अध्याय 8 / 12
देवरानी की चाल
बड़ी बहू द्वारा Avni Oberoi
कुनाल के कमज़ोर पड़ते ही मँझली बहू किरती अपनी चाल चलती है, और अपने सीधे-सादे पति शेखर को घर का बीच का वारिस बनाने के लिए इंदुमती और बिरादरी को अपने पाले में करने लगती है, जिससे दो पालों की जंग तीन हो जाती है। चर्वी को बोर्ड में एक ईमानदार वोट चाहिए, इसलिए वो शेखर को परखती है, जो एक पल के लिए सच के साथ उसके साथ खड़ा होने का वादा कर देता है, पर उसी रात किरती के दबाव में अपना प्रॉक्सी चर्वी के बजाय इंदुमती के नाम कर देता है, और चर्वी को इस दग़ा की ख़बर सिर्फ़ मेज़ पर आई एक ठंडी वोट-गिनती से मिलती है।
सूर्यवंशी की काली गाड़ी को गए अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे। ... चर्वी की आँखें दो तरफ़ लगी थीं, एक फाटक पर, जहाँ वो भेड़िया फूल लिए दस्तक दे कर गया था, और एक बोर्डरूम पर, जहाँ वोट अब भी काँटे पर अटका था। ... पर इस घर में एक तीसरा खिलाड़ी भी था, जिस पर अभी किसी की नज़र नहीं थी।
किरती। ... इस घर की मँझली बहू, शेखर की पत्नी, जिसकी कमर पर आज वो चाबियाँ बँधी थीं, जो कभी माँजी ने चर्वी की कमर से छीन कर उसे सौंपी थीं। ... दस दिन से वो चुपचाप तमाशा देख रही थी, और उसी तमाशे में उसे अपने सीधे-सादे पति के लिए एक चमकता रास्ता दिख गया था।
चर्वी अपने कमरे में बोर्ड की फ़ाइलों में डूबी थी, जब दरवाज़े पर एक मीठी, खनकती आवाज़ आई। ... किरती, इलायची वाली चाय की ट्रे लिए, ऐसे मुस्कुराती भीतर आई, जैसे उससे बड़ी हमदर्द इस घर में कोई हो ही नहीं।
"दीदी! ... फिर इन काग़ज़ों में सिर खपा रही हैं। ... लाइए, ये चाय पीजिए, ख़ास आपके लिए बनाई है। ... सच कहूँ, मुझसे आपका ये हाल देखा नहीं जाता। ... पूरा घर आपके पीछे पड़ा है, माँजी नाराज़, कुनाल भैया नाराज़। ... और आप अकेली इतना बड़ा बोझ ढो रही हैं।"
"चाय के लिए शुक्रिया, किरती। ... पर तुम इतनी सुबह हमदर्दी करने नहीं आईं। ... जो कहने आई हो, सीधे कह दो। ... मेरे पास आज हमदर्दी सुनने का वक़्त कम है।"
"मैं तो बस घर की भलाई की बात कर रही हूँ, दीदी। ... ये जंग किसी के हित में नहीं। ... न आप कुर्सी छोड़ रही हैं, न माँजी कुनाल भैया को हटने दे रही हैं, और इस खींचतान में पूरा राजवंश डूब जाएगा। ... तो क्यों न कोई बीच का रास्ता निकालें? ... कोई तीसरा, जो इस घर का अपना ख़ून हो, और जिसका दामन बिलकुल साफ़ हो।"
और चर्वी एक पल में समझ गई कि किरती किसका नाम लेने आई है। ... शेखर। ... वो नरम, हर बात पर हाँ में सिर हिलाने वाला मँझला बेटा, जिसे किरती बरसों से उँगलियों पर नचाती आई थी। ... दो पाले पहले से थे, आज एक तीसरा खुल रहा था, और उसकी सूत्रधार यही मुस्कुराती देवरानी थी।
"मेरा मतलब है, शेखर। ... न बड़ा बेटा, न सबसे छोटा, बीच का, सबका अपना। ... न उस पर वसीयत का दाग़, न कुनाल भैया जैसी बदनामी। ... आप कुर्सी उसके नाम कर दीजिए, और ये लड़ाई आज ख़त्म। ... आप इज़्ज़त से, चैन से, अपनी मिष्टी के साथ रह सकती हैं। ... इससे अच्छा सौदा आपको कोई नहीं देगा।"
"तुम्हारी फ़िक्र के लिए शुक्रिया, किरती। ... पर इस घर की रसोई मैं दस साल से चला रही हूँ। ... और मुझे पता है, कौन-सा बर्तन आग पर चढ़ाने लायक है, और कौन-सा सिर्फ़ ताक़ पर सजाने लायक। ... शेखर मेरे देवर हैं, मुझे उनसे कोई गिला नहीं। ... पर डूबते साम्राज्य की पतवार, सजावट के बर्तन के हाथ में नहीं थमाई जाती।"
"सजावट? ... मेरे पति सजावट हैं आपके लिए, दीदी? ... ख़ैर। ... आप सोचिए, आराम से। ... मैं तो बस घर की भलाई चाहती हूँ। ... और हाँ, चाय ठंडी हो रही है, दीदी।"
और किरती, चाबियाँ झुलाती, उतनी ही मीठी मुस्कान के साथ लौट गई। ... पर वो जाते-जाते चर्वी को एक चीज़ दे गई थी, जिसका उसे ख़ुद अंदाज़ा नहीं था। ... चर्वी को एक ईमानदार वोट की तलाश थी, और किरती अभी-अभी, अपने ही हाथों, उसे वो नाम पकड़ा गई थी। ... शेखर।
दोपहर ढले चर्वी रसोई में उतरी, जहाँ रामदुलारी एक बड़े पतीले को चलाती बड़बड़ा रही थी। ... इस तपते घर में यही एक कोना था, जहाँ चर्वी दो पल को सिर्फ़ बिटिया बन सकती थी।
"आ गईं बिटिया। ... सुनिए इस घर का नया तमाशा। ... वो मँझली बहू, किरती, कल से माँजी के कान में कुछ फुसफुसाती फिर रही है। ... और बिरादरी की बूढ़ी फूफियों को चाय पर बुला-बुला कर पिला रही है, कि इस घर को अब एक सीधे-सच्चे बेटे की ज़रूरत है। ... मतलब, अपने शेखर बाबू की।"
"जानती हूँ, अम्मा। ... आज सुबह वही ट्रे ले कर मेरे कमरे तक भी पहुँच गई थी। ... इस घर में अब हर कोई अपनी बिसात बिछा रहा है। ... देखना, कल को रामू का बाप भी अपना अलग पाला बना लेगा।"
"पर ये किरती सबसे ख़तरनाक है, बिटिया। ... कुनाल बाबू का ग़ुस्सा चेहरे पर दिखता है, इसका ज़हर मीठा है। ... और एक बात, वो त्रिशा बिटिया, बोर्ड वाली रात के बाद से कुनाल बाबू के कमरे की तरफ़ झाँकती तक नहीं। ... कुछ तो बदल रहा है इस घर में।"
"पर मुझे इन चालों से इतना डर नहीं लगता, बिटिया। ... मुझे तो माँजी के कमरे में बंद, फीते वाले उस भूरे लिफ़ाफ़े से डर लगता है। ... वो दस साल पुरानी बात, वो जो उस रात हुई थी। ... जब से वो लिफ़ाफ़ा घर में आया है, मेरी छाती में एक हूक-सी उठती है।"
"उस लिफ़ाफ़े का सामना मैं करूँगी, अम्मा, जब वक़्त आएगा। ... माँजी को लगता है, वो काग़ज़ मेरा सबसे कमज़ोर हिस्सा है। ... पर वो भूल जाती हैं, कि सबसे गहरे ज़ख़्म पर जमा पत्थर, सबसे सख़्त होता है। ... तुम उस रात वहाँ थीं। ... जिस दिन मुझे उस सच की गवाही चाहिए होगी, क्या तुम मेरे साथ खड़ी रह पाओगी?"
"आपके लिए जान भी दे दूँ, बिटिया। ... पर उस रात के सच का एक सिरा माँजी के हाथ में है, और एक सिरा मेरे इसी बूढ़े सीने में दफ़न है। ... और उसे खोलना, इस पूरे घर को आग लगाना है। ... मुझे बस थोड़ी हिम्मत जुटा लेने दीजिए।"
चर्वी ने बुढ़िया का काँपता हाथ बस एक बार दबाया। ... तभी बाहर मिष्टी की खिलखिलाती आवाज़ आई, प्रिया को समझाती हुई, कि मेरी मुम्मा चोर नहीं है, और जो कहेगा उससे कट्टी। ... दूर बोर्ड में उसका बिछाया चारा अब भी चल रहा था, कुनाल अब भी उन झूठे नंबरों के पीछे भाग रहा था। ... पर आज उसे सबसे ज़्यादा एक ईमानदार वोट चाहिए था। ... और उसके लिए, उसे शेखर तक ख़ुद पहुँचना था।
शेखर को ढूँढ़ना मुश्किल नहीं था, वो हमेशा वहीं मिलता था, जहाँ सबसे कम शोर हो। ... आज शाम वो हवेली की छत पर, अकेला, रेलिंग से टिका, लखनऊ की धुँधलाती रोशनियों को देख रहा था। ... चर्वी धीरे से उसके पास जा खड़ी हुई।
"भाभी? ... आप यहाँ? ... मैं बस थोड़ी हवा खाने आ गया था, नीचे घर में आजकल दम घुटता है। ... मुझे पता है किरती सुबह आपके कमरे में गई थी। ... और ये भी पता है कि उसने क्या कहा होगा। ... मुझे माफ़ कर दीजिए, भाभी।"
"माफ़ी किस बात की, शेखर? ... हर औरत अपने आदमी के लिए लड़ती है, ये तो अच्छी बात है। ... मैं इल्ज़ाम लगाने नहीं आई। ... बस बरसों बाद तुमसे दो पल बात करने आई हूँ। ... इस घर में तुम अकेले हो, जिसने कभी मुझ पर आवाज़ नहीं उठाई।"
"आवाज़ किस मुँह से उठाता, भाभी? ... हर ईंट जानती है कि दस साल किसने इस घर को कंधों पर उठाए रखा। ... जिस रात कारखाने में हड़ताल हुई, आधी रात को आप अकेली मज़दूरों के बीच गई थीं। ... कुनाल नहीं, मैं नहीं, आप। ... और सुबह अख़बार में तस्वीर छपी कुनाल की। ... मैंने ये सब अपनी आँखों से देखा है, भाभी।"
"बाऊजी जानते थे, शेखर। ... आख़िरी हफ़्ते उन्होंने मेरा हाथ थाम कर कहा था, कि बेटा, दस साल की चुप्पी माँग कर मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। ... वो जानते थे, तालियाँ किसकी पीठ पर पड़नी चाहिए थीं। ... तुम भी जानते हो, बस अब तक ज़ुबान पर लाने की हिम्मत नहीं की।"
और चर्वी ने पहली बार उस मँझले बेटे की आँखों में वो चीज़ देखी, जिसकी उसे तलाश थी। ... इल्ज़ाम नहीं, लालच नहीं, सिर्फ़ एक थका हुआ सच। ... दस साल में पहली बार, इस घर का एक बेटा मान रहा था, कि साम्राज्य किसने बचाया, और तालियाँ किसने बटोरीं।
"शेखर, मैं तुमसे कुर्सी नहीं माँग रही, न वोट की भीख। ... सिर्फ़ एक चीज़ माँग रही हूँ, सच के साथ खड़े रहने की हिम्मत। ... बोर्ड की अगली बैठक में तुम्हें मेरी तरफ़दारी नहीं करनी। ... बस वो कह देना, जो तुमने अपनी आँखों से देखा है। ... सिर्फ़ सच। ... क्या इतना कर सकते हो?"
"आप सही कह रही हैं, भाभी। ... मैं ज़िंदगी भर आँखें मूँदे रहा। ... एक बार, सिर्फ़ एक बार, आँख खोल कर खड़ा होना चाहता हूँ। ... मैं झूठ नहीं बोलूँगा। ... बोर्ड में सबके सामने कहूँगा कि इस घर को आपने बचाया है, भाभी। ... मेरा वादा।"
और उस एक पल के लिए चर्वी को लगा कि इस अँधेरे में एक ईमानदार हाथ उसके साथ खड़ा हो गया है। ... पर छत पर किए गए वादे, अक्सर सीढ़ियों से नीचे उतरते-उतरते कमज़ोर पड़ जाते हैं। ... और उस घर में, हर सीढ़ी के नीचे, एक मुस्कुराती देवरानी इंतज़ार कर रही थी।
उसी रात किरती ने शेखर के चेहरे पर वो नर्मी पढ़ ली, जो उसे पसंद नहीं आई। ... एक हिम्मत, जो पहले कभी नहीं थी। ... वो समझ गई कि उसका नरम पति आज किसी और की तरफ़ एक क़दम बढ़ा आया है, और उसने अपने सबसे मीठे, सबसे ज़हरीले हथियार निकाल लिए।
"क्या हुआ जी? ... आज बड़ी भाभी से छत पर बड़ी लंबी बात हो रही थी। ... क्या समझा गईं वो आपको? ... वो बहुत सयानी हैं। ... दो मीठे बोल बोल कर किसी को भी उँगली पर नचा लेती हैं। ... आपको भी नचा लिया न?"
"वो नचा नहीं रहीं, किरती। ... बस सच बोलने को कहा है। ... और तुम भी जानती हो कि सच क्या है, इस घर को उन्होंने बचाया है। ... मैं बोर्ड में झूठ नहीं बोलूँगा। ... इस बार नहीं।"
"वाह। ... सच। ... और उस सच में हमारी बेटी कहाँ है, जी? ... कल को जब वो पूरे घर की मालकिन बन जाएँगी, तब हमारी क्या औक़ात रह जाएगी? ... एक पिछले कमरे की बहू, और उसका नाम का पति। ... और हमारी बेटी ज़िंदगी भर उस मालकिन की बेटी के पीछे घूमेगी, जिसके बाप ने सच का तमग़ा पहन कर अपना ही घर गिरवी रख दिया।"
"और माँजी ग़लत क्या कह रही हैं? ... वसीयत एक मरते बूढ़े का फ़ितूर है। ... कुर्सी पर एक बहू? ... कभी नहीं। ... बस एक बार माँजी के साथ खड़े हो जाओ, अपना प्रॉक्सी उनके नाम कर दो। ... फिर न कुनाल भैया की चलेगी, न बड़ी भाभी की। ... इस घर का अगला मालिक कौन होगा? ... आप। ... अपनी बेटी के लिए इतना भी नहीं कर सकते?"
और वहीं, उस नरम बेटे की छत पर बनी सारी हिम्मत, अपनी बेटी के नाम के आगे, मोम की तरह पिघल गई। ... रात के किसी पहर, काँपते हाथों से, शेखर ने एक काग़ज़ पर दस्तख़त किए। ... अपना प्रॉक्सी, पर चर्वी के नाम नहीं, जिससे उसने घंटे भर पहले वादा किया था। ... इंदुमती के नाम। ... और स्याही सूखने से पहले किरती वो काग़ज़ ले कर, दबे पाँव, माँजी के कमरे की ओर चल पड़ी।
अगली सुबह चर्वी मेज़ पर बैठी बोर्ड की तैयारी कर रही थी। ... कल रात छत पर मिली वो ईमानदार हामी अब भी उसके भीतर एक छोटी-सी लौ की तरह जल रही थी। ... दस साल में पहली बार, इस घर का एक अपना उसके साथ खड़ा होने वाला था। ... तभी दरवाज़े पर सेठी की दस्तक हुई, हाथ में एक फ़ाइल लिए।
"गुड मॉर्निंग, चर्वी जी। ... माफ़ कीजिए इतनी सुबह, पर ये आपको तुरंत देखना चाहिए। ... प्रॉक्सी वोटों की नई गिनती आ गई है। ... रात भर में समीकरण बदल गया है। ... एक वोट, जो अब तक तटस्थ था, कल रात किसी के पाले में चला गया है।"
"जानती हूँ, सेठी जी। ... कल रात मैंने ख़ुद उस वोट से बात की थी। ... शेखर। ... पहली बार इस घर का एक बेटा सच के साथ खड़ा होने को राज़ी हुआ है। ... दिखाइए। ... आज कम से कम एक अच्छी ख़बर तो होगी।"
चर्वी ने वो फ़ाइल एक हल्की-सी जीती हुई मुस्कान के साथ उठाई। ... और जैसे-जैसे उसकी नज़र उस ठंडी गिनती की लकीर पर उतरती गई, वो मुस्कान जमती चली गई। ... शेखर का नाम वहाँ था, उसका प्रॉक्सी वहाँ था। ... पर सामने चर्वी का नाम नहीं लिखा था, न ही तटस्थ का। ... वहाँ, काली स्याही में, एक ही नाम छपा था। ... इंदुमती राजवंश।
"इंदुमती के नाम... कल रात, इसी छत के नीचे, उसने मेरा हाथ थाम कर वादा किया था, सेठी जी। ... सच बोलने का वादा।"
"वादे छत पर होते हैं, चर्वी जी। ... और दस्तख़त बिस्तर पर। ... ये प्रॉक्सी रात के तीसरे पहर दर्ज हुआ है, आपसे बात करने के कुछ ही घंटे बाद। ... किसी ने उस आदमी को रात-रात में तोड़ दिया, इससे पहले कि उसकी हिम्मत सुबह की रोशनी देख पाती।"
"और इसका मतलब समझती हैं आप? ... कल तक बोर्ड का काँटा ठीक बीच में झूल रहा था। ... आज सुबह वो एक वोट आपकी तरफ़ आने के बजाय, उनके पलड़े में जा गिरा है। ... और एक झुका हुआ काँटा, अब सीधा आपके ख़िलाफ़ झुक चुका है।"
और चर्वी को पूछने की ज़रूरत नहीं थी कि उस आदमी को किसने तोड़ा। ... वो मीठी आवाज़, वो इलायची वाली चाय, वो कमर पर झूलती चाबियाँ। ... किरती। ... शेखर को उसने नहीं, उसकी अपनी बेटी के डर ने तोड़ा था, और उस डर को हवा किरती ने दी थी। ... देवरानी की चाल पूरी हो चुकी थी, और उस तीसरे पाले ने अपना पहला ही वार सीधे चर्वी के सबसे भोले भरोसे पर किया था।
चर्वी ने फ़ाइल धीरे से मेज़ पर रखी, और हथेली उस पर टिका दी, जैसे कोई ठंडा पड़ता ज़ख़्म हो। ... कल रात एक बेटे ने कहा था, इस घर को आपने बचाया है, भाभी, मेरा वादा। ... और आज सुबह, उसी बेटे का नाम, उसी को हराने वाली गिनती में सबसे ऊपर लिखा था। ... दस साल के इल्ज़ाम, ताने, नफ़रत, सब चर्वी ने पत्थर बन कर पी लिए थे। ... पर आज पहली बार, उसकी सबसे बड़ी हार की ख़बर किसी दुश्मन ने नहीं, एक ठंडे काग़ज़ पर छपी एक अकेली, दग़ाबाज़ लकीर ने दी थी।
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