़ चूल्हे की आँच से भी नहीं पिघलते।
रात और गहरा गई। अपने कमरे में, चर्वी ने एक पुरानी अलमारी खोली और उसमें से फ़ाइलों का एक ढेर निकाला, जो इस घर के किसी और ने कभी नहीं देखा था।
ये राजवंश ग्रुप की असली तस्वीर थी। वो नहीं, जो कुनाल मंच पर दिखाता था। इसमें अचार-मसालों का वो चमकता ब्रांड भी था, और उसके ठीक नीचे दबा हुआ वो टाउनशिप का प्रोजेक्ट भी, जो सालों से क़र्ज़ के बोझ तले एक-एक साँस के लिए तड़प रहा था।
"मिस्टर वर्मा, बैंक की अगली किश्त की तारीख़ आगे बढ़वाइए। कम से कम तीस दिन। ... मुझे पता है मुश्किल है। पर अगले हफ़्ते इस घर में जो तूफ़ान आने वाला है, अगर उसमें किसी ने कारोबार की ये कमज़ोरी सूँघ ली, तो वो हमें ज़िंदा निगल जाएगा।"
"कुर्सी किसके नाम है, ये काग़ज़ की बात है। ... पर ये कारोबार अंदर से कितना खोखला है, ये सिर्फ़ मैं जानती हूँ। और जब तक सिर्फ़ मैं जानती हूँ, ये घर मुझे हरा नहीं सकता।"
काग़ज़ पर पूरे राजवंश की मालकिन अब चर्वी थी। पर उस काग़ज़ का कोई मोल नहीं था, जब तक अंदर ही अंदर सड़ता ये कारोबार बचा न लिया जाए। ताज उसके सिर पर था, और उसके नीचे की ज़मीन खिसक रही थी। ... और इस पूरे घर में, ये बात सिर्फ़ एक औरत जानती थी।
अगली सुबह हवेली में एक नई हवा बह रही थी। ऊपर से सन्नाटा, और उसके नीचे बहती हुई साज़िशें। नाश्ते की मेज़ की तरफ़ जाते हुए, गलियारे में चर्वी को एक मीठी सी आवाज़ ने रोका।
"भाभी! ... अरे रुकिए न। सुबह-सुबह इतनी जल्दी में कहाँ भागी जा रही हैं?"
किरती। इस घर की मँझली बहू, शेखर की पत्नी। चेहरे पर हमेशा एक मीठी मुस्कान, और उस मुस्कान के पीछे हमेशा एक हिसाब।
"मैं तो कब से आपसे अकेले में बात करना चाह रही थी। ... सच कहूँ भाभी, माँजी जो कर रही हैं वो ठीक नहीं। बाऊजी ने आपको चुना है, तो कुछ सोच कर ही चुना होगा न।"
"तुम्हें सच में ऐसा लगता है, किरती?"
"बिलकुल लगता है! ... पर भाभी, एक छोटी सी बात है। आप ठहरीं इस घर की बहू। और कुनाल भैया, उनकी तो बाहर अपनी एक छवि है। अब अगर घर की कोई औरत सीधे उस कुर्सी पर जा बैठे, तो लोग क्या कहेंगे? ख़ानदान की नाक का सवाल है न।"
और फिर, बड़ी सफ़ाई से, किरती अपने असली पत्ते की तरफ़ बढ़ी।
"मेरा तो बस इतना कहना है... कोई ऐसा हो जो बीच का रास्ता बन जाए। न कुनाल भैया की तरह भड़कीला, न, माफ़ करना भाभी, आप की तरह विवादों में घिरा हुआ। जैसे कि... मेरे शेखर। सीधे, शांत। किसी को कोई ऐतराज़ भी नहीं होगा।"
चर्वी ने एक पल किरती को देखा। उस मीठी मुस्कान को, उस नपे-तुले सुझाव को। और मन ही मन उसने वो चाल पढ़ ली जो किरती बिछा रही थी। दो मोर्चे तो पहले से खुले थे, सास और देवर। और अब किरती चुपके से तीसरा मोर्चा खोल रही थी, अपने पति के लिए।
"तुम ठीक कहती हो, किरती। ... इस घर में हर किसी को अपनी सही जगह पहचाननी चाहिए।" ... "और मैं वादा करती हूँ, वक़्त आने पर हर किसी को उसकी असली जगह ज़रूर मिलेगी।"
किरती मुस्कुरा दी, जैसे उसने अपनी जीत सुन ली हो। पर उसे ये समझ नहीं आया कि चर्वी की उस नरम सी बात के दो मतलब थे। और वो दूसरा मतलब, किरती के हक़ में हरगिज़ नहीं था।
शाम ढले, चर्वी मिष्टी को सुला कर उसके कमरे से निकल रही थी, जब गलियारे के उस सर्द फ़ासले पर, दस साल से जमी उस चुप्पी में, एक आवाज़ आई। ... रणबीर।
"चर्वी। ... एक मिनट रुकोगी?"
दस साल में शायद पहली बार, रणबीर ने उसे यूँ रोका था। किसी काम से नहीं, किसी औपचारिकता से नहीं। बस... रोका था।
"वसीयत... बाऊजी ने जो किया... मैं समझ ही नहीं पा रहा। ... पूरा घर कह रहा है कि तुमने उन्हें बहकाया। पर मैं तुम्हें दस साल से देख रहा हूँ, चर्वी। तुमने कभी किसी चीज़ के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।"
"तो फिर सवाल क्या है, रणबीर? ... कि मैंने बहकाया, या नहीं बहकाया?"
"सवाल ये है कि... मैं जानता ही नहीं कि तुम कौन हो। ... दस साल हम एक ही छत के नीचे रहे। और आज एक काग़ज़ ने आ कर बता दिया कि जिस औरत को मैं जानता ही नहीं था, वो शायद इस पूरे घर से बड़ी थी।"
चर्वी के सीने में कुछ कसा। दस साल में ये पहला पल था जब रणबीर ने उसे सच में देखा था, न शक से, न ग़ुस्से से। पर वो जानती थी, ये नरमी कितनी देर की है। बस अगले ताने तक की।
"मुझे जानने की कोशिश तुमने दस साल पहले छोड़ दी थी, रणबीर। ... जिस रात तुमने मेरा हाथ छोड़ा था, उसी रात तय हो गया था कि हम कौन हैं। एक काग़ज़ उसे नहीं बदल सकता।"
दोनों के बीच वो लंबा गलियारा था, और उस गलियारे के अंधेरे कोने में वो बंद कमरा, जिसका ताला दस साल से किसी ने नहीं छुआ था। दोनों की नज़र एक पल को उस दरवाज़े पर पड़ी, और फिर दोनों ने एक साथ नज़र फेर ली। कुछ दरवाज़े, खोलने से डर लगता है।
"चर्वी, वो रात... " ... "...छोड़ो। देर हो रही है। शुभ रात्रि।"
और रणबीर मुड़ गया, ठीक वैसे ही जैसे दस साल से मुड़ता आया था। पर इस बार, उसके क़दम एक पल को ठिठके थे। बहुत छोटा सा ठहराव, इतना छोटा कि शायद ख़ुद रणबीर ने भी महसूस नहीं किया। ... पर चर्वी ने किया।
"देर तो दस साल पहले ही हो गई थी, रणबीर।"
और फिर वो दिन भी आ गया, जिसका इंतज़ार इंदुमती कर रही थी। हफ़्ता बीतने से पहले ही, उसने पूरे ख़ानदान को बड़ी बैठक में बुला लिया। बुज़ुर्ग, रिश्तेदार, हर वो चेहरा जिसके सामने इस घर की इज़्ज़त का हिसाब हुआ करता था।
इंदुमती बीचोंबीच बैठी थी, ठीक वैसे ही जैसे वो हमेशा बैठती थी, जैसे ये कुर्सी उसके ख़ून में दौड़ती हो। और उसके ठीक बग़ल में, किरती, चेहरे पर वही मीठी, धैर्यवान मुस्कान।
"इस घर पर एक मुसीबत आन पड़ी है। ... एक बीमार बूढ़े की एक भूल ने हमारे पूरे ख़ानदान की इज़्ज़त दाँव पर लगा दी है। पर मैं, इंदुमती राजवंश, इस घर की नींव को यूँ हिलने नहीं दूँगी।"
फिर उसने चर्वी की तरफ़ देखा, जो हमेशा की तरह एक कोने में, सिर झुकाए खड़ी थी।
"बहू। ... मैं तुम्हें एक मौक़ा दे रही हूँ। इस घर की इज़्ज़त बचाने का एक आख़िरी मौक़ा। और ध्यान से सुनना, क्योंकि ये मैं दोबारा नहीं कहूँगी।"
"आज से ठीक एक हफ़्ता। ... सात दिन के अंदर, तुम अपने हाथों से उस काग़ज़ पर दस्तख़त कर के ये कुर्सी वापस कुनाल के नाम कर दोगी। ख़ुशी-ख़ुशी। अपनी मर्ज़ी से।"
"और अगर मैंने ऐसा न किया, माँजी?"
पूरी बैठक में सन्नाटा छा गया। किसी ने ये उम्मीद नहीं की थी कि सिर झुकाए खड़ी वो बड़ी बहू पलट कर सवाल कर देगी। इंदुमती की आँखें सिकुड़ीं, और उसके होंठों पर एक ख़तरनाक सी हँसी तैर गई।
"अगर तुमने ऐसा न किया... तो तुम अपनी आँखों से देखोगी कि ये घर उस बहू के साथ क्या करता है, जो अपनी औक़ात भूल जाती है।"
"तुमसे सब कुछ छीनने का रास्ता मैं पहले भी जानती थी, बहू। ... दस साल पहले भी जानती थी। क्या तुम सच में चाहती हो कि मैं एक बार फिर वही रास्ता चुनूँ?"
चर्वी के चेहरे पर कुछ नहीं बदला। पर उसके अंदर एक बहुत पुराना ज़ख़्म काँप उठा। दस साल पहले भी। ... इंदुमती जानती थी कि वो किस रात की बात कर रही है। और किरती, बग़ल में बैठी, धीरे से मुस्कुरा दी, जैसे कोई खेल अभी-अभी शुरू हुआ हो।
सात दिन। एक हफ़्ता, जिसके ख़त्म होते ही या तो चर्वी अपना हक़ अपने ही हाथों दफ़ना देती... या ये घर वो हथियार दोबारा उठा लेता, जो उसने दस साल पहले उठाया था। और इस बार, इस घर का इरादा किसी को बख़्शने का नहीं था।
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