अध्याय 2 / 12
ससुराल का सिलेबस
बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi
एक रात में मिश्री को सात साल पुरानी जानकारी रटनी है, और सुबह पूरे राठौड़ परिवार के सामने बहू बनकर खड़ा होना है। वीर के नोट्स आधे पुराने हैं, तो मिश्री हर सवाल पर गड़बड़ करती है, एक तोता जिसे मरा हुआ बताया गया था, एक झगड़ा जो कब का ख़त्म हो चुका है, और फिर भी वो अपनी अदाकारी से सबको जीत लेती है, सबसे पहले पिंकी बुआ को। फिर बड़ी दादी उसका हाथ पकड़ती हैं और कुछ उसकी हथेली में रख देती हैं। और कोने में खड़ा एक आदमी मुस्कुराता है।
राठौड़ हवेली के मेहमान कमरे में, रात के तीन बजे, मिश्री शर्मा अपनी ज़िंदगी का सबसे अजीब इम्तिहान दे रही थी।
"फिर से," वीर ने कहा। वो कमरे में चहलक़दमी कर रहा था, हाथ में एक पुरानी डायरी, और उसकी आवाज़ में नींद की एक भी बूँद नहीं थी। "तुम्हारा नाम।"
"अनन्या।" मिश्री ने आँखें बंद करके कहा, जैसे कोई स्क्रिप्ट याद कर रहा हो। "अनन्या राठौड़। पहले अनन्या सिंघवी। उदयपुर से। हम दोनों की शादी तीन हफ़्ते पहले कोर्ट में हुई, बिना किसी को बताए, क्योंकि..."
"क्योंकि?"
"क्योंकि तुम्हें डर था कि बड़ी धूमधाम वाली शादी का इंतज़ार करने में दादी की तबीयत और बिगड़ जाएगी। तो हमने पहले कोर्ट में शादी कर ली, और अब हम बड़ी दादी के आशीर्वाद समारोह के लिए घर आए हैं।" उसने आँखें खोलीं। "वीर, एक बात बताओ। इस परिवार ने अनन्या को कभी देखा नहीं?"
"रिश्ता फ़ोन पर तय हुआ था। उन्होंने उसकी दो-तीन फ़ोटो देखी हैं, वो भी पुरानी, धुँधली।" वीर डायरी में कुछ ढूँढ रहा था। "किसी ने उसे आमने-सामने नहीं देखा। यही हमारी सबसे बड़ी ढाल है।"
"और सबसे बड़ी कमज़ोरी," मिश्री ने धीरे से कहा, पर वीर ने नहीं सुना।
"अब परिवार," उसने डायरी का एक पन्ना खोला। "ताऊजी, महेंद्र राठौड़, दादी के बड़े बेटे। सख़्त आदमी। उनसे कम बोलना। पिंकी बुआ, मेरी बुआ, बहुत बोलती हैं, उनसे बच के रहना, उन्हें हर बात की ख़बर चाहिए होती है।" वो रुका। "और एक बात। इस घर में एक तोता है, मिट्ठू। बूढ़ा हो गया था, पिछले साल मर गया, मुझे चिट्ठी में पता चला था। अगर कोई उसका ज़िक्र करे तो अफ़सोस ज़ाहिर कर देना।"
मिश्री ने सिर हिलाया, और सोचा कि कैसे एक आदमी अपने ही घर को इतना दूर से जानता है, जैसे कोई नक्शा पढ़ रहा हो जो बहुत पुराना हो गया हो।
"वीर।"
"हाँ।"
"तुम सात साल से इस घर नहीं आए। तुम्हें कैसे पता ये सब अब भी सच है?"
वीर रुका। एक पल के लिए डायरी उसके हाथ में जम गई, और मिश्री ने उसके चेहरे पर कुछ देखा, वो वाली घबराहट जो वो छुपाने में अच्छा था पर इतना अच्छा नहीं।
"बस वही बोलना जो मैं कहूँ," उसने कहा, और बत्ती बुझा दी। "बाक़ी मुझ पर छोड़ दो।"
सुबह सात बजे राठौड़ हवेली जागी, और मिश्री ने पाया कि उसके बारे में सबसे बड़ा झूठ ये नहीं था कि वो कौन थी। सबसे बड़ा झूठ ये था कि वो शांत थी।
वो सीढ़ियों से उतरी, लाल जोड़े में, गहने जो वीर ने रात को थमाए थे, और नीचे आँगन में एक पूरा परिवार इकट्ठा था, और हर आँख उस पर थी, नई बहू पर, और मिश्री के अंदर बारह साल का थिएटर खड़ा हो गया। उसने आँखें झुकाईं। मुस्कुराई। बिल्कुल उतना, न ज़्यादा न कम।
"हाय हाय हाय, ये देखो!" एक आवाज़ पूरे आँगन में गूँजी, और एक महिला, चमकीली साड़ी और उससे भी ज़्यादा चमकीली आवाज़ वाली, हाथ फैलाए चली आई। "ये है हमारी बहू! वीर, बेटा, तूने तो छुपा रखा था इसे, अरे ऐसी हीरे जैसी बहू को कोई छुपाता है?"
ये पिंकी बुआ थीं। मिश्री को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
"नमस्ते बुआजी," मिश्री ने कहा, और झुककर पैर छुए।
"जीती रह, जीती रह।" पिंकी बुआ ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और ऐसे घुमाया जैसे सब्ज़ी मंडी में तरबूज़ परखा जाता है। "उदयपुर की है ना? सिंघवी? अरे मेरी एक ननद की देवरानी उदयपुर में ब्याही है, सिंघवी ही हैं, तू उन्हें जानती होगी, बड़ा मशहूर परिवार है, चंद्रकला सिंघवी, जानती है ना?"
और वहाँ, पहले ही मिनट में, जाल आ गया।
मिश्री चंद्रकला सिंघवी को नहीं जानती थी। अनन्या भी शायद नहीं जानती होगी। वीर की डायरी में चंद्रकला सिंघवी नहीं थीं। और पूरा आँगन इंतज़ार कर रहा था, और वीर दो क़दम दूर खड़ा पत्थर बन गया था, और मिश्री के पास आधा सेकंड था।
तो उसने वही किया जो एक अच्छा एक्टर करता है। उसने झूठ नहीं बोला। उसने सच को मोड़ा।
"बुआजी," उसने थोड़ा शरमाते हुए कहा, "सच बताऊँ? शादी के बाद से मुझे अपने ही मायके वालों के नाम याद नहीं आ रहे, आपके परिवार के इतने नाम जो याद करने हैं।" उसने पिंकी बुआ का हाथ पकड़ा। "आप बताइए ना, चंद्रकला जी कैसी हैं? आपकी ननद की देवरानी हैं तो आपके तो बहुत क़रीब होंगी।"
और पिंकी बुआ, जिन्हें दुनिया में एक ही चीज़ अपनी आवाज़ से ज़्यादा प्यारी थी, और वो थी अपनी आवाज़ का सुनने वाला, खिल गईं।
"अरे क़रीब? मैं बताती हूँ तुझे चंद्रकला का पूरा क़िस्सा..." और वो शुरू हो गईं, और आँगन की सारी नज़रें मिश्री से हटकर पिंकी बुआ पर चली गईं, और वीर ने बहुत धीरे से एक साँस छोड़ी।
मिश्री ने सीखा था कि सबसे अच्छा बचाव ये नहीं कि आप सवाल का जवाब दें। सबसे अच्छा बचाव ये है कि सामने वाले को अपनी पसंदीदा कहानी सुनाने का मौक़ा दे दें।
पर हवेली अभी ख़त्म नहीं हुई थी।
जैसे ही वो अंदर बैठक की तरफ़ बढ़ी, एक तीखी आवाज़ कहीं ऊपर से आई, "आई गई! आई गई! नक़ली आई गई!"
मिश्री का दिल रुक गया।
वो पलटी। और देखा कि बैठक के कोने में एक पिंजरा था, और उसमें एक हरा तोता बैठा था, बहुत बूढ़ा, बहुत ज़िंदा, जो उसे एक आँख से घूर रहा था।
"मिट्ठू!" पिंकी बुआ ने प्यार से कहा। "ये हमारा मिट्ठू है, पैंतीस साल का हो गया, पर ज़बान देखो आज भी कैंची। 'नक़ली आई गई' इसका तकिया कलाम है, जब भी कोई नया मेहमान आता है यही बोलता है, पता नहीं किसने सिखाया।"
मिश्री ने वीर को देखा।
वीर मिट्ठू को देख रहा था जैसे उसने कोई भूत देखा हो। मरा हुआ तोता। ज़िंदा, और सबसे पहले उसी ने सच बोल दिया था।
"कितना प्यारा है," मिश्री ने ज़ोर से कहा, और पिंजरे के पास गई, और तोते की आँख में आँख डालकर, बहुत मीठी आवाज़ में, सिर्फ़ इतना धीरे से बोली कि कोई और न सुने, "तू और मैं, मिट्ठू, हम दोनों जानते हैं। पर तू मेरा राज़ रखेगा, और मैं तेरा। डन?"
तोते ने सिर टेढ़ा किया। "डन," उसने कहा।
पिंकी बुआ ख़ुशी से उछल पड़ीं। "इसने तुझसे बात की! ये तो किसी से बात नहीं करता! देखा वीर, ये घर इसे पहले दिन से अपना मान रहा है!"
मिश्री मुस्कुराई, और अंदर ही अंदर सोचा कि वीर की डायरी अब उसके किसी काम की नहीं थी। उस डायरी में एक मरा हुआ तोता था और एक चुप परिवार। असली हवेली में एक बोलता तोता था और एक औरत जो सबको बुलाती थी और एक झगड़ा जिसके बारे में वीर ने कहा था कि पिंकी बुआ दस साल से अपने भाई से बात नहीं करतीं, पर वो तो अभी ताऊजी के कंधे पर हाथ रखकर हँस रही थीं।
सात साल। सात साल में घर बदल जाता है। और वीर उसे एक ऐसा घर पढ़ा रहा था जो अब कहीं था ही नहीं।
ये बात उसे डराती भी थी और, अजीब तरह से, उसे एक ताक़त भी देती थी। क्योंकि वीर का नक्शा बेकार था, पर मिश्री के पास नक्शा कभी था ही नहीं। उसके पास सिर्फ़ आँखें थीं, और बारह साल का हुनर ये पढ़ने का कि सामने वाला असल में क्या चाहता है। और इस घर में, उसने देखना शुरू किया, हर कोई कुछ न कुछ चाहता था।
और फिर आँगन शांत हो गया।
व्हीलचेयर की पहियों की आवाज़ आई, धीमी, लकड़ी के फ़र्श पर, और सब एक तरफ़ हट गए, और बड़ी दादी आईं।
मिश्री ने उन्हें कल गेट पर देखा था, दूर से। पास से वो और भी छोटी लगती थीं, और और भी बड़ी। चेहरे पर सौ साल की झुर्रियाँ, पर आँखें, उन आँखों में कुछ था जो मिश्री को थिएटर के सबसे आगे वाली कतार में बैठे उस एक दर्शक की याद दिलाता था जो सब समझ जाता है।
"पास आ, बेटा," दादी ने कहा। आवाज़ कमज़ोर थी, पर उसमें एक हुक्म था जिसे टाला नहीं जा सकता था।
मिश्री पास गई, और घुटनों के बल बैठ गई, ताकि दादी को ऊपर न देखना पड़े।
दादी ने बहुत देर तक उसका चेहरा देखा। इतनी देर कि मिश्री के अंदर का एक्टर भी थोड़ा काँपा। फिर उन्होंने अपना झुर्रीदार हाथ बढ़ाया, और मिश्री का हाथ पकड़ा, और उसकी हथेली में कुछ रखा। ठंडा। धातु का। भारी।
मिश्री ने नीचे नहीं देखा। उसे देखने की हिम्मत नहीं हुई।
"ये तुझे याद है, ना?" दादी ने धीरे से कहा, और उनकी उँगलियाँ मिश्री की उँगलियों को उस चीज़ के ऊपर बंद करती गईं। "तुझे पता है ये क्या है।"
और मिश्री को नहीं पता था।
उसकी हथेली में कुछ था जो इस परिवार के लिए मायने रखता था, कोई चाबी, कोई अँगूठी, कोई ताबीज़, और दादी की आँखें उस पर टिकी थीं, और पूरा परिवार देख रहा था, और वीर पीछे खड़ा था और मिश्री उसका चेहरा नहीं देख सकती थी, और इस बार कोई पिंकी बुआ नहीं थीं जिन्हें कहानी सुनाने में उलझाया जा सके।
बस एक मरती हुई औरत थी, जो उसका हाथ पकड़े थी, और पूछ रही थी कि क्या तुझे याद है।
मिश्री ने दादी की आँखों में देखा। और उसने झूठ नहीं बोला, क्योंकि उसने सीख लिया था कि इन आँखों से झूठ नहीं बोला जा सकता।
"मुझे ये याद है कि ये आपने दिया है," उसने धीरे से कहा। "बाक़ी सब मैं भूल भी जाऊँ, दादी, तो भी ये याद रहेगा कि ये आपके हाथ से मेरे हाथ में आया।"
आँगन में एक पल के लिए ख़ामोशी रही।
और फिर दादी के चेहरे पर कुछ आया, इतना हल्का कि शायद किसी ने नहीं देखा, सिवाय मिश्री के, जो चेहरे पढ़ना जानती थी। एक मुस्कान। पर हैरानी की नहीं। पहचान की। जैसे उन्हें कोई जवाब मिल गया हो जिसका वो इंतज़ार कर रही थीं।
"अच्छा," दादी ने सिर्फ़ इतना कहा, और मिश्री का हाथ छोड़ दिया। "जा। आराम कर। थक गई होगी, इतना लंबा सफ़र।"
मिश्री उठी, और तभी, सीढ़ियों के पास से, एक नई आवाज़ आई। नर्म, धीमी, और किसी तरह सबसे ठंडी।
"अरे, हमारी नई भाभी।"
एक आदमी सीढ़ियों से उतर रहा था, सूट में, बाल करीने से जमे हुए, हाथ में फ़ोन, होंठों पर एक मुस्कान जो आँखों तक नहीं पहुँचती थी। मिश्री ने वीर को देखा, और पहली बार पूरी सुबह में, वीर का चेहरा सच में सफ़ेद पड़ गया।
"युवराज," वीर ने कहा।
"भैया।" युवराज मिश्री के सामने आकर रुका, और उसने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, उस तरह नहीं जैसे कोई रिश्तेदार देखता है, बल्कि उस तरह जैसे कोई फ़ोटो से मिलान करता हो। उसकी मुस्कान चौड़ी हुई।
"स्वागत है घर में, भाभी," उसने कहा। "बस एक बात अजीब है।" उसने सिर थोड़ा टेढ़ा किया। "आप अपनी फ़ोटो से बिल्कुल नहीं मिलतीं।"