अध्याय 5 / 12
कुनाल का सच
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
अपना दफ़्तर बिका हुआ जान कर चर्वी सुधा को हटाने के बजाय उसे चारे की तरह इस्तेमाल करती है और कुनाल को जीतता हुआ मान कर चुपचाप उसके पैसों के पीछे चल पड़ती है, क्योंकि डूबता आदमी हमेशा कुछ ऐसा बेच बैठता है जो उसे कभी नहीं बेचना चाहिए। सेठी की क़ाबिलियत और रामदुलारी की रसोई से मिली एक भनक चर्वी को उस सच तक ले जाती है, कि कुनाल ने बाऊजी का बनाया फ़्लैगशिप ब्रांड चुपके से उनके सबसे पुराने दुश्मन सूर्यवंशी ग्रुप को बेचने के लिए दरवाज़ा खोल दिया है।
अगली सुबह, राजवंश ग्रुप के दफ़्तर में, काँच की उस दीवार के पार अपनी मेज़ पर सुधा बैठी थी। वही सुधा, आठ साल की सबसे भरोसेमंद आवाज़, जो कल तक चर्वी का साया थी और आज एक बिका हुआ मोहरा। ... चर्वी दरवाज़े के बाहर एक पल ठिठकी। हाथ हैंडल पर था, और सीने में एक ही आँधी, कि अंदर जा कर सब कुछ फाड़ कर रख दे।
पर चर्वी ने वो दरवाज़ा उस आँधी के साथ नहीं खोला। ... दस साल इस घर ने उसे एक चीज़ ज़रूर सिखाई थी। पकड़ा हुआ जासूस सिर्फ़ एक ख़बर है। पर जिसे पता ही न हो कि वो पकड़ा गया है, वही जासूस एक हथियार बन जाता है। ... और चर्वी को अब हथियार चाहिए थे, गुस्सा नहीं।
"सुधा, गुड मॉर्निंग। ... ये टाउनशिप वाली फ़ाइल है, इसकी एक साफ़ कॉपी बना दो। बोर्ड की अगली बैठक के लिए चाहिए। ... और हाँ, इसमें जो नए नंबर हैं न, वो बिलकुल गोपनीय हैं। मेरे और तुम्हारे सिवा इन्हें कोई न देखे। ... तुम पर तो मैं आँख मूँद कर भरोसा करती हूँ।"
उस फ़ाइल के नंबर असली नहीं थे। चर्वी ने रात भर बैठ कर उनमें ऐसी बारीक हेराफेरी की थी, जो सिर्फ़ उसकी नज़र पकड़ सकती थी। ... अब सुधा वो फ़ाइल कुनाल तक पहुँचाएगी, और कुनाल उन झूठे नंबरों पर जो भी क़दम उठाएगा, वो चर्वी को बता देगा कि वो असल में किस चीज़ के पीछे भाग रहा है। ... जिसे ये लोग एक टूटी हुई, पकड़ी गई बहू समझ रहे थे, वो अपने ही ग़द्दार को चारे की तरह मेज़ पर रख चुकी थी।
केबिन का दरवाज़ा बंद कर के चर्वी ने वो नंबर मिलाया जो अब इस पूरी लड़ाई में उसकी सबसे बड़ी ताक़त था। सेठी।
"चर्वी जी। ... इस बार बताइए, कौन मरा है, और किसने क्या फ़ैसला कर लिया है?"
"मेरा दफ़्तर बिका हुआ है, सेठी जी। मेरी सहायक सुधा हफ़्तों से कुनाल को मेरी हर फ़ाइल पहुँचा रही है। ... पर मैं उसे हाथ नहीं लगाऊँगी। उसे वहीं बैठे रहने दीजिए। मुझे एक और काम चाहिए। कुनाल के पैसों के पीछे चलिए।"
"पैसों के पीछे? ... चर्वी जी, कुनाल बाबा के पास पैसे कहाँ। उनके पास तो बस तालियाँ हैं और एक चमकता हुआ चेहरा। जोड़-घटाव तो आज तक उन्हें आया नहीं।"
"इसीलिए तो डर है, सेठी जी। ... ई.जी.एम. से पहले उसे वोट ख़रीदने हैं, डायरेक्टरों को अपनी तरफ़ मिलाना है। और इसके लिए उसे नक़द चाहिए, बहुत सारा, बहुत जल्दी। ... वो टाउनशिप का घाटा दस साल से मैं अपने ख़ून से सींच कर ज़िंदा रखे हूँ। अब उसी घाटे का सेहरा जिसके सिर बँधा है, उसे वो खाई अचानक भरनी है। और डूबता आदमी जब जल्दी में हो न, सेठी जी, तो वो कुछ ऐसा बेच बैठता है जो उसे कभी नहीं बेचना चाहिए।"
"यानी आप कहती हैं, हम कुनाल बाबा को जीतता हुआ देखते रहें, और चुपचाप गिनते रहें कि वो जीतने के लिए क्या-क्या बेच रहे हैं। ... ठीक है। मैं आज रात से टाउनशिप के खातों में घुसता हूँ। पर एक बात याद रखिए, चर्वी जी, ऐसे बड़े सौदे काग़ज़ पर सबसे आख़िर में आते हैं। इनकी पहली भनक कहीं और से लगती है।"
"काग़ज़ अगर चुप हैं, तो मैं वहाँ सुनूँगी जहाँ इस घर की हर आहट सबसे पहले पहुँचती है। ... रसोई में। ... वहाँ के कान किसी बोर्डरूम से तेज़ हैं, सेठी जी।"
उसी शाम, हवेली लौट कर, चर्वी जान-बूझ कर कुनाल के रास्ते में आ गई। ... आजकल कुनाल हवा में उड़ रहा था। वसीयत का झटका पीछे छूट चुका था, घर उसके साथ था, बिरादरी उसके गुण गा रही थी, और उसके हाथ में वो फ़ाइल थी जिससे उसने सबको समझा दिया था कि बड़ी बहू बरसों से घाटा छुपाती आई है।
"अरे भाभी! ... आइए, आइए। सुना है आजकल आप बड़े-बड़े बोर्डरूम सँभाल रही हैं। ... कैसा लगा हमारा वो शीशे वाला कमरा? थोड़ा बड़ा है न, रसोई के मुक़ाबले? सँभल के, कहीं खो न जाइएगा उसमें।"
"बड़ा है, कुनाल। ... और डरावना भी। ... मुझ जैसी घरेलू औरत के बस की बात कहाँ। ... तुम ठीक कहते हो। मेरी जगह तो शायद रसोई ही है। वहाँ मन लगता है।"
कुनाल के चेहरे की चमक और गहरी हो गई। उसे हमेशा से यही चर्वी पसंद थी, झुकी हुई, हारी हुई, माफ़ी माँगती। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जो औरत उसके सामने हार मान रही है, वो असल में उसे एक-एक शब्द बोलने के लिए उकसा रही है।
"देखिए भाभी, मैं बुरा आदमी नहीं हूँ। ये कुर्सी, ये वसीयत, ये सब एक बीमार बूढ़े आदमी की भूल थी। ... पर मैं इसे ठीक कर दूँगा। ... ई.जी.एम. में जब वोट पड़ेंगे न, तो ये पूरा बोर्ड मेरे साथ खड़ा होगा। और तब तक मैं कुछ इतना बड़ा कर दिखाऊँगा कि पूरा लखनऊ फिर से कहेगा, राजवंश को कुनाल ने बचाया।"
"ज़रूर करोगे, कुनाल। ... तुम्हारे पास तो हमेशा से बड़े-बड़े सपने रहे हैं। ... बस एक बात याद रखना, देवर जी। जो चीज़ बिकने के लिए मेज़ पर रखी जाती है न, उसकी क़ीमत ख़रीदार तय करता है... बेचने वाला नहीं।"
कुनाल ठठा कर हँस दिया, जैसे भाभी ने कोई घर-गृहस्थी की सीख दी हो। उस वाक्य में उसे कुछ ख़ास नहीं सुनाई दिया। ... पर वो एक तीर था, अँधेरे में चलाया हुआ, ये देखने को कि कुनाल का चेहरा किस लफ़्ज़ पर काँपता है। और 'बेचने' के लफ़्ज़ पर, बस एक पल को, उसकी पलक झपकी थी।
"बेचना-वेचना छोड़िए, भाभी। ये बड़े लोगों की बातें हैं, आपके छोटे से दिमाग़ पर बोझ पड़ जाएगा। ... आप बस देखती रहिए। हफ़्ते भर में ऐसा धमाका होगा कि आपकी वो वसीयत काग़ज़ का एक बेकार टुकड़ा बन कर रह जाएगी।"
चर्वी ने सिर झुका लिया, वही आज्ञाकारी बहू बन कर जो वो कमरे में आई थी। पर अंदर से वो जा चुकी थी। ... कुनाल ने उसे दो चीज़ें दे दी थीं। पहली, कि उसकी चाल हफ़्ते भर के अंदर चलने वाली है। और दूसरी, कहीं ज़्यादा ख़तरनाक, कि उस चाल में राजवंश का कुछ 'बेचा' जा रहा था। ... सवाल बस इतना था, क्या।
रात को, जब हवेली की बत्तियाँ बुझ गईं, चर्वी नीचे उतर आई। रसोई अब भी जाग रही थी। रामदुलारी, जिसे इंदुमती ने जूठे बर्तनों की सज़ा दे रखी थी, वहीं थी, बर्तनों के एक पहाड़ के बीच, बड़बड़ाती हुई।
"तीस साल इस घर का पेट भरा, और आज बुढ़ापे में जूठन माँज रही हूँ। ... और वो किरती बिटिया, जिसे रसोई में धुएँ से खाँसी आ जाती है? कल भोग में इतना नमक डाल दिया कि पंडित जी की आँखों में पानी आ गया। बोले, माता का प्रसाद है, चुपचाप खा गए बेचारे।"
"काकी, धीरे। ... कोई सुन लेगा। ... ला, ये बर्तन मुझे दे। तू बैठ ज़रा। तेरी कमर पहले ही दुखती है।"
"चुप कर! इस घर की मालकिन बर्तन माँजेगी, तो बाऊजी की आत्मा मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी। ... अच्छा सुन, तू आ ही गई है तो एक बात बताती हूँ। कब से मन ही मन खाए जा रही थी।"
और यहीं, इस धुएँ भरी रसोई में, चर्वी को वो मिलने वाला था जो किसी बोर्डरूम की फ़ाइल में नहीं था। क्योंकि इस घर की हर बात, हर आने-जाने वाले की हर आहट, सबसे पहले इसी रसोई से हो कर गुज़रती थी। नौकर, ड्राइवर, माली, सब यहीं चाय पीते थे, और यहीं, बिना सोचे, सब बोल जाते थे।
"कुनाल बाबा न, कई रातों से घर की गाड़ी नहीं ले जा रहे। ड्राइवर हरिया बता रहा था, बाबा उसे जल्दी छुट्टी दे कर, ख़ुद कोई किराए की काली गाड़ी मँगवाते हैं। ... और देर रात, शहर के बाहर वाले उस बड़े होटल में जाते हैं। अकेले नहीं, बहूरानी। किसी से मिलने।"
"किससे मिलने, काकी? ... हरिया ने और कुछ देखा? कोई नाम, कोई चेहरा, कुछ भी?"
"नाम तो नहीं पता, बहूरानी। पर हरिया कह रहा था, जिस गाड़ी में वो दूसरे लोग आते हैं, उस पर एक निशान बना है। ... एक सुनहरा सूरज। ... मुझे क्या पता किसका निशान है। पर हरिया डर गया था। कहता था, वो लोग राजवंश के आदमी नहीं लगते।"
सुनहरा सूरज। ... चर्वी के हाथ बर्तन धोते-धोते हवा में रुक गए। ... इस पूरे शहर में एक ही घराना अपने हर निशान पर सूरज उकेरता था। एक ही घर, जो पिछले चालीस साल से राजवंश को मिट्टी में मिला देने का ख़्वाब पालता आया था। ... सूर्यवंशी। ... राजवंश का सबसे पुराना, सबसे ज़हरीला दुश्मन।
"बहूरानी, मैं डरती हूँ। ये मर्द जब घबरा जाते हैं न, तो सबसे पहले किसी कमज़ोर को बलि चढ़ाते हैं। ... उस रात भी, दस बरस पहले, जब तेरे साथ वो सब हुआ था... ना, ना। मुझे कुछ नहीं कहना। मेरी बुढ़िया ज़ुबान को ताला। भगवान माफ़ करे।"
"कोई बात नहीं, काकी। ... जब तू तैयार होगी, तब कहना। मैं दस साल रुकी हूँ, ज़रा और रुक लूँगी। ... बस इतना कर दे। हरिया से कह देना, बाबा जिस रात फिर उस होटल जाएँ, मुझे सबसे पहले ख़बर हो।"
उस रात चर्वी सोई नहीं। ऊपर अपने कमरे में, एक अकेली बत्ती के नीचे, वो फिर वहीं लौट आई जहाँ वो सबसे मज़बूत थी, नंबरों के बीच। ... सूर्यवंशी। वो होटल। हफ़्ते भर की मियाद। और कुछ, जो चुपके से 'बेचा' जा रहा था।
काम करते-करते एक पल को उसकी नज़र गलियारे के उस बंद दरवाज़े की तरफ़ चली गई, जिसका ताला दस साल से नहीं खुला था। ... और बाऊजी के आख़िरी लफ़्ज़ कानों में गूँज गए। 'मैंने आख़िरकार हिसाब बराबर कर दिया है, बेटा।' ... चर्वी ने आँखें फेर लीं। बाऊजी ने एक हिसाब बराबर किया था। पर उनके पीछे एक और हिसाब बाक़ी रह गया था, और वो हिसाब अब कोई बेच कर चुकाने चला था।
सुबह होने से पहले ही सेठी का फ़ोन आया। इस बार उनकी आवाज़ में वो पुराना सूखापन नहीं था। उसकी जगह एक ठंडी, भारी गंभीरता थी।
"चर्वी जी, आप जगी हुई हैं? ... मैं रात भर टाउनशिप के खातों में डूबा रहा। और मुझे कुछ मिला है। पर पहले आप बैठ जाइए। ये सुन कर खड़ा नहीं रहा जाता।"
"बोलिए, सेठी जी। ... मैं खड़े हो कर बुरी ख़बरें सुनने की आदी हूँ। दस साल से यही तो कर रही हूँ।"
"कुनाल ने पिछले हफ़्ते एक नई, अनजानी कंपनी के लिए राजवंश के सबसे गोपनीय काग़ज़ात खुलवाए हैं। एक 'डेटा-रूम', जहाँ कोई ख़रीदार किसी कारोबार को अंदर तक परखता है, ख़रीदने से पहले। ... और चर्वी जी, वो काग़ज़ात टाउनशिप के नहीं हैं। ... वो हमारे फ़्लैगशिप के हैं। अचार-मसालों वाले उस ब्रांड के, जिसे बाऊजी ने पचास साल पहले अपने हाथों से खड़ा किया था। इस पूरे साम्राज्य का ताज।"
चर्वी की साँस एक पल को थम गई। ... फ़्लैगशिप। वो अचार-मसालों का ब्रांड, जो हर तिमाही अपने मुनाफ़े से टाउनशिप की खाई को थोड़ा-थोड़ा भरता आया था। वो इकलौती चीज़ जो अब भी राजवंश को साँस दे रही थी। ... बाऊजी की पहली बनाई हुई चीज़, उनकी सबसे प्यारी। और कुनाल उसे... बेच रहा था।
"किसे, सेठी जी? ... वो नई कंपनी, जिसके लिए डेटा-रूम खुला है... उसके सबसे नीचे, सबसे पीछे कौन खड़ा है?"
"मैंने रात भर वही परत खुरची, चर्वी जी। कंपनी के ऊपर कंपनी, नाम के पीछे नाम, एक जाल जो सिर्फ़ छुपाने के लिए बुना गया था। ... पर सबसे नीचे, सबसे आख़िर में, एक ही घराना खड़ा है। ... सूर्यवंशी ग्रुप। राजवंश का सबसे पुराना दुश्मन।"
और अब पूरी तस्वीर चर्वी की आँखों के सामने खुल गई। ... कुनाल, ई.जी.एम. से पहले नक़द जुटाने के लिए, अपनी बादशाहत ख़रीदने के लिए, राजवंश के ताज का असली हीरा, बाऊजी की ज़िंदगी भर की मेहनत, चुपके से उसी दुश्मन के हाथ बेचने चला था, जो चालीस साल से इस घराने को निगलने के लिए घात लगाए बैठा था। ... वसीयत ने चर्वी को साम्राज्य सौंपा था। और कुनाल उस साम्राज्य को नीचे से बेच कर, उस वसीयत को ही एक बेमानी काग़ज़ बना देना चाहता था।
"चर्वी जी, अगर ये सौदा हो गया, तो ई.जी.एम. में कुर्सी बचे या न बचे, सब बेमानी हो जाएगा। ... सूर्यवंशी एक बार अंदर आ गए न, तो वो सिर्फ़ फ़्लैगशिप नहीं लेंगे। वो पूरे राजवंश की जड़ में बैठ जाएँगे। और बाऊजी का बनाया सब कुछ, उनके अपने बेटे के हाथों, उनके सबसे बड़े दुश्मन का हो जाएगा।"
"तो अब ये सिर्फ़ एक कुर्सी की लड़ाई नहीं रही, सेठी जी। ... कुनाल ने घर की देहरी पर भेड़िये को न्योता दे दिया है। ... और भेड़िया एक बार देहरी लाँघ ले, तो फिर वो एक बकरी नहीं चुनता। पूरा रेवड़ खा जाता है।"
बाहर, हवेली की ऊँची दीवारों के पार, लखनऊ की सुबह हो रही थी। पर चर्वी के कमरे में अब भी रात थी। ... उसने सोचा था कि जंग बोर्डरूम में है, वसीयत के काग़ज़ों में है, इंदुमती के छीने हुए चाबियों के गुच्छे में है। पर आज उसे पता चला, असली जंग तो कहीं और, चुपचाप छिड़ चुकी है। ... उसका अपना देवर, जिसे ये पूरा शहर मसीहा कहता था, इस साम्राज्य का ताज उसी दुश्मन के हाथ बेच रहा था जिससे बाऊजी ज़िंदगी भर लड़े थे। ... और सबसे ठंडा सच ये था, कि सूर्यवंशी का वो सुनहरा सूरज राजवंश की देहरी पर तभी उग सकता था, जब घर के अंदर किसी ने उसके लिए ख़ुद दरवाज़ा खोला हो। ... दुश्मन बाहर नहीं था। ... दुश्मन अंदर बैठा था, और उसने अभी-अभी ताले में चाबी घुमा दी थी।
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