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Chapter 1 of 12 14 min read

ज़िंदगी का रोल

बहू नंबर तीन by Avni Oberoi

मिश्री जब स्टेज पर होती थी, तो उसे भूख नहीं लगती थी।

ये उसने बहुत पहले खोज लिया था, उन दिनों में जब घर में सच में खाना नहीं होता था। मंच की वो तीन फुट की ऊँचाई एक जादू थी। नीचे मिश्री शर्मा थी, जिसकी जेब में अड़तालीस रुपए थे और जिसके कमरे के बाहर मकान मालिक का नोटिस चिपका था। ऊपर वो कोई भी हो सकती थी। आज रात वो एक रानी थी।

"तुमने सोचा कैसे," उसने कहा, और उसकी आवाज़ उस ख़ाली हॉल में ऐसे फैली जैसे किसी ने पानी में स्याही गिरा दी हो, "कि मैं चुप रहूँगी? तुमने मेरे पिता को ख़रीदा, मेरे भाई को डराया, मेरी ज़मीन पर अपना नाम लिखवा लिया। और फिर तुमने सोचा कि एक औरत के पास इसके बाद बचता क्या है। सुनो।" वो एक क़दम आगे आई। पुरानी लकड़ी उसके पाँव के नीचे चरमराई। "एक औरत के पास उसकी आवाज़ बचती है। और वो तुमने नहीं ख़रीदी।"

हॉल में ख़ामोशी थी।

ख़ामोशी, क्योंकि हॉल ख़ाली था।

रौनक थिएटर की सत्तर कुर्सियों में से नौ पर लोग बैठे थे, और उन नौ में से दो सो रहे थे, और एक उठकर जा चुका था क्योंकि उसे लगा था कि टिकट किसी और शो का था। मिश्री ने ये सब देखा, हर रात देखती थी, और फिर भी उसने वो आख़िरी लाइन ऐसे बोली जैसे सामने हज़ार लोग बैठे हों, क्योंकि उसके गुरुजी कहते थे कि एक्टर का काम दर्शक गिनना नहीं, दर्शक पैदा करना है।

लाइट गिरी। बोबी ने बोर्ड पर वो बटन दबाया जो आधा काम करता था, तो आधा स्टेज अँधेरे में डूबा और आधा अभी भी जला रहा, और मिश्री वहीं खड़ी रही, आधी रानी, आधी एक लड़की जिसे कल किराया देना था।

ताली नौ में से चार लोगों ने बजाई।

"ब्रावो," बोबी की आवाज़ आई, विंग्स के पीछे से, फुसफुसाते हुए। "सच में दीदी, world-class। बस audience को किसी ने बताया नहीं।"

मिश्री हँसी, और हँसी के साथ रानी उतर गई और भूख वापस आ गई।

बाहर, टिकट खिड़की पर, गुरुजी का बेटा हिसाब लगा रहा था और उसका चेहरा वो सब कह रहा था जो उसे कहना नहीं था। तीन सौ बीस रुपए की कमाई। बिजली का बिल उससे चार गुना। और बैंक का वो काग़ज़ जो अब टाला नहीं जा सकता था, रौनक थिएटर, जयपुर की सबसे पुरानी रंगशालाओं में से एक, जहाँ मिश्री के गुरुजी ने चालीस साल पढ़ाया था और जहाँ मरने से पहले उन्होंने मिश्री का हाथ पकड़कर कहा था, "इसे बंद मत होने देना, बेटा," वो थिएटर अट्ठाईस दिन में नीलाम होने वाला था।

"अट्ठाईस दिन में हमें छह लाख चाहिए," बोबी ने पीछे से कहा, मेकअप के डिब्बे समेटते हुए। "और आज हमने तीन सौ बीस कमाए। तो गणित के हिसाब से, हमें बस अठारह सौ और शो करने हैं... कल तक।"

"बोबी।"

"हाँ दीदी।"

"तेरा ये हिसाब लगाने का हुनर ही है जो तुझे इतना प्यारा बनाता है।"

वो दोनों हँसे, उस तरह की हँसी जो दो लोग तब हँसते हैं जब रोना ज़्यादा आसान होता और इसीलिए वो नहीं चुनते।

मिश्री ने अपने बाल खोले, मुकुट एक तरफ़ रखा जो असल में पीतल का था और पेंट से सोने का बनाया गया था, और तभी उसे महसूस हुआ कि हॉल पूरी तरह ख़ाली नहीं था।

आख़िरी कतार में, सबसे कोने में, एक आदमी बैठा था।

वो शो ख़त्म होने के बाद भी बैठा था। ताली नहीं बजाई थी। बस बैठा था, एक टाँग दूसरी पर, हाथ में फ़ोन नहीं, जो आजकल की सबसे अजीब बात थी, और वो सीधे मिश्री को देख रहा था, उस तरह नहीं जैसे लोग एक्ट्रेस को देखते हैं, बल्कि उस तरह जैसे कोई दुकानदार किसी चीज़ को देखता है और मन ही मन उसकी क़ीमत लगाता है।

मिश्री को ये नज़र पसंद नहीं आई।

"शो ख़त्म हो गया है," उसने स्टेज से कहा, हाथ आँखों पर रखकर, लाइट के पार झाँकते हुए। "अगर आप सो गए थे तो कोई बात नहीं, टिकट के पैसे वापस नहीं मिलेंगे, पर हमारी दुआएँ आपके साथ हैं।"

आदमी उठा। धीरे से, बिना जल्दबाज़ी के, जैसे वक़्त उसका नौकर हो। महँगे कपड़े, पर थके हुए, जैसे किसी ने उन्हें पहनकर रात भर सफ़र किया हो। वो गलियारे से चलता हुआ स्टेज तक आया और नीचे से ऊपर मिश्री को देखा।

"आपने वो आख़िरी लाइन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ नीची और सपाट थी, बिना किसी गर्माहट के, "दो बार रिहर्स की होगी। पर आज आपने उसे पहली बार जैसा बोला। ये मुश्किल होता है।"

मिश्री ने उसे देखा। तारीफ़ थी, पर ऐसी जैसे किसी ने घोड़े के दाँत गिने हों।

"शुक्रिया," उसने कहा। "और आप कौन हैं? क्योंकि हमारे regular दर्शक मैं नाम से जानती हूँ। दोनों।"

"मेरा नाम वीर है।" उसने रुककर कहा। "और मेरे पास आपके लिए एक काम है। एक रोल।"

बोबी का सिर विंग्स के पीछे से ऐसे निकला जैसे किसी ने डोर खींची हो। रोल। उस शब्द का रौनक थिएटर में वही असर था जो रेगिस्तान में पानी के शब्द का होता।

"फ़िल्म?" बोबी फट पड़ा, बाहर आते हुए। "सीरियल? वेब सीरीज़? दीदी ने थिएटर में बारह साल दिए हैं सर, इनके पास range है, comedy, tragedy, action, इन्होंने एक बार एक ही शो में जुड़वाँ बहनें प्ले की थीं और..."

"बोबी।"

"...और किसी को पता नहीं चला कि दोनों एक ही हैं।"

"बोबी, साँस ले।"

वीर ने बोबी को देखा तक नहीं। वो मिश्री को देख रहा था। "कोई फ़िल्म नहीं है। कोई कैमरा नहीं है। एक हफ़्ते का काम है। सात दिन। और पैसे," उसने एक पल रुककर कहा, "इतने कि आप ये थिएटर बचा लें, और अगले साल का किराया भी दे दें।"

हॉल में फिर वही ख़ामोशी आई, पर इस बार ख़ाली नहीं थी।

मिश्री के दिमाग़ में एक छोटी सी आवाज़ ने कहा कि जब कोई अजनबी रात के साढ़े दस बजे एक ख़ाली थिएटर में आकर ज़रूरत से ज़्यादा पैसे देने की बात करे, तो उसमें कुछ न कुछ सड़ा होता है। उसने बारह साल जयपुर के थिएटर में बिताए थे। वो ऐसे आदमियों को जानती थी जो "रोल" का मतलब कुछ और समझते थे।

"किस तरह का रोल," उसने ठंडी आवाज़ में पूछा, और बोबी की मुस्कान थोड़ी काँपी।

वीर शायद समझ गया, क्योंकि पहली बार उसके चेहरे पर कुछ आया, हल्की सी, थकी हुई चिढ़। "वो नहीं जो आप सोच रही हैं। मैं आपको किसी बिस्तर के लिए नहीं ख़रीद रहा, मिस शर्मा। मुझे एक एक्ट्रेस चाहिए। असली वाली। जो किसी और के सामने कोई और बन सके, और एक हफ़्ते तक बनी रहे, बिना एक बार भी टूटे।"

"किसके सामने?"

"मेरे परिवार के सामने।"

मिश्री ने एक भौंह उठाई।

वीर ने जेब से एक चेक निकाला। पहले से भरा हुआ। उसने उसे स्टेज के किनारे रख दिया, जहाँ से मिश्री उसे पढ़ सकती थी, और जो नंबर उस पर लिखा था उसे देखकर बोबी ने एक अजीब सी आवाज़ निकाली, जैसे किसी की हिचकी रुक गई हो।

"ये advance है," वीर ने कहा। "आधा। बाक़ी आधा काम ख़त्म होने पर। हाँ या ना, आज रात बता दीजिए।"

मिश्री ने चेक को देखा। फिर वीर को।

और फिर उसने वो किया जो उसके गुरुजी हमेशा कहते थे कि एक अच्छा एक्टर सबसे पहले सीखता है, उसने ना कहा।

"नहीं।"

बोबी की आत्मा शरीर छोड़ गई। "दीदी?"

"मुझे नहीं पता आप कौन हैं," मिश्री ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में रानी वापस आ गई थी, वो जो किसी से नहीं ख़रीदी जाती। "मुझे नहीं पता आप किस परिवार से क्या छुपाना चाहते हैं। और जो आदमी झूठ पर इतने पैसे लगाता है, उस झूठ की क़ीमत बाद में कोई और चुकाता है। आमतौर पर वो लड़की जिसने हाँ कह दिया था।" उसने चेक उठाकर वापस वीर की तरफ़ बढ़ाया। "ये अपनी जेब में रखिए, मिस्टर वीर। और रौनक थिएटर में आपका स्वागत है, जब तक ये खड़ा है। टिकट बीस रुपए का है।"

वीर ने उसे एक लंबे पल तक देखा। और फिर, हैरानी की बात, उसके होंठ के कोने में कुछ हिला, मुस्कान नहीं, पर उसका दूर का रिश्तेदार।

"गुरुजी ने सही सिखाया आपको," उसने धीरे से कहा।

मिश्री का दिल एक धड़कन के लिए रुका। उसने ये नाम नहीं लिया था।

पर वीर मुड़ चुका था, और गलियारे से बाहर जा रहा था, और दरवाज़े पर रुककर उसने सिर्फ़ इतना कहा, "जब आपका मन बदल जाए, तो थिएटर के बाहर वाली काली गाड़ी में मेरा नंबर है। मन बदलेगा।" और वो चला गया।

बोबी ने मिश्री को देखा जैसे उसने अभी-अभी किसी देवता को गाली दी हो।

"दीदी, वो छह लाख था। पूरा। थिएटर बच जाता।"

"वो छह लाख का जाल था, बोबी।"

"तो जाल में फँस जाते! कम से कम जाल में छत तो होती है!"

मिश्री हँसी, और उसने पीतल का मुकुट उठाया, और घर चली गई।

घर, जहाँ दरवाज़े पर मकान मालिक का नया नोटिस चिपका था, इस बार लाल स्याही में, इस बार तीन दिन की मोहलत के साथ। घर, जहाँ उसने रात भर छत को देखा और गुरुजी की आवाज़ सुनी, इसे बंद मत होने देना। घर, जहाँ सुबह चार बजे उसके फ़ोन पर बैंक का एक मैसेज आया कि उसका जो थोड़ा सा बचा-खुचा खाता था, वो भी अब माइनस में चला गया था।

और सुबह छह बजे, जब जयपुर की पहली रोशनी हवा महल की जालियों से छनकर आ रही थी, मिश्री शर्मा रौनक थिएटर के बाहर खड़ी थी, अपनी एक ही अच्छी शॉल लपेटे, और उसके सामने वो काली गाड़ी खड़ी थी, जैसे वो जानती थी कि वो आएगी।

शीशा नीचे हुआ। वीर अंदर बैठा था, वैसे ही, जैसे वो रात से वहीं था।

"हाँ," मिश्री ने कहा, इससे पहले कि उसकी हिम्मत टूटे। "एक हफ़्ता। पर मेरी शर्तें होंगी।"

"गाड़ी में बैठिए," वीर ने कहा। "शर्तें रास्ते में।"

गाड़ी जयपुर के पुराने शहर से निकलकर एक चौड़ी सड़क पर आई, और फिर शहर पीछे छूटने लगा, और मिश्री ने पहली बार सोचा कि उसने ये नहीं पूछा था कि परिवार कहाँ रहता है।

उसका फ़ोन बजा। बोबी का मैसेज, बिना किसी विराम के, जैसे वो ख़ुद साँस लिए बिना लिखता हो। "दीदी ससुराल में ये याद रखना, एक, हर बात पर आँखें नीची, दो, सास को मम्मी जी बोलना पापा जी नहीं, तीन, अगर कोई करवा चौथ के बारे में पूछे तो रो देना किसी को कुछ याद नहीं रहता, चार, मैंने रात भर यूट्यूब पर परफेक्ट बहू कैसे बनें देखा है, मैं तुम्हारा गुरु हूँ अब।"

मिश्री ने टाइप किया, "बोबी मुझे ये भी नहीं पता ससुराल किसका है।"

तीन सेकंड बाद, "तुम्हें ससुराल भी नहीं पता और तुम गाड़ी में बैठ गई? दीदी ये एक्टिंग नहीं, स्टंट है।"

उसने फ़ोन रख दिया, और हैरानी की बात, थोड़ी हिम्मत वापस आ गई, क्योंकि दुनिया में कम से कम एक इंसान था जो इस वक़्त उससे भी ज़्यादा डरा हुआ था।

"तो," उसने वीर से कहा, अपनी घबराहट को मज़ाक के नीचे छुपाते हुए, "मुझे किसकी पत्नी बनना है? कोई छोटा-मोटा बिज़नेसमैन? कोई डरा हुआ इंजीनियर जिसकी माँ शादी के पीछे पड़ी है?"

वीर ने खिड़की के बाहर देखा। "राठौड़।"

"राठौड़ क्या?"

"राठौड़ मिष्ठान। राठौड़ हवेली।"

मिश्री की हँसी गले में अटक गई।

राठौड़ मिष्ठान को जयपुर का बच्चा-बच्चा जानता था। सत्तर साल पुरानी मिठाई की वो दुकान जो अब एक साम्राज्य थी, जिसका नाम हर शादी, हर त्योहार, हर डिब्बे पर सोने के अक्षरों में लिखा होता था। और राठौड़ हवेली, शहर के बाहर वो पुरानी हवेली जिसे लोग दूर से उँगली से दिखाते थे।

"रुको," उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में अभिनय नहीं था। "तुम मुझे एक छोटे परिवार की बहू बनने के लिए नहीं ले जा रहे।"

"नहीं।"

गाड़ी एक लंबे रास्ते पर मुड़ी, दोनों तरफ़ पुराने पेड़, और दूर, सुबह की धुंध में, एक हवेली उभरी, इतनी बड़ी कि मिश्री को अपनी गर्दन घुमानी पड़ी। उसके गेट पर पीतल का एक विशाल दरवाज़ा था और उसके ऊपर वही नाम था जो उसने ज़िंदगी भर मिठाई के डिब्बों पर देखा था।

और गेट के अंदर, एक बूढ़ी औरत व्हीलचेयर पर बैठी इंतज़ार कर रही थी।

"वो मेरी दादी हैं," वीर ने कहा, और पहली बार उसकी सपाट आवाज़ में कुछ दरका। "डॉक्टर ने कहा है उनके पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। उनकी आख़िरी ख़्वाहिश है कि वो मेरी बहू देखकर जाएँ। और अगर उन्हें पता चला कि असली दुल्हन शादी से पहले भाग गई, तो वो सदमा," वो रुका, "वो उनका दिल नहीं झेलेगा।"

मिश्री ने उस बूढ़ी औरत को देखा, जो दूर से ही उनकी गाड़ी को ऐसे देख रही थी जैसे उसकी नज़र गाड़ी के शीशे के पार आ सकती हो।

"तो मुझे एक मरती हुई औरत से झूठ बोलना है," मिश्री ने धीरे से कहा।

"आपको एक मरती हुई औरत को खुश रखना है," वीर ने कहा। "उसमें फ़र्क़ है।" उसने गाड़ी रुकवाई, गेट से थोड़ा पहले, और मिश्री की तरफ़ मुड़ा, और उसकी आँखों में अब वो दुकानदार वाली नज़र नहीं थी, कुछ और था, ज़्यादा गहरा, ज़्यादा डरा हुआ।

"एक आख़िरी बात, और ये सबसे ज़रूरी है। इस घर के बारे में जो कुछ मैं आपको बताऊँ, वही सच है। आप अपनी तरफ़ से कुछ नहीं जोड़ेंगी। कोई कहानी नहीं, कोई याद नहीं, कुछ नहीं।" वो रुका। "और एक बात साफ़ कर दूँ। मैं ख़ुद इस घर से सात साल बाहर रहा हूँ। जो मैं जानता हूँ, हो सकता है अब वो भी सच न हो। इसलिए जो मैं कहूँ, बस वही, उससे एक शब्द ज़्यादा नहीं। और अगर कोई आपसे आज रात से पहले की कोई पुरानी बात पूछे, तो आपको कुछ याद नहीं आता, आप मुस्कुरा देती हैं, और आप मुझे ढूँढ लेती हैं।" उसकी आवाज़ नीची हो गई। "क्योंकि इस घर में हम सिर्फ़ एक जगह पकड़े जाएँगे। आज में नहीं। कल में। बीते हुए कल में।"

मिश्री ने उसे देखा, और एक ठंडी समझ उसके अंदर उतरी, धीरे-धीरे, कि उसने जिस झूठ में हाँ कही थी, उसकी कोई और भी परतें थीं, जो इस आदमी ने अभी तक नहीं खोली थीं।

गेट खुलने लगा।

व्हीलचेयर पर बैठी बूढ़ी औरत ने अपना हाथ उठाया, बहुत धीरे, और इशारा किया, पास आओ।

"आपका रोल शुरू," वीर ने फुसफुसाकर कहा।

और मिश्री शर्मा ने, जिसके पास उस सुबह दुनिया में अड़तालीस रुपए और एक मरते हुए थिएटर के अलावा कुछ नहीं था, अपनी सबसे गहरी साँस ली, अपने चेहरे पर वो मुस्कान चढ़ाई जो किसी और की थी, और राठौड़ हवेली के अंदर क़दम रखा।

परदा उठ चुका था। और इस बार, हॉल भरा हुआ था।

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