Chapter 10 of 12
छुपा हिसाब
ई.जी.एम. के दूसरे दौर की दौड़ में चर्वी और सेठी टाउनशिप के असली खातों में उतरते हैं और पाते हैं कि कुनाल का छेद कितना गहरा है, और ये कि बैंकों को चुप रखने के लिए वो महीनों से बाऊजी के दस्तख़त बना रहा है, यानी एक ही काग़ज़ में कुनाल को हमेशा के लिए ख़त्म करने का ज़हर है। पर चर्वी जानती है कि ये हथियार अभी चलाया तो फ़्लैगशिप ढह कर सीधे सूर्यवंशी के खुले डेटा-रूम में जा गिरेगा, इसलिए वो फंदा हाथ में लिए मुस्कुराती रहती है और कुनाल को जीतने का सपना देखने देती है। आख़िर में उसी जालसाज़ी वाली फ़ाइल की जिल्द के पीछे चिपका, दस साल पुराना एक ऐसा काग़ज़ निकलता है जो चर्वी ने कभी नहीं देखा था, वो मूल गार
रात के ठीक दो बजे थे। ... सेठी के दफ़्तर के पिछले कमरे में एक अकेला लैंप जल रहा था, और उसके इर्द-गिर्द फ़ाइलों के पहाड़। ... बोर्ड की उस अधूरी जीत ने चर्वी को दिन नहीं, बस कुछ थमी हुई साँसें दी थीं। ... ई.जी.एम. का दूसरा दौर सिर पर था, और इस बार अधर में लटका वो मोशन पक्का हो जाना था, किसी न किसी तरफ़। ... चर्वी की उँगली टाउनशिप वाली बही के एक नंबर पर आ कर जम गई।
"इस टाउनशिप और रिटेल वाले हिस्से को काग़ज़ पर देखो, चर्वी, तो ये अब भी साँस लेता लगता है। ... पर परत हटाओ, तो ये एक लाश है, जिसे कोई तारों से खड़ा किए हुए है। ... वो आख़िरी वाला आँकड़ा एक बार फिर पढ़ो ज़रा। ... मुझे लगता है मेरी उम्र मेरी आँखों से झूठ बुलवा रही है।"
"तुम्हारी आँखें सच बोल रही हैं, सेठी जी। ... छेद उतना नहीं है जितना मैं इसे दस साल से सँभालती आई थी। ... ये उससे कहीं ज़्यादा गहरा हो चुका है। ... किसी ने पिछले कुछ महीनों में इसे भीतर ही भीतर निचोड़ लिया है। ... ठीक उसी वक़्त, जब बाऊजी बिस्तर पकड़ चुके थे और किसी की उन पर नज़र नहीं थी।"
और ये उस औरत के लिए एक ठंडा मज़ाक़ था। ... दस साल तक चर्वी ने इसी डूबते हिस्से को चुपके से, अपनी जान लगा कर ज़िंदा रखा था, ताकि इसके चार हज़ार मज़दूरों के चूल्हे जलते रहें। ... और जिसे वो दस साल में डूबने नहीं देती, उसे किसी ने चंद महीनों में लगभग तले तक ख़ाली कर दिया था।
"और वो कोई और नहीं, ये तुम भी जानती हो और मैं भी। ... पर जानना एक बात है, चर्वी, और बोर्ड के सामने साबित करना दूसरी। ... पिछली बार तटस्थ डायरेक्टर सिर्फ़ सूर्यवंशी की एक फुसफुसाहट पर सहम गए थे। ... इस बार उन्हें एक लाश चाहिए, नाम और तारीख़ के साथ। ... वरना मोशन उधर झुक जाएगा, और तुम कुर्सी से बाहर।"
"तो लाश वहीं से निकलेगी जहाँ इसे दफ़नाया गया है। ... बैंक। ... सेठी जी, पिछले छह महीने की सारी गारंटी और रोल-ओवर की चिट्ठियाँ निकालो। ... जिस आदमी ने इस हिस्से को खोखला किया है, उसे बैंकों को चुप रखना पड़ा होगा। ... और बैंक चुप तभी रहते हैं, जब कोई उन्हें बार-बार नए काग़ज़ पर दस्तख़त कर के भरोसा दिलाता रहे।"
सेठी ने एक मोटी फ़ाइल खोली और चिट्ठियाँ एक-एक कर के मेज़ पर, एक क़तार में रखनी शुरू कीं। ... छह महीने, हर महीने की एक गारंटी, हर एक बैंक को यक़ीन दिलाती हुई कि राजवंश का नाम अब भी इसके पीछे खड़ा है। ... और हर एक के नीचे, वही एक दस्तख़त। ... यशवंत राजवंश। ... बाऊजी।
"देखो। ... जनवरी, फ़रवरी, मार्च... हर महीने बाऊजी की गारंटी। ... इन्हीं दस्तख़तों के दम पर बैंकों ने अपनी घंटी नहीं बजाई, वरना ये पूरा हिस्सा महीनों पहले नीलाम हो चुका होता। ... पर एक बात मेरी समझ में नहीं आती, चर्वी। ... इन आख़िरी महीनों में तो बाऊजी..."
"इन आख़िरी महीनों में बाऊजी हाथ से चम्मच तक नहीं उठा पाते थे, सेठी जी। ... मैं ख़ुद उन्हें अपने हाथ से दवा खिलाती थी। ... उनकी उँगलियाँ काँपती थीं। ... और मैंने दस साल उनके साथ बैठ कर, उनके हर काग़ज़ पर उनका दस्तख़त बनते देखा है। ... लाओ, ये चिट्ठी मुझे दो।"
चर्वी ने वो चिट्ठी लैंप की रोशनी के ठीक नीचे कर दी। ... और उस पीली रोशनी में उसने वो देखा जो उसकी रूह जानती थी, पर मन मानने से डर रहा था। ... बाऊजी के दस्तख़त की वो थकी, काँपती लकीरें इनमें कहीं नहीं थीं। ... ये दस्तख़त बहुत सधे हुए थे, बहुत ताज़ा, बहुत मज़बूत। ... किसी काँपते बूढ़े हाथ के नहीं।
"ये बाऊजी का हाथ नहीं है। ... एक भी नहीं। ... किसी ने इन पर बाऊजी के दस्तख़त बनाए हैं, सेठी जी। ... महीनों तक, एक मरते हुए आदमी के नाम पर, बैंकों को झूठी गारंटी देता रहा है कोई।"
"समझती हो तुम क्या कह रही हो, चर्वी? ... एक मुखिया के दस्तख़त बना कर बैंक को गारंटी देना, ये सास-बहू की तकरार नहीं है। ... ये जालसाज़ी है। ... इस एक काग़ज़ में इतना ज़हर है कि कुनाल का पूरा चमकीला ताज पल भर में राख हो जाए। ... ये उसे जेल तक पहुँचा सकता है।"
और एक पल के लिए चर्वी के हाथ में वो चीज़ आ गई थी, जिसका इस घर ने कभी उसे हक़दार नहीं समझा था। ... वो एक ही काग़ज़, जो उस चमकते देवर को, जिसने दस साल उसकी मेहनत का सेहरा पहना, हमेशा के लिए ख़त्म कर सकता था। ... पहली बार तराज़ू उसके हाथ में था।
तभी दरवाज़े पर एक धीमी दस्तक हुई, और रामदुलारी एक ट्रे में गरम चाय और नमकपारे लिए भीतर आई। ... रात के दो बजे भी वो बूढ़ी रसोइन बड़ी बहू को भूखा बैठा नहीं देख सकती थी।
"लो, चाय पियो। ... सुबह से इन काग़ज़ों के ढेर में सिर गड़ाए बैठी हो, एक निवाला मुँह में नहीं गया। ... बहूरानी, तबीयत ख़राब कर लोगी तो इस घर को कौन सँभालेगा, ये बूढ़ी हड्डियाँ? ... और सुनो, नीचे नौकरों में फिर वही खुसुर-पुसुर है, कि छोटे मालिक की वो किराए की काली गाड़ी कल रात फिर देर तक बाहर खड़ी थी। ... वही, सुनहरे सूरज वाली।"
"तुम्हारे बिना ये घर कब का बिखर गया होता, रामदुलारी। ... बैठो ज़रा, एक बात बताओ। ... बाऊजी के आख़िरी महीनों में, उनका हाथ... वो काँपता था न बहुत?"
"अरे, काँपता क्या था बिटिया, वो तो अपने हाथ से पानी का गिलास तक नहीं पकड़ पाते थे। ... दस्तख़त तो दूर, वो तो अपना नाम भी... " ... "पर तुम ये सब क्यों पूछ रही हो? ... कुछ बातें कुरेदने से पुराने ज़ख़्म ही खुलते हैं, बिटिया। ... इस घर की कुछ रातें, दफ़्न ही रहें तो अच्छा।"
चर्वी ने कुछ कहा नहीं, बस रामदुलारी की उस आख़िरी बात को मन के एक कोने में रख लिया। ... अगर घर की रसोइन तक जानती थी कि बाऊजी का हाथ नाम तक नहीं लिख सकता था, तो बैंकों को भला किसने भरोसा दिलाया होगा? ... किसी ने ख़ुद, आमने-सामने बैठ कर। ... और रामदुलारी की काँपती आवाज़ में किसी दफ़्न रात का एक पुराना डर छुपा था, जिसे वो बुढ़िया आज भी सीने में दबाए बैठी थी।
और उसी थकान के बीच, चर्वी को एक पल के लिए पिछली रात याद आ गई। ... मिष्टी के सिरहाने रणबीर का वो आधा रुका हुआ हाथ, वो आधा कहा हुआ वाक्य, और दहलीज़ पर खड़ी इंदुमती की वो एक ज़हरीली याद, जिसने सब कुछ फिर से पत्थर कर दिया था। ... एक मोर्चा उसका टूटा हुआ ब्याह था, जहाँ वो हर बार दहलीज़ पर हार जाती थी। ... और दूसरा ये, काग़ज़ों का, जहाँ हारना वो गवारा नहीं कर सकती थी। ... क्योंकि यहाँ सिर्फ़ उसका ब्याह नहीं, चार हज़ार घरों के चूल्हे और मिष्टी का कल दाँव पर था।
और हवेली की दूसरी मंज़िल पर, एक बंद दराज़ में, इंदुमती का वो फीते वाला भूरा लिफ़ाफ़ा अब भी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था। ... नीचे बहू अपने बचाव का हथियार ढूँढ रही थी, और ऊपर सास एक पुराना काग़ज़ थामे बैठी थी, जो उस बचाव को पल भर में बेमानी कर सकता था। ... इस घर की जंग इन दिनों तलवारों से नहीं, काग़ज़ों से लड़ी जा रही थी।
चाय ठंडी हो गई, पर चर्वी की नज़र उन चिट्ठियों पर जमी रही। ... क्योंकि उस जीत के भीतर एक जाल था। ... अगर वो ये जालसाज़ी अभी बैंकों के सामने रख देती, तो बैंक अगली सुबह ही अपने कर्ज़ वापस माँग लेते। ... और तब वो अचार-मसालों वाला फ़्लैगशिप, बाऊजी की ज़िंदगी भर की कमाई, धड़ाम से गिरता। ... और उसका मलबा सीधे सूर्यवंशी के उस खुले डेटा-रूम में जा गिरता, जो पहले से मुँह खोले खड़ा था।
"देखो कैसा फंदा है, सेठी जी। ... जो काग़ज़ कुनाल को मारता है, वही काग़ज़ फ़्लैगशिप को भी मार देगा। ... मैं ये गोली अभी नहीं चला सकती। ... पहले मुझे फ़्लैगशिप को इस डूबते हिस्से से अलग, एक दीवार के पीछे करना होगा। ... जिस दिन वो सुरक्षित होगा, उस दिन कुनाल का ये फंदा मैं उसी के गले में डालूँगी। ... एक दिन पहले नहीं।"
"यानी हम एक भरी हुई बंदूक हाथ में लिए मुस्कुराते रहेंगे, और सामने वाले को यक़ीन दिलाएँगे कि वो ख़ाली है। ... मेरी पसंदीदा तरह की वकालत। ... ठीक है, चर्वी, मैं फ़्लैगशिप को अलग करने का काग़ज़ी रास्ता तैयार करता हूँ। ... तुम बस उस लड़के को कुछ और दिन ये सपना देखने दो कि वो जीत रहा है।"
और मानो उस सपने को नाम मिल गया हो। ... अगली सुबह, राजवंश हाउस के दफ़्तर में, चर्वी अभी उन्हीं काग़ज़ों को समेट रही थी कि दरवाज़ा बिना दस्तक खुला, और कुनाल अंदर आया, वही चमकती मुस्कान, वही इत्र की लहर, वही आत्मविश्वास जिसके पीछे अब एक खोखला डर छुपा था।
"अरे वाह, भाभी। ... अब भी इस ख़ाली कमरे में चेयरपर्सन बनी बैठी हो? ... छोड़ो न ये काग़ज़ों की माथापच्ची। ... ई.जी.एम. का दूसरा दौर आने दो, फिर देखना। ... शेखर भैया का वोट माँ के पास है, दफ़्तर की हर फ़ाइल मेरी मेज़ पर आती है, और तटस्थ डायरेक्टर भी अब समझ गए हैं कि इस घर को असल में चला कौन सकता है। ... तुम बस मिष्टी को सँभालो, भाभी, कंपनी मुझ पर छोड़ दो।"
चर्वी जानती थी कि दफ़्तर की जो हर फ़ाइल आजकल कुनाल की मेज़ पर पहुँच रही थी, वो उसकी अपनी बिछाई हुई थी, झूठे नंबरों से भरी, सुधा के भरोसेमंद हाथों भेजी हुई। ... पर उसने अपने चेहरे पर वही सीधी-सादी बहू का पर्दा डाल लिया, जो ये घर देखना चाहता था।
"और वैसे भी, अब पैसे की कोई कमी रहने वाली नहीं है। ... कुछ ही दिन में एक बहुत बड़ा सौदा बंद कर रहा हूँ मैं। ... पूरे... पूरे दो सौ करोड़ का। ... या शायद ढाई सौ। ... ख़ैर, जो भी है, बहुत बड़ा है। ... उसके बाद ये पूरा बोर्ड मेरे इशारे पर नाचेगा।"
और चर्वी ने भीतर ही भीतर एक ठंडी साँस ली। ... वो 'बहुत बड़ा सौदा', जिसका आँकड़ा कुनाल को ख़ुद ठीक से याद नहीं था, उसे तो चर्वी ने ख़ुद, हर पैसे तक गिना था। ... वो सौदा फ़्लैगशिप को सूर्यवंशी के हाथों बेचने का था। ... घर का चमकता देवर उन्हीं नंबरों की डींग मार रहा था, जो उसकी अपनी भाभी ने बनाए थे। ... और वो भी ग़लत।
"बहुत अच्छा, देवर जी। ... तुम अपना सौदा बंद करो, मैं तुम्हारी सलामती की दुआ करूँगी। ... बस एक बात याद रखना।" ... "इस घर का हर हिसाब, देर-सवेर, बराबर हो ही जाता है। ... बाऊजी अधूरा हिसाब छोड़ कर जाने वालों में से नहीं थे। ... और न ही मैं हूँ।"
"बातें तो तुम बड़ी-बड़ी करती हो, भाभी। ... दस साल से यही तो करती आई हो, हिसाब-किताब। ... पर कुर्सी पर बैठने के लिए बातों से ज़्यादा कुछ चाहिए होता है। ... ख़ैर, मैं चला। ... दूसरे दौर में मिलते हैं, चेयरपर्सन साहिबा।"
चर्वी ने उसे जाते देखा, और जाने दिया। ... उसे नहीं पता था कि जिस भाभी को वो ख़ाली कमरे की मालकिन समझ कर हँस रहा था, उसी के हाथ में उसका फंदा था। ... बस वो उसे अभी कसना नहीं चाहती थी। ... कमज़ोर पड़ता हुआ आदमी हमेशा कुछ ऐसा बेच बैठता है, जो उसे कभी नहीं बेचना चाहिए। ... और चर्वी उसे और बेचने देना चाहती थी।
उस रात चर्वी फिर सेठी के उसी कमरे में लौट आई। ... अब उसे उस पूरी फ़ाइल में और गहरे उतरना था, ये देखने कि डूबते हिस्से के कौन-कौन से कर्ज़ फ़्लैगशिप को छूते हैं, ताकि उसे एक दीवार के पीछे किया जा सके। ... एक-एक काग़ज़, एक-एक तारीख़, वो और सेठी परत-दर-परत उतरते चले गए, आधी रात के उस सन्नाटे में।
"चर्वी, ज़रा रुको। ... ये देखो। ... इस बैंक फ़ाइल की जिल्द के पीछे कुछ और काग़ज़ चिपके रह गए हैं। ... बाक़ी सबसे पुराने। ... इनका काग़ज़ पीला पड़ चुका है, कोने भुरभुरा गए हैं। ... ये इन महीनों के नहीं हैं। ... ये तो सालों पुराने लगते हैं।"
चर्वी ने वो पीले पड़े काग़ज़ हाथ में लिए, और उसकी साँस एक पल को थम गई। ... ये उस पुरानी तबाही के काग़ज़ थे, दस साल पहले की उस रात के, जिसका इल्ज़ाम उसने चुपचाप अपने सिर ले लिया था। ... उस पूरी कहानी का हर पन्ना उसने अपनी आँखों से देखा था, हर दस्तख़त, हर मोहर। ... पर ये एक काग़ज़, ये उसने आज तक नहीं देखा था।
"ये... ये तो मूल रीस्ट्रक्चरिंग की गारंटी है, सेठी जी। ... दस साल पहले वाली। ... वो काग़ज़ जो मेरे हाथ में कभी आया ही नहीं, क्योंकि उस रात मुझे तो सिर्फ़ मलबा साफ़ करने को सौंपा गया था, सब कुछ तय हो जाने के बाद। ... सारा इल्ज़ाम मेरे सिर, पर ये असली काग़ज़ मुझसे हमेशा दूर रखा गया।"
उसकी नज़र काग़ज़ के सबसे नीचे, दस्तख़त वाली जगह पर उतरी। ... और वहीं, वो जम गई। ... एक दस्तख़त वो था जिसे वो पहचानती थी, जिसकी उसे उम्मीद थी। ... पर उसके ठीक बग़ल में एक दूसरा दस्तख़त भी था। ... एक और हाथ। ... एक बूढ़ा, सधा हुआ, पुराने ज़माने की तहज़ीब में झूलती लकीरों वाला हाथ।
"ये कुनाल का नहीं है। ... दस साल पहले तो कुनाल बस एक लड़का था, बाईस-तेईस बरस का, जिसे बही-खाते की अलिफ़-बे तक नहीं आती थी। ... ये किसी बहुत पुराने हाथ का है, सेठी जी। ... किसी ऐसे का, जो उस रात बाऊजी के बिलकुल बराबर में बैठा था।"
"किसका दस्तख़त है ये, चर्वी? ... तुम्हारा चेहरा सफ़ेद पड़ गया है। ... बोलो।"
"दस साल... सेठी जी। ... दस साल मैं यही समझती रही कि मैं एक नादान लड़के का गुनाह ढो रही हूँ।" ... "...पर वो उस रात अकेला नहीं था। ... उसके साथ कोई और भी था। ... कोई बहुत पुराना, बहुत क़रीबी। ... और मैं आज तक जानती भी नहीं कि किसके गुनाह में जलती रही।"
और चर्वी की उँगलियों में वो पीला काग़ज़ काँपता रहा। ... दस साल से वो जिस जंग को कुनाल और इंदुमती के ख़िलाफ़ लड़ रही थी, उसकी जड़ें अचानक कहीं गहरी, कहीं पुरानी दिखने लगी थीं। ... इस काग़ज़ पर, बाऊजी के भरोसे के सबसे क़रीब बैठा एक दूसरा हाथ भी उस रात दस्तख़त कर रहा था। ... कोई ऐसा, जो बरसों से सच जानता था, और फिर भी उसे सबके सामने चुपचाप जलते देखता रहा। ... और वो हाथ अब भी, इसी छत के नीचे, उसके साथ साँस ले रहा था।
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