अध्याय 11 / 12
गिरता ताश
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
ई.जी.एम. के दूसरे दौर में कुनाल चर्वी को ललकारता है कि गड़बड़ी है तो भरे बोर्ड में साबित करे, और चर्वी फ़्लैगशिप को अलग दीवार के पीछे कर के, बिना उस दस साल पुराने काग़ज़ को छुए, सूर्यवंशी वाला गुप्त सौदा और बाऊजी के जाली दस्तख़त मेज़ पर रख देती है, जिससे चमकते देवर का उधार का ताज सबके सामने ढह जाता है और मोशन बिना एक वोट डले मर जाता है। ठीक उसी जीत की देहलीज़ पर इंदुमती काग़ज़ की जंग छोड़ कर वो दस साल पुरानी अस्पताल की फ़ाइल निकालती है और रणबीर के मुँह पर ऐलान कर देती है कि उसकी पत्नी की महत्वाकांक्षा ने ही उस रात उनके पहले बेटे, राजवंश के वारिस, को मार डाला था, और बड़ी बहू की सबसे बड़ी जीत उस
भोर होने में अभी देर थी। ... सेठी के दफ़्तर की खिड़की के पार लखनऊ अभी नींद में था, और भीतर वो अकेला लैंप अब भी जल रहा था, जिसकी रोशनी में चर्वी सारी रात उतरती रही थी। ... मेज़ पर काग़ज़ों के वही पहाड़ थे। ... पर उन सबसे अलग, चर्वी की उँगलियों में एक अकेला पीला काग़ज़ था, दस साल पुराना, जिसके पैर में दो दस्तख़त थे। ... एक जिसे वो पहचानती थी। ... और एक जिसे वो आज तक नहीं जानती थी।
"रात भर से तुम उस एक काग़ज़ को बाक़ी ढेर में मिलने नहीं दे रही, चर्वी। ... बाक़ी सब मेज़ पर है, और वो अकेला तुम्हारी मुट्ठी में। ... मैं पचास साल से लोगों के हाथ पढ़ता आया हूँ। ... जो चीज़ इतनी कस कर पकड़ी जाए, वो या तो सबसे बड़ा हथियार होती है, या सबसे बड़ा ख़तरा। ... आज बोर्ड में इसे रखोगी?"
"नहीं, सेठी जी। ... ये आज मेज़ पर नहीं जाएगा। ... जिस काग़ज़ पर कुनाल के साथ एक दूसरा, पुराना हाथ भी दस्तख़त कर रहा हो, और मैं आज तक न जानती हूँ कि वो हाथ किसका है... वो हथियार नहीं है। ... वो एक जलता अंगारा है। ... जो इसे बिना जाने चलाएगा, वो अपना ही घर जला बैठेगा।"
"पर जिसका भी वो हाथ है, चर्वी, वो इसी घर का कोई अपना है। ... बाऊजी के बिलकुल क़रीब बैठा कोई। ... तुम दस साल जिसका बोझ ढोती रही, उसका आधा बोझ किसी और के कंधे पर था, और तुम्हें बताया तक नहीं गया।"
"इसीलिए आज नहीं, सेठी जी। ... जिस दिन मुझे उस हाथ का नाम मिलेगा, उस दिन ये काग़ज़ ख़ुद बोलेगा। ... आज इसे बोलने दिया, तो ये पूरा घर एक साथ ढह जाएगा, और मलबे के नीचे मिष्टी भी होगी। ... बाऊजी ने मुझसे यही घर बचाने को कहा था, गिराने को नहीं।"
और चर्वी ने वो पीला काग़ज़ मोड़ कर सेठी की तिजोरी के सबसे भीतरी ख़ाने में रख दिया, बाक़ी सब से अलग। ... एक ताला घूमा, और दस साल पुराना वो राज़ फिर अँधेरे में लौट गया, अपनी बारी का इंतज़ार करता। ... आज का दिन उस पुराने भूत के लिए नहीं था। ... आज का दिन एक ताज़ा जंग का था।
"तो फिर आज की जंग की बात करें। ... मैंने रात भर में फ़्लैगशिप को अलग करने का काग़ज़ी काम पूरा कर दिया है। ... वो अचार-मसालों वाला ब्रांड अब एक अलग दीवार के पीछे है, टाउनशिप के उस डूबते हिस्से से कटा हुआ। ... यानी अब अगर वो डूबता हिस्सा फटता भी है, तो उसका मलबा फ़्लैगशिप पर नहीं गिरेगा।"
"यानी अब मैं वो भरी हुई बंदूक चला सकती हूँ, सेठी जी। ... कल तक कुनाल की जालसाज़ी बैंकों के सामने रखना फ़्लैगशिप को अपने ही हाथों मारना था। ... आज नहीं। ... आज मैं बोर्ड को कुनाल का पूरा फ़रेब दिखा सकती हूँ, बिना बाऊजी की ज़िंदगी भर की कमाई को छुए। ... तटस्थ डायरेक्टरों को नाम और तारीख़ वाली लाश चाहिए थी न? ... आज उन्हें मिलेगी।"
"एक बात याद रखना। ... सिर्फ़ लाश दिखाने से गिनती नहीं बदलती। ... शेखर का प्रॉक्सी इंदुमती की मुट्ठी में है, कुनाल अपना वोट ख़ुद डालेगा, और परिवार का पूरा गुट एक तरफ़ है। ... सीधी गिनती में तुम्हें कुर्सी से हटाने वाला मोशन पास हो जाता है, चर्वी।"
"मैं गिनती जीतने नहीं जा रही, सेठी जी। ... मैं ये करने जा रही हूँ कि जब वो तटस्थ डायरेक्टर देखें कि ये परिवार राजवंश का ताज असल में किसे बेच रहा है, तो कोई भी ईमानदार हाथ कुनाल के हक़ में उठने की हिम्मत न करे। ... गिनती तभी काम आती है, जब लोग वोट डालने की हिम्मत रखते हों। ... मैं आज वही हिम्मत जमा देने जा रही हूँ।"
और एक पल को, उन काग़ज़ों के बीच, चर्वी को कुर्सी की कोई चाह नहीं थी। ... उसे तो बस उन चार हज़ार घरों के चूल्हे दिख रहे थे, जो इस डूबते कारोबार से जलते थे। ... और घर पर सोई हुई नन्ही मिष्टी का वो सवाल, कि क्या मम्मा सच में चोर है। ... वो आज ये जंग कुर्सी के लिए नहीं, उस एक सवाल के जवाब के लिए लड़ने जा रही थी।
"पचास बरस वकालत की है मैंने, चर्वी। ... इस बोर्डरूम में बड़े-बड़े शेर आते-जाते देखे हैं। ... पर एक बहू को, जिसे ये घर आज भी शरबत की ट्रे थमाता है, इसी मेज़ पर बैठ कर पूरे झुंड को हिलाते... ये पहली बार देखूँगा। ... चलो, चेयरपर्सन साहिबा। ... बोर्ड इंतज़ार कर रहा है।"
राजवंश हाउस के सबसे ऊपरी माले पर वो लंबी काँच की मेज़ थी, जिस पर दस साल से चर्वी के फ़ैसले किसी और के नाम से चलते आए थे। ... आज पहली बार वो ख़ुद उस मेज़ के सिरे पर थी। ... एक-एक कर के परिवार भीतर आया, इस यक़ीन के साथ कि आज इस बहू का तमाशा ख़त्म होगा। ... कुनाल की इत्र की लहर, इंदुमती की तनी हुई रीढ़, और मेज़ के दूसरे छोर पर, चुपचाप बैठा रणबीर।
"तो, चेयरपर्सन साहिबा। ... आपके नाटक का दूसरा दौर। ... दस साल आपने घर की चाबियाँ सँभालीं, फिर दो हफ़्ते ये कुर्सी सँभाल ली, बहुत हुआ। ... अगर आपके पास किसी की कोई गड़बड़ी का एक भी सबूत है, तो रखिए इस मेज़ पर, सबके सामने। ... और अगर नहीं है... तो चुपचाप ये कुर्सी छोड़ कर वापस रसोई में जाइए, भाभी।"
"बहुत हो गया, चर्वी। ... एक बहू मेरे पति की कुर्सी पर काफ़ी दिन बैठ ली। ... आज ये बोर्ड तय करेगा कि इस घर की बागडोर एक बहू के हाथ में रहेगी या राजवंश के ख़ून के हाथ में। ... खड़ी हो, और जो कहना है कह ले, फिर हम वोट डालेंगे।"
चर्वी उठी। ... दस साल इसी मेज़ के किसी कोने से, एक फ़ोन पर नंबर भेज कर उसने ये पूरा साम्राज्य चलाया था। ... आज वो उसके सिरे पर खड़ी थी। ... और जैसे ही वो बोली, वो नरम, झुकी हुई बड़ी बहू कहीं पीछे रह गई, और उसकी जगह वो सधी हुई, ठंडी रणनीतिकार खड़ी हो गई, जिसे इस घर ने कभी देखा ही नहीं था।
"देवर जी ने अभी कहा, गड़बड़ी का सबूत मेज़ पर रखो। ... अच्छा। ... सबूत यहीं है।" ... "राजवंश का ताज, बाऊजी का अचार-मसालों वाला फ़्लैगशिप, इस वक़्त चुपके से बेचा जा रहा है। ... और ख़रीदार कोई और नहीं, हमारा सबसे पुराना दुश्मन, सूर्यवंशी ग्रुप है। ... उनके लिए राजवंश का डेटा-रूम खोला गया है, इसी घर के भीतर से।"
मेज़ के बीचोंबीच बैठे वो तटस्थ डायरेक्टर, जो पिछली बार सिर्फ़ सूर्यवंशी की एक फुसफुसाहट पर सहम गए थे, इस बार पत्थर हो गए। ... एक फ़ाइल एक हाथ से दूसरे हाथ में सरकने लगी। ... तारीख़ें, दस्तावेज़, सूर्यवंशी के दफ़्तर के नाम। ... कमरे की हवा एक पल में भारी हो गई।
"ये... ये सरासर झूठ है। ... भाभी को बस काग़ज़ों से खेलना आता है, और कुछ नहीं। ... कोई डेटा-रूम-वेटा नहीं खुला। ... ये सब मुझे बदनाम करने की साज़िश है, ताकि ये कुर्सी पर बनी रहें। ... माँ, आप देख रही हैं न, ये औरत क्या कर रही है?"
"बदनाम? ... चलो, एक और काग़ज़ देखते हैं, देवर जी। ... पिछले छह महीने की बैंक गारंटियाँ। ... हर महीने एक, और हर एक पर मुखिया बाऊजी के दस्तख़त, बैंकों को यक़ीन दिलाते हुए कि राजवंश का नाम टाउनशिप के पीछे खड़ा है।" ... "बस एक छोटी सी दिक़्क़त है। ... इन आख़िरी छह महीनों में बाऊजी अपने हाथ से चम्मच तक नहीं उठा पाते थे। ... मैं ख़ुद उन्हें दवा खिलाती थी। ... तो फिर ये दस्तख़त किसने बनाए, देवर जी?"
और वो चिट्ठियाँ एक क़तार में मेज़ पर बिछ गईं, एक मरते हुए बूढ़े के नाम पर बनाए गए झूठे दस्तख़त। ... कमरे में बैठे हर आदमी को गिनती आती थी। ... टाउनशिप का वो डूबता हिस्सा किसके नाम था, बैंकों को कौन चुप रखता आया था, सूर्यवंशी का दरवाज़ा किसने खोला था। ... हर तीर घूम कर एक ही आदमी की तरफ़ मुड़ रहा था, उसी चमकते देवर की तरफ़, जो अब तक तालियाँ बटोरता आया था।
"ये... ये सब पुराने काग़ज़ हैं, इनका कोई मतलब नहीं।" ... "चर्वी, तुमने... तुमने ये सब जमा कब..."
और पहली बार, दस साल में पहली बार, इंदुमती ने उस बहू को देखा और उसमें रसोई की नौकरानी नहीं दिखी। ... उसे उससे दस क़दम आगे चलती एक रणनीतिकार दिखी, जिसने पूरे घर को बिसात की तरह बिछा रखा था, और किसी को भनक तक न लगी। ... और मेज़ के दूसरे छोर पर, रणबीर अपनी ही पत्नी को ऐसे देख रहा था, जैसे दस साल में पहली बार उसे सच में देख रहा हो।
"मैंने... मैंने सिर्फ़ कंपनी बचाने की कोशिश की थी। ... टाउनशिप डूब रहा था, बैंक गला दबा रहे थे, किसी को तो कुछ करना था। ... माँ, मैंने ये सब आपके लिए, इस घर के लिए किया..." ... "...मैं फँस गया था। ... मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा था।"
और वो एक पल था जिसमें चमकते देवर का दस साल पुराना उधार का ताज सबके सामने गिर पड़ा। ... वो आदमी जिसे पूरा शहर राजवंश का रखवाला मानता था, अब भरे बोर्ड में गिड़गिड़ा रहा था। ... तटस्थ डायरेक्टरों की नज़रें झुक गईं। ... इस आदमी के हक़ में अब कोई ईमानदार हाथ नहीं उठने वाला था। ... कुर्सी से चर्वी को हटाने वाला मोशन, बिना एक भी वोट डले, वहीं दम तोड़ गया।
और इस पूरी जीत में, चर्वी ने वो दस साल पुराना पीला काग़ज़ एक बार भी नहीं छुआ। ... वो अब भी सेठी की तिजोरी में बंद था, अपने अनजाने दूसरे हाथ के साथ। ... उसने आज बस उतना ही खोला था, जितने से घर को गिराए बिना जीता जा सके। ... बाक़ी राज़ अभी उसकी अपनी मुट्ठी में था।
"रुको।" ... "ये सब... ये पूरा कारोबार... दस साल... ये तुम अकेले सँभालती रही? ... और हम सब कुनाल की तालियाँ बजाते रहे? ... चर्वी, मुझे... मुझे बताओ, ये सच है?"
"अब सुनाई दे रहा है, रणबीर? ... दस साल जो इसी मेज़ के कोने में बैठी थी, वो मैं ही थी। ... तुमने कभी मुड़ कर देखा ही नहीं।" ... "...देर से ही सही।"
और एक पल को ऐसा लगा जैसे उस काँच की मेज़ पर, इतने बरसों की बर्फ़ पिघलने ही वाली हो। ... रणबीर की आँखों में वो सवाल था, जो शायद इस टूटे ब्याह की पहली सीढ़ी बन सकता था। ... चर्वी की जीत अब सिर्फ़ बोर्ड की नहीं रह गई थी। ... पर इसी घर ने उसे सिखाया था कि जीत की देहलीज़ पर ही ये घर सबसे गहरा वार करता है।
और ठीक उसी लम्हे, जब कमरा चर्वी की तरफ़ झुक रहा था, इंदुमती धीरे से उठ खड़ी हुई। ... उसने काग़ज़ की जंग हार दी थी, ये उसकी आँखों में साफ़ था। ... इसलिए उसने अब काग़ज़ की जंग लड़नी बंद कर दी। ... उसने अपने पास रखे बैग में हाथ डाला, और एक पुराना, फीते से बँधा भूरा लिफ़ाफ़ा निकाला।
"बहुत हो गईं कंपनी की बातें। ... डेटा-रूम, गारंटी, दस्तख़त... ये सब काग़ज़ हैं, बेटा। ... मैं तुझे एक और काग़ज़ दिखाती हूँ।" ... "ये दस साल पुराना है। ... और इसमें नंबर नहीं, ख़ून लिखा है।"
और उस फीते वाले लिफ़ाफ़े से इंदुमती ने एक पुरानी, पीली अस्पताल की फ़ाइल निकाली, और उसे काँच की मेज़ पर रणबीर की तरफ़ सरका दिया। ... कमरे की सारी हवा जैसे एक पल को रुक गई। ... अभी-अभी जो जीत चर्वी के हाथ में आई थी, उस पर एक ठंडी परछाईं गिरने लगी।
"ये... ये क्या है, माँ? ... ये अस्पताल की फ़ाइल यहाँ, इस बोर्ड की मेज़ पर..."
"हाँ, भैया, पढ़िए इसे। ... माँ बिलकुल ठीक कह रही हैं। ... इस कंपनी-कंपनी के शोर में हम असली सच भूल रहे हैं। ... ये औरत आख़िर है कौन, पहले ये तो जान लीजिए।"
"ये उसी रात की फ़ाइल है, रणबीर। ... दस साल पहले वाली उस रात की। ... जिस रात तेरा पहला बेटा, इस राजवंश का इकलौता वारिस, इस दुनिया में आँख खोलने से पहले ही चला गया।" ... "और जिस औरत की तुम सब आज तालियाँ बजा रहे हो, इसी की भूख, इसी की महत्वाकांक्षा उस रात इसे आराम की जगह दफ़्तर के काग़ज़ों तक खींच ले गई। ... और उसी रात तेरा बेटा, तेरा वारिस, इसकी इसी भूख की भेंट चढ़ गया।"
और वो पूरा बोर्डरूम, जो अभी-अभी चर्वी ने जीता था, रणबीर की आँखों से एक पल में मिट गया। ... सूर्यवंशी, गारंटी, कुनाल की जालसाज़ी, सब कहीं पीछे छूट गया। ... अब उसकी आँखों में सिर्फ़ वो पीली फ़ाइल थी, और उसमें लिखा एक शब्द, बेटा। ... जो आदमी अभी-अभी दस साल में पहली बार अपनी पत्नी को सच में देख रहा था, उसका चेहरा फिर से पत्थर होने लगा।
और आज पहली बार, उस पूरे दिन में पहली बार, चर्वी की वो सधी हुई, रणनीतिकार वाली चादर फट गई। ... क्योंकि ये वो एक ज़ख़्म था जिसे वो अपने नंबरों से नहीं लड़ सकती थी। ... उसने रणबीर की तरफ़ देखा, और उसका गला रुँध गया।
"रणबीर... ये सच नहीं है। ... उस रात जो हुआ, वो..." ... "...वो मैं तुम्हें आज भी नहीं बता सकती। ... सच बता दूँ, तो जो इस घर ने छुपाया है, वो सब राख हो जाएगा।"
और रणबीर वहीं जम कर रह गया, एक हाथ में वो फ़ाइल जो उसकी पत्नी को उसके बेटे का क़ातिल बता रही थी, और आँखों में वो जीत जो अभी उसी पत्नी ने इस घर के लिए हासिल की थी। ... एक तरफ़ पूरा बोर्ड कह रहा था, यही औरत सच्ची है। ... दूसरी तरफ़ उसकी अपनी माँ का काँपता हाथ कह रहा था, यही औरत क़ातिल है। ... और वो इन दोनों सच्चाइयों के बीच, पत्थर की तरह जम गया।
चर्वी ने बोर्ड जीत लिया था। ... कुनाल का उधार का ताज गिर चुका था, सूर्यवंशी का दरवाज़ा खुल कर सबके सामने आ चुका था, कुर्सी उसकी थी। ... पर उसी जीत की देहलीज़ पर, इंदुमती ने वो एक पत्ता खेल दिया था, जिसके आगे कोई बही-खाता, कोई गारंटी, कोई सबूत नहीं टिकता। ... एक माँ का, अपने बेटे के कान में उँडेला गया, दस साल पुराना ज़हर। ... और उस काँच की मेज़ पर, बड़ी बहू की सबसे बड़ी जीत, उसके सबसे गहरे ज़ख़्म के नीचे दफ़्न होने लगी।
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