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अध्याय 9 / 12

सबसे लंबी रात

बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi

वीर ने फ़ैसला अकेले लिया, जैसा वो हमेशा करता था।

उस रात, युवराज के सौदे के बाद, मिश्री ने उसे कमरे में पाया, और उसके हाथ में युवराज का वो काग़ज़ था, दावा छोड़ने वाला, और उसके चेहरे पर वो शांति थी जो हार के बाद आती है।

"तुम इस पर दस्तख़त नहीं करोगे," मिश्री ने कहा, उसे पढ़ते हुए। "वीर, अगर तुमने ये कर दिया, तो युवराज सब कुछ हड़प लेगा, हवेली, कारोबार, सब। तुम्हारे पिता का नाम कभी साफ़ नहीं होगा। तुम सात साल इसीलिए लड़े थे।"

"और अगर मैं दस्तख़त नहीं करता," वीर ने शांत आवाज़ में कहा, "तो वो समारोह के दिन वो रिकॉर्डिंग चलाएगा, और सब जान जाएँगे कि तुम कौन हो। तुम्हें पुलिस तक घसीटा जा सकता है, मिश्री। धोखाधड़ी का इल्ज़ाम। तुम्हारा थिएटर, तुम्हारा नाम, सब ख़त्म।" उसने उसे देखा, और उसकी आँखों में कुछ था जो मिश्री समझ नहीं पाई, या समझना नहीं चाहती थी। "मैं ये नहीं होने दूँगा।"

"तो हम मिलकर लड़ेंगे।" मिश्री उसके क़रीब आई। "हमारे पास युवराज के ख़िलाफ़ सबूत है। उसकी तिजोरी के काग़ज़, नक़ली दस्तख़त, सब मेरे फ़ोन में हैं। हम दादी को बता सकते हैं, अनन्या गवाही दे सकती है। तुम अकेले नहीं हो, वीर। इस बार नहीं।"

और एक पल के लिए, मिश्री ने उसके चेहरे पर वो देखा जो वो छुपाना चाहता था, कि वो टूटना चाहता है, कि वो हाँ कहना चाहता है, कि वो थक गया है अकेले लड़ते-लड़ते। उसका हाथ आधा उठा, उसकी तरफ़, जैसे उसे थामने को।

फिर उसने वो हाथ नीचे कर लिया, और अपने अंदर वो दरवाज़ा बंद कर दिया, वैसे ही जैसे उसने पूरी ज़िंदगी हर दरवाज़ा बंद किया था।

"नहीं।" उसकी आवाज़ सख़्त हो गई, उतनी सख़्त जितनी पहले दिन थी, जब वो एक अजनबी था। पर मिश्री ने ग़ौर किया कि उसके हाथ काँप रहे थे, जैसे वो ये शब्द ख़ुद को ज़बरदस्ती बुलवा रहा हो। "कोई 'हम' नहीं है, मिश्री। ये मेरी लड़ाई है। मेरा परिवार। मेरा बोझ। तुम्हारा काम एक हफ़्ता बहू का रोल करना था। हफ़्ता ख़त्म हो रहा है।"

"तुम झूठ बोल रहे हो," मिश्री ने धीरे से कहा। "तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।"

"आँखें पढ़ना तुम्हारा काम है, मेरा नहीं। मैं एक्टर नहीं हूँ, मिश्री। तुम हो।" और उस एक वाक्य ने वो काट दिया जो किसी चाक़ू से नहीं कटता। उसने एक लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा, मोटा, पैसों से भरा। "ये रहा बाक़ी का आधा। तुम आज रात निकल जाओ। चुपचाप। इससे पहले कि ये सब और बिगड़े। तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए।"

कमरे में एक ख़ामोशी आई, उस तरह की जो किसी चीज़ के टूटने के बाद आती है।

मिश्री ने उस लिफ़ाफ़े को देखा। फिर वीर को। और उसके अंदर वो डर, जो उसने पूरे हफ़्ते दबाया था, अब सच बनकर सामने खड़ा था। बाग़ में कही गई वो सारी बातें, 'वो तुम हो', 'मुझे नक़ल नहीं चाहिए', सब एक लिफ़ाफ़े में सिमट गई थीं।

"समझ गई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, और यही सबसे बुरा था। "रोल ख़त्म। पेमेंट तैयार। एक्ट्रेस को घर भेज दो।" उसने लिफ़ाफ़ा नहीं उठाया। "तुमने सही कहा था, वीर। मैं भूल गई थी कि ये एक रोल है। एक पल के लिए मुझे लगा कि मैं सच में इस घर का हिस्सा हूँ। तुम्हारा हिस्सा। मेरी ग़लती।"

"मिश्री..."

"नहीं। तुम ठीक कह रहे हो।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी, और दहलीज़ पर रुकी, बिना पलटे, ठीक वैसे जैसे पहली रात उसने रुका था। "बस एक बात। मैं वो पैसे नहीं ले जा रही। क्योंकि जो मैंने पिछले कुछ दिनों में महसूस किया, वो किसी चेक पर नहीं लिखा जा सकता। और मैं नहीं चाहती कि तुम्हें कभी लगे कि वो भी एक्टिंग थी।"

और वो चली गई।

हवेली के गलियारे में, उसे पिंकी बुआ मिलीं।

"बहू? इस वक़्त, बैग लेकर, कहाँ?" पिंकी बुआ ने उसका उतरा चेहरा देखा, और तुरंत समझ गईं, ग़लत। "अरे! तुम दोनों में लड़ाई हुई है ना? मुझे पता था! नए जोड़ों में होती है। मैं अभी वीर को सीधा करती हूँ।" उन्होंने मिश्री का हाथ पकड़ा। "सुन, पहली लड़ाई में जो रूठकर मायके चला जाता है ना, वो हार जाता है। तू यहीं रुक। मैं उसके कान खींचती हूँ। मेरे भाई का बेटा है, पर है तो मर्द ही, अक़्ल घुटनों में।"

और मिश्री, जिसका दिल अभी-अभी टूटा था, ने पाया कि उसकी आँखों में एक हँसी और एक आँसू एक साथ आ गए, क्योंकि पिंकी बुआ की मोहब्बत उतनी ही सच्ची थी जितनी ग़लत।

"बुआजी," उसने धीरे से कहा, उनका हाथ थामकर, "आप इस घर की सबसे अच्छी चीज़ हैं। ये बात कभी मत भूलिएगा।"

और इससे पहले कि पिंकी बुआ कुछ और कहतीं, उसका फ़ोन बजा। बोबी।

"दीदी, अनन्या कह रही है कुछ गड़बड़ है, युवराज ने आज दो बार बैंक फ़ोन किया... दीदी? आप रो रही हैं?"

"नहीं, बोबी।"

"दीदी, बारह साल से आपकी आवाज़ सुन रहा हूँ। मुझे पता है आप कब झूठ बोलती हैं।" एक पल की चुप्पी। "घर आ जाओ, दीदी। असली वाला घर। थिएटर। मैं हूँ ना।"

और मिश्री गेट तक पहुँच गई।

राठौड़ हवेली का वही पीतल का विशाल दरवाज़ा, जिसे एक हफ़्ते पहले उसने डरते हुए पार किया था। अब वो उसके बाहर खड़ी थी, बैग कंधे पर, और आगे एक सड़क थी जो उसे उसकी पुरानी ज़िंदगी में वापस ले जाती, छोटी, सुरक्षित, और उसकी अपनी।

उसने एक क़दम बढ़ाया।

और रुक गई।

आगे एक सीधी सड़क थी। उसका छोटा सा कमरा, उसका टूटा थिएटर, उसकी पुरानी ज़िंदगी जहाँ कोई उसे धोखा नहीं देता था, क्योंकि किसी को उसकी इतनी परवाह ही नहीं थी। सुरक्षित। छोटी। उसकी अपनी। वो उस सड़क पर चल सकती थी, और कुछ ही दिनों में ये पूरा हफ़्ता एक किरदार बन जाता जिसे उसने कभी निभाया था और भूल गई थी, जैसे वो सारे किरदार भूल जाती थी। यही समझदारी थी। यही सुरक्षित था। पैसे उसके बैग में थे, और थिएटर का किराया बच जाता, और कोई उसका दिल नहीं तोड़ता, क्योंकि वहाँ कोई उसका दिल जानता ही नहीं था।

पर फिर उसे याद आया। वो आग जो वीर ने अपने सिर ली। वो दादी जो सच जानती थीं और कुछ कहती नहीं थीं। वो हवेली जिसे युवराज एक मरती हुई औरत के दस्तख़त चुराकर बेच रहा था। और उसके अपने फ़ोन में, युवराज के सारे गुनाह क़ैद थे।

वीर ने उसे धक्का दिया था क्योंकि वो उसे बचाना चाहता था। उसी मूर्खता से जिससे उसने सात साल पहले ख़ुद को क़ुर्बान किया था। ये उस आदमी की आदत थी, अकेले डूबना, ताकि कोई और न डूबे।

और मिश्री शर्मा को डूबते हुए लोग किनारे से देखना नहीं आता था।

उसने अपना बैग ज़मीन पर रखा। और पलट गई।

"तुम एक्ट्रेस को निकाल सकते हो, वीर राठौड़," उसने अँधेरे में, ख़ुद से कहा, और एक हल्की, गीली मुस्कान उसके चेहरे पर आई। "पर तुमने एक्ट्रेस को नौकरी पर रखते वक़्त ये नहीं पढ़ा कि उसकी एक आदत है। वो अधूरा शो छोड़कर नहीं जाती।"

वो वापस हवेली की तरफ़ बढ़ी।

और तभी, ऊपर की एक खिड़की से, एक धीमी आवाज़ आई।

"मुझे पता था तू नहीं जाएगी।"

मिश्री ने ऊपर देखा। बड़ी दादी अपनी खिड़की पर थीं, चाँदनी में, जागी हुई, जैसे वो पूरी रात वहीं बैठी इंतज़ार कर रही हों।

"ऊपर आ, बेटा," दादी ने कहा। "हम दोनों को बात करनी है। और अब झूठ की ज़रूरत नहीं।"

मिश्री दादी के कमरे में पहुँची, और दादी ने उसे अपने पास बिठाया, और बहुत देर तक उसका चेहरा देखा, उन्हीं आँखों से जो पहले दिन से सब पढ़ लेती थीं।

"बैठ," दादी ने कहा। "और सुन। मैं पैंसठ साल से इस घर की मालकिन हूँ। मैंने दो पति दफ़नाए हैं, एक बेटा खोया है, और इस हवेली का हर पत्थर मेरे हाथ का छुआ हुआ है।" वो मुस्कुराईं, और उस मुस्कान में थकान थी, और शरारत भी। "तू सच में सोचती है कि मैं अपने ही पोते की आँखें नहीं पहचानती जब वो पहली बार सच में मुस्कुराता है? कि मुझे नहीं पता कि मेरी असली बहू उदयपुर में किसी और के साथ भाग गई?"

मिश्री का दिल रुक गया।

"बेटा," बड़ी दादी ने उसका हाथ अपने काँपते हाथों में लिया, "मुझे पहली रात से पता है कि तू नक़ली बहू है। मुझे शुरू से सब पता है।"

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