अध्याय 8 / 12
नक़ल असली से
बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi
अब तीन लोग एक टीम हैं, मिश्री, वीर और छुपी हुई असली अनन्या, और तीनों मिलकर युवराज का सच खोदते हैं, वो दादी के दस्तख़त नक़ल करके हवेली गिरवी रख रहा है। मिश्री अपनी अदाकारी को पहली बार हथियार बनाती है, एक नौकरानी का भेस, एक चुराई हुई आवाज़, और एक जोखिम भरी सेंध। बीच में, वीर उसे चुपके से बता देता है कि असली दुल्हन के होते हुए भी उसे कौन चाहिए। पर जैसे ही सबूत उनके हाथ आता है, युवराज अपना पत्ता खोल देता है।
असली अनन्या को छुपाना अपने आप में एक नाटक था।
बोबी उसे शहर के एक सस्ते से होटल में ले गया था, उसी इलाक़े में जहाँ रौनक थिएटर था, और मिश्री को एहसास हुआ कि उसकी दो दुनियाएँ, हवेली वाली और थिएटर वाली, अब एक अजीब से तरीक़े से जुड़ गई थीं। एक तरफ़ नक़ली बहू महल में, दूसरी तरफ़ असली दुल्हन एक होटल के कमरे में, और बीच में एक डरपोक लाइट बोर्ड ऑपरेटर जो दोनों के बीच चाय और ख़बरें पहुँचा रहा था।
"मैं एक हफ़्ते पहले एक एक्ट्रेस थी जिसका सबसे बड़ा सपना था किराया देना," मिश्री ने उस रात अनन्या के होटल के कमरे में कहा, जहाँ वो चुपके से पहुँची थी, घूँघट में, हवेली से निकलकर। "अब मैं एक हवेली की साज़िश, एक नक़ली शादी, और एक असली खलनायक के बीच खड़ी हूँ। मेरी ज़िंदगी एक सीरियल बन गई है, और बोबी कहता है इसमें ट्विस्ट अभी बाक़ी हैं।"
अनन्या हँसी, थकी हुई, पर सच्ची। और फिर तीनों, मिश्री, वीर जो बाद में आया, और अनन्या, उस छोटे से कमरे में बैठकर वो करने लगे जो उन्हें करना था। योजना।
"युवराज हवेली को गिरवी रख रहा है," अनन्या ने कहा, अपने बैग से कुछ काग़ज़ निकालते हुए। "मैंने शादी से पहले इतना देख लिया था। उसने एक फ़र्ज़ी कंपनी बनाई है, और उस कंपनी के नाम पर वो राठौड़ की संपत्तियाँ एक-एक करके बैंक के पास रख रहा है। पर इसके लिए उसे दादी के दस्तख़त चाहिए, क्योंकि असली मालिक अब भी वही हैं। और दादी कभी दस्तख़त नहीं करेंगी।"
"तो वो दस्तख़त नक़ल कर रहा है," वीर ने कहा, और उसके जबड़े की हड्डी सख़्त हुई। "सात साल पहले उसने मेरे पिता का नाम जलाया। अब वो दादी का नाम चुरा रहा है।"
"हमें वो काग़ज़ चाहिए," मिश्री ने कहा। "असली वाले। जिन पर नक़ली दस्तख़त हैं। वो युवराज के कमरे में होंगे, उसकी उस तिजोरी में, या उसकी मेज़ में। सबूत के बिना, ये सिर्फ़ हमारी कहानी है, और इस घर में युवराज की कहानी पर लोग ज़्यादा यक़ीन करते हैं।"
वीर ने उसे देखा। "उसके कमरे में सेंध मारना ख़तरनाक है। अगर तुम पकड़ी गईं..."
"मैं नहीं पकड़ी जाऊँगी।" मिश्री मुस्कुराई, और उस मुस्कान में पहली बार पूरे हफ़्ते का डर नहीं था, बल्कि कुछ और था, एक चमक, एक कलाकार की चमक जिसे आख़िरकार एक असली मंच मिल गया हो। "तुम भूल रहे हो मैं कौन हूँ, वीर राठौड़। तुमने एक एक्ट्रेस को नौकरी पर रखा था। आज तुम देखोगे कि एक्ट्रेस किस काम आती है।"
मौक़ा अगली दोपहर आया।
समारोह की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं, हवेली मेहमानों, हलवाइयों, और दर्ज़ियों से भरी थी, और इस अफ़रा-तफ़री में एक और चेहरा किसी को नहीं दिखता। तो जब एक नई नौकरानी, सिर पर पल्लू, हाथ में सफ़ाई का सामान, झुकी हुई चाल, युवराज के कमरे की तरफ़ बढ़ी, तो किसी ने दोबारा नहीं देखा।
मिश्री ने आवाज़ भी बदल ली थी, एक गाँव की लड़की की, थोड़ी ऊँची, थोड़ी डरी हुई, और जब रास्ते में एक असली नौकरानी ने उससे पूछा कि वो कौन है, तो उसने इतनी सहजता से कहा, "मुझे दर्ज़ी वाली बाई ने भेजा है, ऊपर के कमरे साफ़ करने," कि वो ख़ुद भी एक पल को यक़ीन कर बैठी।
युवराज का कमरा बंद था, पर ताला पुराना था, और मिश्री ने थिएटर में एक बार एक चोर का किरदार निभाया था जिसके लिए उसने सच में ताले खोलना सीखा था, क्योंकि उसके गुरुजी कहते थे कि नक़ली ताला नक़ली लगता है। दरवाज़ा खुला।
अंदर, उसने काम शुरू किया, तेज़ी से, पर शांत हाथों से। मेज़ की दराज़ें। अलमारी। और फिर, एक झूठी किताबों की शेल्फ़ के पीछे, एक छोटी तिजोरी। बंद।
और तभी, बाहर गलियारे में, पिंकी बुआ की आवाज़ गूँजी।
"युवराज? बेटा, तेरे कमरे में कौन है? मैंने अभी किसी को अंदर जाते देखा।"
मिश्री का दिल रुका। दरवाज़ा खुलने ही वाला था।
तो उसने वो किया जो सिर्फ़ वही कर सकती थी। उसने अपनी आवाज़ बदली, इस बार युवराज की नहीं, बल्कि उस नई नौकरानी की झेंपी हुई आवाज़ में, और दरवाज़े के पीछे से बोली, "बुआजी, मैं हूँ, सफ़ाई वाली। युवराज भैया ने ख़ुद कहा था कमरा साफ़ करने को, समारोह है ना।"
एक पल की चुप्पी। फिर पिंकी बुआ, संतुष्ट, "अच्छा अच्छा, ठीक है, पर जल्दी कर, और हाँ, उसकी अलमारी मत छूना, वो बहुत चीज़ों का हिसाब रखता है।" और उनके क़दम दूर चले गए।
मिश्री ने एक लंबी साँस छोड़ी, और फिर मुस्कुराई, क्योंकि पिंकी बुआ ने अनजाने में उसे ठीक बता दिया था कि देखना कहाँ है। अलमारी। हिसाब।
तिजोरी की चाबी अलमारी के पीछे, एक पुराने डिब्बे में थी। और तिजोरी के अंदर, वो सब था। गिरवी के काग़ज़, फ़र्ज़ी कंपनी के दस्तावेज़, और सबसे ऊपर, एक काग़ज़ जिस पर सावित्री देवी राठौड़ के दस्तख़त थे, ताज़े, और बिल्कुल नक़ली, क्योंकि असली सावित्री देवी के हाथ अब इतने नहीं काँपते थे जितना इन दस्तख़तों में दिखाने की कोशिश की गई थी।
मिश्री ने हर काग़ज़ की तस्वीर खींची, हाथ स्थिर रखते हुए, और फिर सब कुछ वैसे ही रखकर, तिजोरी बंद करके, कमरे से निकल गई, ठीक उसी झुकी हुई चाल से जिससे आई थी।
उस रात, वीर ने उसे पिछले बाग़ में पाया, जहाँ वो ठंडी हवा में खड़ी थी, और हाथ में फ़ोन था जिसमें युवराज के सारे गुनाह क़ैद थे।
"तुमने कर दिखाया," वीर ने कहा, हैरानी और कुछ और से भरी आवाज़ में।
"मैंने कहा था ना।" पर मिश्री की आवाज़ में उतनी ख़ुशी नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी, क्योंकि उसके दिमाग़ में एक और बात चल रही थी, वो जो उसने पूरे हफ़्ते दबाई थी। "वीर। कल अनन्या वापस आ सकती है। असली वाली। और मेरा काम... ख़त्म है। तुम्हें अब मेरी ज़रूरत नहीं।"
वीर बहुत देर तक चुप रहा।
"उस रात जब मैंने तुम्हें चूमा," उसने आख़िरकार कहा, धीरे से, "तुमने सोचा मैं अनन्या को चूम रहा था? उस बहू को जो तुम निभा रही हो?"
मिश्री ने जवाब नहीं दिया। पर उसकी ख़ामोशी ने दे दिया।
वीर उसके क़रीब आया। "मिश्री। मेरी असली दुल्हन इस शहर में है, एक होटल के कमरे में, और मैं उसके पास जा सकता हूँ, और ये पूरा झूठ ख़त्म कर सकता हूँ। पर मैं यहाँ हूँ। तुम्हारे साथ। एक ठंडे बाग़ में, चोरी के काग़ज़ों के साथ। क्योंकि मुझे अनन्या नहीं चाहिए।" उसने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। "मुझे वो लड़की चाहिए जो एक तोते से डील कर लेती है। जो एक मरते हुए आदमी को 'अपनेपन की भूख' खिला देती है। जो मुझे बचाने के लिए अँधेरे में मेरे दुश्मन के कमरे में चली जाती है। वो कोई रोल नहीं है, मिश्री। वो तुम हो। और मैं पूरी ज़िंदगी एक नक़ल के साथ नहीं जी सकता जब असली मेरे सामने खड़ी हो।"
और मिश्री का वो डर, वो जो पूरे हफ़्ते उसके सीने में बँधा था, थोड़ा ढीला पड़ा। थोड़ा। क्योंकि कुछ डर लफ़्ज़ों से नहीं जाते।
"और जब ये सब ख़त्म होगा?" उसने पूछा। "जब झूठ का परदा गिरेगा, और सब जानेंगे कि मैं एक किराए की एक्ट्रेस थी? तब भी?"
"तब भी," वीर ने कहा।
पर क़िस्मत को उनकी ये बात पसंद नहीं आई।
क्योंकि बाग़ के अँधेरे से एक तीसरी आवाज़ आई, शांत, साफ़, और बहुत संतुष्ट।
"कितनी प्यारी बात है," युवराज ने कहा, छाया से बाहर आते हुए, हाथ में अपना फ़ोन। "मैं तो कहता हूँ इसे रिकॉर्ड कर लेना चाहिए। अरे, मैंने तो कर लिया।"
उसने फ़ोन का बटन दबाया। और उसमें से मिश्री की अपनी आवाज़ आई, कुछ दिन पुरानी, उसके और बोबी की बातचीत, साफ़ रिकॉर्ड की हुई, "मुझे लगा था मैं एक हफ़्ता एक्टिंग करूँगी और निकल जाऊँगी... ये मेरा घर नहीं है, बोबी। मैं यहाँ एक रोल हूँ।"
मिश्री का ख़ून जम गया।
"मेरे पास तुम्हारे चोरी के काग़ज़ों से कहीं ज़्यादा बड़ा सबूत है, भैया," युवराज ने वीर से कहा, मुस्कुराते हुए। "मेरे पास तुम्हारी पूरी झूठी शादी है, इसकी अपनी आवाज़ में। तो अब एक सौदा करते हैं। तुम अपने हिस्से के, इस हवेली के, सब पर अपना दावा छोड़ दोगे। चुपचाप। एक काग़ज़ पर दस्तख़त करके। वरना समारोह के दिन, पूरे परिवार के सामने, मैं ये रिकॉर्डिंग चला दूँगा। और सब देखेंगे कि वीर राठौड़ ने एक मरती हुई दादी के साथ कितना बड़ा धोखा किया।" उसने फ़ोन जेब में रखा। "सोच लो। समारोह में दो दिन हैं।"