Chapter 10 of 12
दादी का दांव
बड़ी दादी अपना पूरा खेल खोलती हैं, उन्होंने ही वीर को बुलाया, उन्होंने ही शादी का जाल बिछाया, सिर्फ़ इसलिए ताकि सड़ांध बाहर आए और उनका सच्चा पोता घर लौटे। वो और मिश्री मिलकर एक चाल बुनती हैं जिसका हथियार ख़ुद मिश्री की अदाकारी है। वीर और मिश्री फिर एक हो जाते हैं, और वीर उस डर का जवाब देता है जो वो ढो रही थी। पर समारोह की रात से ठीक पहले, युवराज वो करता है जो दादी ने नहीं सोचा था।
"तुम्हें पता था," मिश्री ने कहा, और उसकी आवाज़ में हैरानी और एक अजीब सी राहत दोनों थी। "पूरे हफ़्ते। और तुमने कुछ नहीं कहा। तुमने मुझे वो चाबी भी जान-बूझकर दी, वीर के बक्से की चाबी।"
बड़ी दादी मुस्कुराईं, और उस मुस्कान में पैंसठ साल की चालाकी थी। "मैंने एक चाबी दी, बेटा। ये तेरी उत्सुकता थी जिसने ताला खोला। मैं बस ये जानना चाहती थी कि तू किस तरह की लड़की है। जो चाबी जेब में रखकर भूल जाती है, या जो उससे बंद दरवाज़े खोलती है।" उन्होंने रुककर कहा। "तूने दरवाज़ा खोला। और तू वीर के सच तक पहुँची, उस सच तक जिस तक इस घर का कोई अपना सात साल में नहीं पहुँचा।"
मिश्री बैठ गई, उनके पास, और सुनने लगी।
"मेरा छोटा बेटा, वीर के पिता," दादी ने कहा, खिड़की के बाहर देखते हुए, "बहुत सीधा था। और इस दुनिया में सीधे लोग सबसे पहले कटते हैं। जब वो आग लगी, और सबने कहा वीर ने लगाई, तो मेरा दिल नहीं माना। मैं अपने पोते को जानती थी। वो शरारती था, ज़िद्दी था, पर आग लगाने वाला नहीं था। पर मेरे पास सबूत नहीं था, और इस घर के मर्दों ने, मेरे बड़े बेटे महेंद्र ने, फ़ैसला कर लिया था। वीर चला गया। और मैं चुप रही।" उनकी आवाज़ काँपी। "एक माँ की सबसे बड़ी हार यही है, बेटा। जब वो जानती है, और फिर भी चुप रहती है, क्योंकि घर के मर्द ज़्यादा ज़ोर से बोलते हैं।"
दादी की आँखें दूर कहीं चली गईं, सात साल पीछे। "जिस दिन वो गया, बेटा, मैं इसी खिड़की पर खड़ी थी। उसने एक बैग उठाया, बस एक, और गेट तक गया। और गेट पर वो रुका, और उसने पलटकर ऊपर देखा, मेरी तरफ़। एक पल। जैसे वो इंतज़ार कर रहा हो कि उसकी दादी कह दे, रुक जा, मुझे पता है तूने कुछ नहीं किया।" उनकी आवाज़ काँपी, और पहली बार वो मरती हुई बूढ़ी औरत सच में बूढ़ी लगीं। "और मैंने... मैंने खिड़की का परदा गिरा दिया। मैं उसकी आँखों का सामना नहीं कर पाई। मेरा अपना पोता, गेट पर खड़ा, उम्मीद लगाए, और मैंने परदा गिरा दिया। और सात साल, बेटा, हर रात, मैं उस गिरे हुए परदे को देखती हूँ। ये जो हफ़्ता मैंने रचा है, ये सिर्फ़ युवराज को पकड़ने के लिए नहीं है। ये उस परदे को वापस उठाने के लिए है।"
"तो तुमने उसे वापस बुलाया," मिश्री ने धीरे से कहा, उसकी अपनी आँखों में पानी।
"मैंने उसे वापस बुलाया, ये कहकर कि मैं मरने से पहले उसे बसा हुआ देखना चाहती हूँ।" दादी ने उसकी आँखों में देखा। "पर सच? मैं मरने से पहले सच देखना चाहती थी। मुझे पता था कि अगर वीर वापस आया, तो वो चुप नहीं बैठेगा। वो खोदेगा। और जो सड़ांध इस घर में सात साल से छुपी है, वो बाहर आएगी। मैंने वीर को चारा नहीं बनाया, बेटा। मैंने उसे रोशनी बनाया। और मैं इंतज़ार कर रही थी कि अँधेरा ख़ुद उसकी तरफ़ आए।" वो मुस्कुराईं। "और अँधेरा आया। युवराज ने तुझ पर शक किया, तेरे पीछे आदमी लगाए, तेरी रिकॉर्डिंग की। वो ख़ुद को शिकारी समझ रहा है। उसे नहीं पता कि वो जाल में पहले से खड़ा है।"
मिश्री ने उस बूढ़ी औरत को देखा, जो व्हीलचेयर पर, मरते हुए शरीर में, पूरे घर को शतरंज की तरह खेल रही थी, और उसे एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ, और थोड़ा डर भी।
"तो अब?" उसने पूछा।
"अब," दादी ने कहा, "हमें युवराज को उसी जगह पकड़ना है जहाँ वो सबसे मज़बूत समझता है। समारोह में। पूरे परिवार के सामने, सब रिश्तेदारों के सामने, उन्हीं लोगों के सामने जिनके आगे उसने वीर को मुजरिम बनाया था। हमें उससे ख़ुद उसका गुनाह कबूल करवाना है। और बेटा," उन्होंने मिश्री का हाथ थपथपाया, "ये काम मैं नहीं कर सकती, ये काँपते हाथ नहीं कर सकते। वीर नहीं कर सकता, वो बहुत सीधा है। ये काम सिर्फ़ वो कर सकती है जो किसी को भी कुछ भी बना सके। जो झूठ को इतनी ख़ूबसूरती से बोले कि सच ख़ुद बाहर आ जाए।" उन्होंने मिश्री की आँखों में देखा। "ये काम एक एक्ट्रेस का है।"
और मिश्री समझ गई। पूरे हफ़्ते वो सोचती रही थी कि वो एक रोल निभा रही है। पर सच ये था कि उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रोल अभी आना बाक़ी था।
उस रात, दादी ने वीर को बुलाया।
मिश्री बाहर बरामदे में थी जब वीर कमरे से निकला, और उसका चेहरा बदला हुआ था, जैसे किसी ने सात साल का बोझ एक पल में हल्का कर दिया हो। उसने मिश्री को देखा, और रुक गया।
"दादी को सब पता था," उसने कहा।
"मुझे पता है।"
"और तुम..." वो उसके क़रीब आया। "तुम गेट से वापस आ गईं। पिंकी बुआ ने बताया। तुम्हारा बैग अभी भी गेट के पास पड़ा है।"
मिश्री ने कंधे उचकाए, पर उसकी आँखें नम थीं। "मैंने कहा था ना। मैं अधूरा शो छोड़कर नहीं जाती।"
"मैंने तुम्हें धक्का दिया," वीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में पछतावा था, गहरा। "क्योंकि मैं डर गया था। मैं हमेशा यही करता हूँ। जिसे बचाना होता है, उसे दूर धकेल देता हूँ। मैंने अपने पिता के साथ किया, अपने आप को दूर करके। और मैंने तुम्हारे साथ किया।"
"वीर..."
"मुझे पूरा करने दो।" उसने उसका हाथ पकड़ा। "तुमने पूछा था, जब झूठ का परदा गिरेगा, और सब जानेंगे कि तुम एक किराए की एक्ट्रेस थीं, तब भी? तो सुनो। मुझे परवाह नहीं कि दुनिया तुम्हें क्या कहती है। एक्ट्रेस, नक़ली, किराए की, जो चाहे। मेरे लिए तुम वो हो जिसने इस मरे हुए घर में मुझे ज़िंदा होने का एहसास दिलाया। और जब ये सब ख़त्म होगा, मैं तुम्हें किसी रोल के लिए नहीं, किसी समारोह के लिए नहीं, ख़ुद अपने लिए माँगूँगा। अगर तुम मानोगी।"
और इस बार, जब वो क़रीब आए, तो कोई डर नहीं था, कोई शक नहीं था, कोई तकियों की सरहद नहीं थी। बरामदे की उस चाँदनी में, जहाँ नीचे बाग़ में मोर सोए थे और हवेली ख़ामोश थी, मिश्री ने ख़ुद को उस आदमी के सीने से लगा लिया जिसे वो एक हफ़्ते पहले एक अमीर बदतमीज़ समझती थी, और जो अब उसके लिए दुनिया का सबसे सच्चा झूठ बन गया था। उसकी साँस उसके बालों में थी, उसके हाथ उसकी कमर पर, और बहुत देर तक वो बस वहीं खड़े रहे, दो लोग जिन्होंने एक-दूसरे को एक झूठ में पाया और एक सच में थाम लिया।
वीर ने उसका चेहरा ऊपर उठाया, उँगली उसकी ठोड़ी के नीचे, और उसे देखा, उस तरह जैसे कोई पहली बार किसी चीज़ को सच में देखता है। "एक हफ़्ते पहले," उसने धीरे से कहा, "मुझे लगा था मैं एक एक्ट्रेस किराए पर ले रहा हूँ। मुझे क्या पता था कि मैं अपनी पूरी ज़िंदगी का सबसे सच्चा हिस्सा किराए पर ले रहा हूँ।" और फिर उसने उसे चूमा, धीरे से, बिना किसी जल्दी के, बिना किसी समारोह के, बिना किसी देखने वाले के, सिर्फ़ अपने लिए। और मिश्री को लगा जैसे पहली बार वो किसी मंच पर नहीं, अपने घर में खड़ी थी।
"समारोह में दो दिन हैं," वीर ने फुसफुसाया, उसका माथा उसके माथे से टिकाए। "और फिर ये सब असली हो जाएगा।"
"असली," मिश्री ने दोहराया, और मुस्कुराई।
पर रात ख़त्म नहीं हुई थी।
रात के तीन बजे, मिश्री का फ़ोन चीख़ा। बोबी। और जिस पल उसने उठाया, उसे पता चल गया कि कुछ बहुत ग़लत हो गया है, क्योंकि बोबी हाँफ रहा था, और उसकी आवाज़ हवा में काँप रही थी, जैसे वो दौड़ते हुए बोल रहा हो।
"दीदी!" उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मैं होटल के बाहर था, नीचे चाय लेने आया था, और मैंने अभी देखा, दो आदमी अनन्या को ज़बरदस्ती एक काली गाड़ी में डाल रहे हैं। उसका मुँह दबाया हुआ था। दीदी, युवराज को होटल का पता चल गया है। वो अनन्या को ले जा रहे हैं।" पीछे एक स्कूटर के स्टार्ट होने की आवाज़ आई, फटफटाती हुई। "मैं उनके पीछे जा रहा हूँ। मैं उन्हें नज़रों से ओझल नहीं होने दूँगा।"
"बोबी, नहीं, ये बहुत ख़तरनाक है, रुको..."
पर लाइन कट चुकी थी, और दूर कहीं, जयपुर की रात में, एक डरपोक लाइट बोर्ड ऑपरेटर एक स्कूटर पर एक अपहरण की गाड़ी के पीछे लग गया था।
मिश्री गलियारे में जमी खड़ी रही, और ऊपर, दादी के कमरे की बत्ती जल उठी, क्योंकि बूढ़ी औरत भी जाग गई थी, और पहली बार पूरे हफ़्ते में, उस सबसे जागी हुई औरत के चेहरे पर वो भाव था जो उसने कभी नहीं दिखाया था।
हैरानी।
उसने ये चाल नहीं सोची थी।