मिश्री एक थिएटर एक्ट्रेस है, जिसके पास टैलेंट तो है पर किराया नहीं। फिर एक अजनबी उसे ज़िंदगी का सबसे अजीब रोल ऑफ़र करता है, सात दिन के लिए उसकी पत्नी बनना। वीर राठौड़, जयपुर के मशहूर राठौड़ मिष्ठान घराने का वो बेटा जिसे सालों पहले घर से निकाल दिया गया था, अब लौटा है, क्योंकि उसकी दादी की आख़िरी ख़्वाहिश है कि वो बहू देखकर जाएँ। पर असली दुल्हन शादी से पहले भाग गई, और दादी का दिल ये सदमा नहीं झेल पाएगा। तो मिश्री को बनना है वो बहू जो कभी आई ही नहीं। एक शर्त पर, वो कभी नहीं पूछेगी कि वीर घर क्यों छोड़ गया था। मगर वीर की दी हुई जानकारी सात साल पुरानी है, और मिश्री हर रस्म में कुछ न कुछ गड़बड़ कर बैठती है, और इसी गड़बड़ में, इस हवेली के झूठ में, वो सच्चाई से ज़्यादा क़रीब हो जाती है जितना कोई असली बहू कभी हुई। दादी की पैनी नज़र, एक चालाक जेठ, और एक झूठ जो हर रोज़ बड़ा होता जाता है।
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हमारी मुलाक़ात होती है मिश्री से, एक थिएटर एक्ट्रेस जिसके पास हुनर तो पूरा है पर किराया नहीं। जयपुर की एक पुरानी रंगशाला, ख़ाली कुर्सियाँ, और एक मोनोलॉग जो किसी ने नहीं सुना, सिवाय अँधेरे में बैठे एक अजनबी के। फिर वो अजनबी एक बेतुका ऑफ़र रखता है, सात दिन के लिए उसकी पत्नी बन जाओ। मिश्री मना कर देती है। उसका कर्ज़ हाँ कर देता है। अंत में, हवेली के गेट पर, उसे समझ आता है कि वो किस झूठ में फँस गई है।
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एक रात में मिश्री को सात साल पुरानी जानकारी रटनी है, और सुबह पूरे राठौड़ परिवार के सामने बहू बनकर खड़ा होना है। वीर के नोट्स आधे पुराने हैं, तो मिश्री हर सवाल पर गड़बड़ करती है, एक तोता जिसे मरा हुआ बताया गया था, एक झगड़ा जो कब का ख़त्म हो चुका है, और फिर भी वो अपनी अदाकारी से सबको जीत लेती है, सबसे पहले पिंकी बुआ को। फिर बड़ी दादी उसका हाथ पकड़ती हैं और कुछ उसकी हथेली में रख देती हैं। और कोने में खड़ा एक आदमी मुस्कुराता है।
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नई बहू और नए पति को एक ही कमरा मिलता है, और मिश्री और वीर को नवविवाहित होने का नाटक बहुत क़रीब से करना पड़ता है, बीच में तकिए की एक सरहद के साथ। मिश्री देखती है कि ये घर वीर को एक भूत की तरह देखता है, सिवाय बूढ़े काका के। और वीर के बंद पड़े पुराने कमरे की सफ़ाई करते हुए उसे कुछ मिलता है, एक फटा हुआ क़ानूनी काग़ज़ और एक बच्चे की ड्रॉइंग, जो बताते हैं कि वीर अपनी मर्ज़ी से घर नहीं छोड़ गया था। और अब वो सच मिश्री के हाथ में है।
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वीर का राज़ अब मिश्री के पास है, पर वो उसे खोलता नहीं, बस और बंद हो जाता है। फिर एक नया इम्तिहान आता है, बड़ी दादी चाहती हैं कि नई बहू आशीर्वाद समारोह के लिए परिवार की वो ख़ास मिठाई बनाए जिसकी रेसिपी सिर्फ़ घर की बहुएँ जानती हैं, और मिश्री को पानी उबालना नहीं आता। आधी रात की रसोई में, आटे और चाशनी के बीच, वीर उसकी मदद करता है, और दोनों के बीच पहली बार कुछ और पकने लगता है। मिश्री अदाकारी से इम्तिहान पास कर लेती है। पर कोने में, एक काग़ज़ एक मेज़ पर सरकता है।
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युवराज के पास अब मिश्री का राज़ है, और वो उसे खोलने नहीं, इस्तेमाल करने आता है, वीर की जासूसी करो, वरना समारोह के दिन सबके सामने तुम्हें बेनक़ाब कर दूँगा। मिश्री एक ख़तरनाक दोहरा खेल खेलने लगती है, और उसे डर लगता है कि वो इसमें कितनी अच्छी है। फिर बड़ी दादी के साथ एक बातचीत उसे अंदर तक हिला देती है, ये अब कोई काम नहीं रहा। और जब वो युवराज के कमरे से निकलती है, तो वीर उसे देख लेता है।
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वीर समझता है कि मिश्री ने उसे धोखा दिया, और दोनों के बीच एक लड़ाई छिड़ती है, जिसमें वो सारी कशिश फट पड़ती है जो हफ़्ते भर से पक रही थी। फिर सच सामने आता है, मिश्री युवराज के पास वीर को बचाने गई थी, और वीर का कवच गिर जाता है। पहली बार वो अपनी सच्चाई खोलता है, उस आग की, जो उसने नहीं लगाई पर जिसका इल्ज़ाम उसने अपने मरते पिता की इज़्ज़त बचाने के लिए अपने सिर ले लिया। झूठ इक़रार बन जाता है। और एक बोसा। फिर, बोबी का फ़ोन, और एक नाम जो सब कुछ हिला देता है।
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असली दुल्हन हवेली पहुँच जाती है, जबकि नक़ली अंदर है, और मिश्री, वीर और बोबी का एक पागल दिन शुरू होता है, दो दुल्हनों को एक कमरे में आने से रोकने का। नीचे ही नीचे एक दर्द है, मिश्री का टिकट आ गया है, आज़ादी, पैसे, और उसे जाने का दुख हो रहा है, और ये डर कि वो वीर के लिए सिर्फ़ एक रोल थी। पर अनन्या वो नहीं है जो सब समझते हैं। और जब दोनों औरतें आमने-सामने आती हैं, अनन्या एक बात कहती है जो सब कुछ पलट देती है।
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अब तीन लोग एक टीम हैं, मिश्री, वीर और छुपी हुई असली अनन्या, और तीनों मिलकर युवराज का सच खोदते हैं, वो दादी के दस्तख़त नक़ल करके हवेली गिरवी रख रहा है। मिश्री अपनी अदाकारी को पहली बार हथियार बनाती है, एक नौकरानी का भेस, एक चुराई हुई आवाज़, और एक जोखिम भरी सेंध। बीच में, वीर उसे चुपके से बता देता है कि असली दुल्हन के होते हुए भी उसे कौन चाहिए। पर जैसे ही सबूत उनके हाथ आता है, युवराज अपना पत्ता खोल देता है।
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युवराज के सौदे को टालने के लिए, वीर सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार हो जाता है, और मिश्री को धक्का देकर दूर कर देता है, जा, हफ़्ता ख़त्म, पैसे ले और निकल जा। और मिश्री को वही सुनाई देता है जिससे वो पूरे हफ़्ते डरती रही, कि वो सिर्फ़ एक रोल थी। दिल टूटता है, वो चली जाती है, गेट तक पहुँचती है, और फिर ख़ुद पलट जाती है। और तभी बड़ी दादी उसे बुलाती हैं, और सीज़न का सबसे बड़ा राज़ खोल देती हैं।
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बड़ी दादी अपना पूरा खेल खोलती हैं, उन्होंने ही वीर को बुलाया, उन्होंने ही शादी का जाल बिछाया, सिर्फ़ इसलिए ताकि सड़ांध बाहर आए और उनका सच्चा पोता घर लौटे। वो और मिश्री मिलकर एक चाल बुनती हैं जिसका हथियार ख़ुद मिश्री की अदाकारी है। वीर और मिश्री फिर एक हो जाते हैं, और वीर उस डर का जवाब देता है जो वो ढो रही थी। पर समारोह की रात से ठीक पहले, युवराज वो करता है जो दादी ने नहीं सोचा था।
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समारोह का दिन, पूरा परिवार इकट्ठा, और युवराज अपना आख़िरी पत्ता फेंकता है, वो सबके सामने मिश्री को बेनक़ाब कर देता है, एक किराए की एक्ट्रेस, एक धोखा। फ़र्श खिसक जाता है। और फिर जाल बंद होता है, और वो बंद होता है मिश्री की वजह से, वो अपने ही पर्दाफ़ाश को अपनी सबसे बड़ी अदाकारी बना देती है, और युवराज से उसका गुनाह ख़ुद उसी की ज़बान से कबूल करवा लेती है। इंसाफ़। पर जीत के बीच, मिश्री चुपचाप निकल जाती है।
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युवराज का साम्राज्य गिर जाता है, अनन्या को उसकी अपनी ख़ुशी मिलती है, और हवेली बच जाती है। पर मिश्री अपने पुराने थिएटर लौट गई है, ये मानकर कि महफ़िल ख़त्म हो गई। फिर वीर उसे ढूँढता हुआ आता है, ठीक वैसे जैसे पहली रात आया था, पर इस बार कोई चेक नहीं, कोई रोल नहीं, बस एक सच्चा सवाल। और दादी के मुँह से वो नाम निकलता है जो पूरी कहानी का मतलब है। एक असली शादी, एक असली घर, और एक नया सिलेबस।