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Chapter 12 of 12

बहू नंबर तीन

बहू नंबर तीन by Avni Oberoi

युवराज की कहानी छोटी थी, जैसी ऐसी कहानियाँ होती हैं।

पुलिस को सबूत मिल गए, फ़र्ज़ी कंपनी, गिरवी के काग़ज़, नक़ली दस्तख़त। ताऊजी महेंद्र ने ख़ुद रिपोर्ट दर्ज करवाई, अपने ही बेटे के ख़िलाफ़, क्योंकि कुछ टूटी हुई चीज़ें जोड़ी नहीं जा सकतीं, सिर्फ़ साफ़ की जा सकती हैं। राठौड़ हवेली, जो बिकने वाली थी, बच गई। और वीर के पिता का नाम, जो सात साल मिट्टी में दबा था, साफ़ हो गया, हालाँकि उसे सुनने के लिए वो अब इस दुनिया में नहीं थे। पर दादी कहती थीं, अच्छे नाम बहरे नहीं होते, बेटा, वो जहाँ भी हों, सुन लेते हैं।

अनन्या भी अपनी कहानी में लौट गई। जिस लड़के के लिए वो शादी से भागी थी, उदयपुर का एक मामूली सा संगीत सिखाने वाला, उसके पास, और इस बार बिना डर के, क्योंकि अब उसके पीछे राठौड़ परिवार की पूरी ताक़त थी, उस लड़की के लिए जिसने सच के लिए भागना चुना था। जाते-जाते उसने मिश्री को गले लगाया था, और कहा था, "तुमने मेरी जगह खड़े होकर मेरी ज़िंदगी बचा दी। अब अपनी मत छोड़ देना।"

पर मिश्री ने छोड़ दी थी।

वो रौनक थिएटर लौट आई थी, अपनी पुरानी, छोटी, सच्ची दुनिया में, और उसने ख़ुद को समझा लिया था कि वो हफ़्ता एक सपना था, एक रोल, और रोल ख़त्म होते हैं। उसने वीर के फ़ोन नहीं उठाए। बोबी के सवालों के जवाब नहीं दिए। उसने बस वही किया जो वो हमेशा से करती आई थी, एक ख़ाली हॉल में, किसी और का दर्द ओढ़कर, अपना भूल जाना।

और एक शाम, जब वो मंच पर अकेली खड़ी थी, उसी रानी का मोनोलॉग दोहराते हुए जिससे ये सब शुरू हुआ था, उसी ख़ाली हॉल में, उसे फिर वही एहसास हुआ।

आख़िरी कतार में, सबसे कोने में, कोई बैठा था।

मिश्री का दिल रुका। उसने लाइट के पार झाँका।

"शो ख़त्म हो गया है," उसने कहा, ठीक वैसे जैसे पहली बार कहा था। पर इस बार उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"मुझे पता है," वीर ने कहा, उठते हुए, गलियारे से चलते हुए, ठीक वैसे जैसे पहली रात। "मैं देर से आया हूँ। मुझे माफ़ कर दो। मुझे एक हवेली, एक परिवार, और सात साल का बोझ संभालना था। पर एक बात संभालनी रह गई थी।"

वो मंच के नीचे आकर रुका, और इस बार उसके हाथ में कोई चेक नहीं था।

"पहली बार जब मैं यहाँ आया था," उसने कहा, "मैंने तुम्हें एक रोल दिया था। एक हफ़्ते का। पैसों के बदले। और तुमने वो रोल इतनी ख़ूबसूरती से निभाया कि तुमने एक मरते हुए घर को ज़िंदा कर दिया, एक झूठे को सच बना दिया, और मुझे, सात साल बाद, मुस्कुराना सिखा दिया।" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "तुम्हें डर है ना, कि मैंने उस बहू से प्यार किया जो तुम निभा रही थीं। तो आज मैं यहाँ कोई बहू माँगने नहीं आया, मिश्री। मैं वो बहू नहीं चाहता। मैं वो लड़की चाहता हूँ जिसकी जेब में अड़तालीस रुपए थे और जिसने फिर भी एक अमीर अजनबी का चेक ठुकरा दिया था, क्योंकि उसका ज़मीर बिकाऊ नहीं था।"

मिश्री की आँखों में पानी आ गया।

"मैं तुम्हें कोई किरदार नहीं दे रहा," वीर ने कहा। "मैं तुमसे तुम्हारा असली नाम माँग रहा हूँ, अपने नाम के साथ जोड़ने के लिए। मिश्री शर्मा। बिना स्क्रिप्ट के। बिना पैसों के। बिना किसी मरती हुई दादी के बहाने के।" वो रुका। "अब बहाना नहीं है। अब सिर्फ़ मैं हूँ। पूछ रहा हूँ।"

"और तुम्हारा परिवार?" मिश्री ने रुँधे गले से कहा। "वो रिश्तेदार जो मुझे 'नौटंकी वाली' कहते हैं? वो हवेली जहाँ मैं हमेशा एक बाहर की लड़की रहूँगी?"

और तभी, थिएटर का दरवाज़ा खुला।

और बड़ी दादी अंदर आईं, व्हीलचेयर पर, पिंकी बुआ धकेलते हुए, और पीछे बोबी, और कुछ और रिश्तेदार, और काका, हाथ में बेसन के हलवे का एक डिब्बा।

मिश्री हैरान, मंच पर खड़ी रह गई।

"हे राम, ये जगह!" पिंकी बुआ ने रौनक थिएटर की टूटी कुर्सियों और झड़ती दीवारों पर नज़र डाली, अपना पल्लू थोड़ा समेटते हुए, फिर तुरंत संभलकर, "मतलब... बहुत कलात्मक है। बहुत। मैंने सुना है आजकल बड़े-बड़े अमीर लोग ऐसी ही जगहों पर नाटक देखने आते हैं। बड़ा महँगा शौक़ है ये।" काका ने चुपचाप बेसन के हलवे का डिब्बा एक टूटी कुर्सी पर रखा और धीरे से बुदबुदाए, "हवेली की बैठक से तो बेहतर ही है। यहाँ कम से कम दीवारें झूठ नहीं बोलतीं।" और बोबी, मंच के पास खड़ा, मिश्री को देखकर बस इतना ही कर पाया कि अपने आँसू पोंछते हुए अँगूठा दिखा दे।

"बैठ जाओ सब," दादी ने हुक्म दिया, और रौनक थिएटर की टूटी कुर्सियों पर, राठौड़ ख़ानदान बैठ गया, उस ख़ाली हॉल में, पहली बार भरते हुए। दादी ने मंच की तरफ़ देखा, मिश्री की तरफ़, और मुस्कुराईं।

"बेटा," उन्होंने कहा, "एक हफ़्ते पहले तू हमारे घर ऑडिशन देने आई थी, बहू बनने का। आज हम तेरे घर आए हैं। तेरा परिवार बनने का ऑडिशन देने।" उन्होंने पिंकी बुआ की तरफ़ इशारा किया, जो पहले से रो रही थीं। "ये थोड़ा ज़्यादा बोलती है, पर इसका दिल सोने का है। ये बोबी, इसे हम बेटा मान चुके हैं, इसने अकेले एक गोदाम से अनन्या को बचाया। और ये काका का हलवा, जो सिर्फ़ घर वालों को मिलता है।"

मिश्री के गालों पर आँसू बह रहे थे।

"मेरे जीवन में," बड़ी दादी ने धीरे से कहा, और पूरा हॉल चुप हो गया, "मैंने दो बहुएँ देखीं। एक मेरे बड़े बेटे की, एक छोटे की। और दोनों अच्छी थीं, पर दोनों ने, अपने-अपने तरीक़े से, इस घर को बाँट दिया। तेरा, मेरा, उसका, इसका। घर टुकड़ों में बँट गया।" उन्होंने मिश्री की आँखों में देखा। "फिर एक तीसरी आई। एक नक़ली बहू। जो किसी की नहीं थी, इसलिए सबकी हो गई। जिसने इस घर के सबसे पुराने ज़ख़्म को खोला, और फिर उसे भरा। जिसने बँटे हुए घर को वापस जोड़ दिया।" वो मुस्कुराईं, और उनकी आवाज़ काँपी। "दो बहुओं ने घर बाँटा, बेटा। तीसरी ने जोड़ा। और इस घर में, अब से, बहू नंबर तीन ही असली है। बाक़ी सब तो बस गिनती थी।"

मिश्री मंच से उतरी, और दादी के पैरों के पास बैठ गई, और बूढ़ी औरत ने उसका चेहरा अपने काँपते हाथों में लिया।

"घर आ जा, बेटा," उन्होंने कहा। "इस बार झूठ नहीं। इस बार हमेशा के लिए।"

और मिश्री ने, जिसने ज़िंदगी भर किसी और का दर्द ओढ़ा था, पहली बार अपनी ख़ुशी ओढ़ी, और हाँ कह दी।

शादी असली थी, इस बार।

राठौड़ हवेली फिर फूलों से भरी, पर इस बार कोई झूठ नहीं था, कोई छुपा हुआ राज़ नहीं, बस एक एक्ट्रेस और एक मिठाई वाला, सात फेरों के बीच एक-दूसरे को छेड़ते हुए। बोबी सबसे आगे बैठा रोता रहा, और पिंकी बुआ उससे भी ज़्यादा ज़ोर से, और बीच में कहीं, पिंजरे में, मिट्ठू तोते ने अपनी बूढ़ी तीखी आवाज़ में ऐलान किया, "नक़ली आई गई! नक़ली आई गई!" और इस बार पूरा परिवार हँस पड़ा, क्योंकि अब सब जानते थे, सबसे नक़ली ही सबसे असली निकली थी।

उस रात, जब मेहमान चले गए, मिश्री बरामदे में दादी के पास बैठी थी, और दादी ने उसके हाथ में एक मोटी सी पुरानी डायरी थमाई।

"ये क्या है, दादी?"

"राठौड़ की बहू का सिलेबस," दादी ने शरारत से कहा। "सात पुश्तों की रेसिपी, रीति-रिवाज, हर रिश्तेदार का नाम और झगड़ा, सब इसमें है। तूने पिछली बार बिना पढ़े इम्तिहान दे दिया था। इस बार ठीक से पढ़ना पड़ेगा, बेटा। अब तू सच में इस घर की बहू है। और मैं तुझे बताती हूँ, असली बहू बनना नक़ली से कहीं ज़्यादा मुश्किल है।"

मिश्री ने वो डायरी खोली, और उसके पहले पन्ने पर, बड़े टेढ़े अक्षरों में, किसी ने लिखा था, बोबी की लिखावट में, "अध्याय एक, अगर तोता कुछ बोले, तो घबराना मत, उससे डील कर लेना।"

और मिश्री हँस पड़ी, उस हवेली के बरामदे में, अपने नए-पुराने घर में, उस आदमी के साथ जिसे वो एक झूठ में मिली और एक सच में पा गई, और दूर कहीं, जयपुर की रात में, एक मोर बोला, और हवा महल की जालियों से पहली रोशनी छनने लगी।

परदा गिर रहा था। पर इस बार, मिश्री शर्मा मंच से नहीं उतरी।

इस बार, वो घर पर थी।

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