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अध्याय 4 / 12

मिठाई का इम्तिहान

बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi

मिश्री ने वो फटा काग़ज़ नीचे रख दिया।

"मैंने पूछा नहीं," उसने कहा, बहुत धीरे। "ये सामने आ गया। फ़र्क़ है।"

वीर कमरे में आया, दरवाज़ा बंद किया, और काग़ज़ उठाकर वापस उस लोहे के बक्से में रखा, और बक्सा बंद किया, और बहुत देर तक उस पर हाथ रखे खड़ा रहा, जैसे उसे डर हो कि वो फिर खुल जाएगा।

"तुमने वादा किया था," उसने कहा।

"कि मैं नहीं पूछूँगी कि तुम घर क्यों छोड़ गए। और मैं नहीं पूछ रही।" मिश्री ने उसे देखा। "पर मैं अंधी नहीं हूँ, वीर। मैंने वो लाइन पढ़ ली। 'आग इसने नहीं लगाई।' तुमने किसी और का गुनाह अपने सिर लिया, और इस घर ने तुम्हें इसके लिए सज़ा दी, और तुम सात साल चुप रहे।"

"वो तुम्हारा काम नहीं है।"

"नहीं है," वो मानी। "मेरा काम एक हफ़्ता बहू का रोल करना है, पैसे लेना है, और चले जाना है। पर मैं तुम्हें एक बात बता दूँ, मिस्टर वीर राठौड़।" वो उठी, और उसके सामने आई, और पहली बार उसमें कोई अदाकारी नहीं थी। "मैंने ज़िंदगी में बहुत किरदार निभाए हैं। बुरे आदमी, अच्छे आदमी, और वो जो अच्छे होने का नाटक करते हैं। और मैं फ़र्क़ पहचानती हूँ। तुम बुरे आदमी नहीं हो। तुम वो आदमी हो जो किसी को बचाने के लिए ख़ुद को बुरा बनने देता है। और वो अकेलापन..." उसकी आवाज़ नरम हुई। "वो मैंने भी जिया है। बस इतना।"

वीर ने उसे देखा, और एक पल के लिए कुछ उसके चेहरे पर आया, कुछ जो सात साल से बंद था, और फिर उसने मुँह फेर लिया।

"नीचे चलो," उसने कहा, आवाज़ फिर सपाट। "नाश्ते का वक़्त है। बहू को देर नहीं करनी चाहिए।"

पर जब वो दरवाज़े तक पहुँचा, तो रुका, और बिना पलटे, बहुत धीरे से कहा, "शुक्रिया।"

और चला गया।

मिश्री वहीं खड़ी रही, और उसने पाया कि उसका दिल थोड़ा तेज़ चल रहा था, और उसने ख़ुद को याद दिलाया कि ये भी एक रोल था, ये सब, और दिल को रोल और सच का फ़र्क़ समझाना सबसे मुश्किल काम होता है।

नाश्ते की मेज़ पर मुसीबत इंतज़ार कर रही थी।

"समारोह इसी हफ़्ते के आख़िर में है," पिंकी बुआ ने ऐलान किया, जैसे वो कोई समाचार वाचक हों। "और बड़ी दादी ने कहा है, हमारी नई बहू अपने हाथ से राठौड़ का मोहनथाल बनाएगी, उस दिन, सबके सामने। पर उससे पहले," उन्होंने आँखें नचाईं, "दादी एक बार चखकर देखना चाहती हैं कि बहू के हाथ में वो बात है या नहीं। जैसे इस घर की हर बहू की पहली रसोई परखी गई है। है ना दादी?"

मेज़ के सिरे पर बैठी दादी ने धीरे से सिर हिलाया, और उनकी नज़र मिश्री पर टिकी रही।

"राठौड़ का मोहनथाल," पिंकी बुआ आगे बढ़ीं, "की रेसिपी सिर्फ़ इस घर की बहुएँ जानती हैं। सावित्री दादी ने अपनी सास से सीखी, फिर अपनी बहुओं को सिखाई। उसमें एक चीज़ ख़ास है जो बाहर के किसी हलवाई को नहीं पता। तुझे तो अनन्या बेटा, तेरी सास ने... मतलब, तूने तो सीख ही ली होगी ना, शादी से पहले?"

पूरी मेज़ मिश्री की तरफ़ मुड़ी।

और मिश्री, जिसने ज़िंदगी में सिर्फ़ मैगी और वो भी कभी-कभी जली हुई बनाई थी, ने मुस्कुराकर कहा, "बिल्कुल बुआजी। बस मैं चाहती हूँ कि उस दिन ये दादी के हाथ के स्वाद जैसा बने, इसलिए मैं इन छह दिनों में दादी की रसोई को थोड़ा और समझना चाहूँगी। हर घर के मोहनथाल में थोड़ा फ़र्क़ होता है ना।"

ये एक अच्छा बचाव था। पर वो जानती थी कि छह दिन बाद एक रसोई होगी, और एक देखता हुआ परिवार, और एक मिठाई जो उससे बननी ही नहीं थी।

उस रात, वो रसोई में चली गई। अकेले। अँधेरे में, सिर्फ़ एक बल्ब जलाकर, उसने बेसन का डिब्बा खोला और उसे ऐसे देखा जैसे वो कोई दुश्मन हो।

"उसमें घी पहले गरम होता है," एक आवाज़ ने कहा। "बेसन बाद में।"

वीर दरवाज़े पर खड़ा था।

"तुम्हें खाना बनाना आता है?" मिश्री ने हैरानी से पूछा।

"मैं इस रसोई में बड़ा हुआ हूँ।" वो अंदर आया, आस्तीनें मोड़ते हुए। "काका के पीछे-पीछे। माँ के जाने के बाद, ये रसोई ही थी जहाँ कोई मुझसे ये नहीं पूछता था कि मैं क्या बनूँगा।" उसने कड़ाही उठाई। "मोहनथाल मुश्किल नहीं है। बस सब्र माँगता है। और तुममें वो एक ही चीज़ की कमी है।"

"ओए।" पर मिश्री मुस्कुरा रही थी।

और फिर अगले दो घंटे, राठौड़ हवेली की उस पुरानी रसोई में, एक अजीब सी चीज़ हुई।

वीर ने उसे सिखाया, और उसके सिखाने में वो सख़्ती नहीं थी जो दिन में होती थी। उसके हाथ धीमे थे, धीरज वाले। उसने उसे दिखाया कि घी कब सुनहरा होता है, कि बेसन को कब तक भूनना है ताकि उसकी ख़ुशबू बदल जाए, और जब मिश्री ने चाशनी में उँगली डालकर चखी और मुँह बनाया, तो वो हँसा, सच में हँसा, पहली बार, और वो हँसी उस पूरे घर से अलग आवाज़ की थी।

आटा हवा में उड़ा। मिश्री के गाल पर बेसन लग गया, और वीर ने बिना सोचे हाथ बढ़ाकर उसे पोंछा, और फिर दोनों रुक गए, क्योंकि उसकी उँगलियाँ उसके गाल पर थीं, और रसोई अचानक बहुत छोटी हो गई थी, और बहुत गरम।

"बेसन," वीर ने कहा, बहुत धीरे, अपना हाथ हटाते हुए, पर हटाते-हटाते भी एक पल देर लगाकर।

"हाँ," मिश्री ने कहा, और उसकी आवाज़ अजीब थी। "बेसन।"

बाहर, बाग़ में, एक मोर बोला। अंदर, कड़ाही में चाशनी खौलती रही, और दो लोग एक-दूसरे से एक क़दम दूर खड़े रहे, और वो एक क़दम अचानक दुनिया का सबसे लंबा और सबसे छोटा फ़ासला बन गया।

मिश्री पीछे हटी। क्योंकि उसे याद आया कि वो एक रोल था। और रोल में दिल नहीं लगाते।

"मुझे... मुझे रेसिपी सीखनी है," उसने कहा, मुड़कर कड़ाही की तरफ़। "बस यही। शुक्रिया।"

वीर ने उसे एक पल देखा, फिर सिर हिलाया, और बाक़ी रात उन्होंने एक सुरक्षित फ़ासले से मिठाई बनाई, और हँसी कम हो गई, पर पूरी तरह गई नहीं।

उन दो दिनों में, मिश्री ने दो चीज़ें देखीं जो उसका पीछा करती रहीं।

पहली, वो चाँदी की चाबी। उसके पल्लू में अब भी बंधी थी, और हर बार जब उसकी उँगली उससे छूती, एक सवाल उठता जो जाता ही नहीं था। दादी ने उसे ये चाबी क्यों दी? एक मरती हुई औरत ने एक अजनबी बहू की हथेली में ठीक वही चाबी रख दी जो उसके अपने पोते के सबसे गहरे राज़ का ताला खोलती थी। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता था। पर जब भी मिश्री दादी के कमरे की तरफ़ देखती, उन्हें खिड़की के पास शांत बैठा पाती, और उन आँखों को पढ़ना उतना ही मुश्किल था जितना एक बंद किताब को।

दूसरी, युवराज। एक दोपहर वो बरामदे से गुज़र रही थी, और उसने युवराज को फ़ोन पर सुना, धीमी आवाज़ में, पर तीखी। "...काग़ज़ तैयार रखो। दादी के दस्तख़त की चिंता मत करो, वो मैं संभाल लूँगा। बस बैंक वाले से कहो हवेली की फ़ाइल अलग रखे, समारोह से पहले।" उसने मुड़कर मिश्री को देखा, मुस्कुराया, और फ़ोन जेब में रख लिया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर मिश्री ने शब्द पकड़ लिए थे। दादी के दस्तख़त। हवेली की फ़ाइल। बैंक। कुछ था जो युवराज इस घर के साथ कर रहा था, अभी, इसी वक़्त, चुपचाप, और किसी को ख़बर नहीं थी।

उसने ये दोनों बातें अपने पास रखीं। और भूली नहीं।

और फिर, परख का दिन आया।

पूरा परिवार इकट्ठा था। दादी व्हीलचेयर पर, सामने। पिंकी बुआ उत्साह में। और मिश्री के सामने सारा सामान, और एक खाली कड़ाही, और एक सच जो वो अकेले जानती थी, कि छह रात की मेहनत के बाद भी, उसका मोहनथाल बिल्कुल वैसा नहीं बनता था जैसा इस घर का बनता था। उसमें कुछ कम रह जाता था, वो ख़ास चीज़ जो किसी रेसिपी में लिखी नहीं थी।

तो उसने वो किया जो वो सबसे अच्छा कर सकती थी। उसने सच नहीं छुपाया। उसने उसे एक कहानी बना दिया।

"दादी," उसने मिठाई बनाते हुए कहा, अपने हाथ चलाते हुए, अपनी आवाज़ पूरे कमरे में फैलाते हुए, "मैं आपको एक बात बताऊँ? मैंने ये मिठाई बनाना इस घर में सीखा। मेरी अपनी माँ नहीं हैं, बहुत पहले चली गईं। तो मेरे पास कोई ऐसी रसोई नहीं थी जहाँ कोई मुझे ये सिखाता। और इन छह दिनों में, जब मैं ये बना रही थी, मुझे लगा जैसे पहली बार मुझे एक माँ की रसोई मिली है। तो अगर ये आपके मोहनथाल जैसा न बने, तो माफ़ करना। पर इसमें एक चीज़ ज़रूर है जो आपके घर की हर मिठाई में होती है।" उसने थाली दादी के सामने रखी। "अपनेपन की भूख।"

कमरे में ख़ामोशी थी।

दादी ने एक टुकड़ा उठाया। धीरे से चखा। और बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

फिर उन्होंने मिश्री को देखा, उन्हीं आँखों से जो सब पढ़ लेती थीं, और कहा, "स्वाद में थोड़ा कच्चा है।" पिंकी बुआ की साँस रुकी। "पर नीयत पक्की है। और बेटा, इस घर में सात पुश्तों से, मिठाई स्वाद से नहीं, नीयत से बनती है।" उन्होंने एक और टुकड़ा उठाया। "पास।"

पिंकी बुआ ताली बजाने लगीं, और परिवार राहत में हँसा, और मिश्री ने वीर को देखा, जो पीछे खड़ा था, और उसकी आँखों में कुछ था जो तालियों से ज़्यादा गरम था।

पर कमरे के दूसरे कोने में, युवराज खड़ा नहीं था।

वो बाहर बरामदे में था, फ़ोन पर, और उसके सामने मेज़ पर एक आदमी बैठा था, सादे कपड़ों में, जिसे किसी ने हवेली में नहीं देखा था। उस आदमी ने अपने थैले से एक काग़ज़ निकाला और मेज़ पर सरकाया।

एक पोस्टर। पुराना। रौनक थिएटर, जयपुर। और बीच में, एक लड़की की तस्वीर, मुकुट पहने, हाथ उठाए, किसी नाटक की रानी।

मिश्री शर्मा।

युवराज ने उसे उठाया, बहुत इत्मीनान से, और मुस्कुराया, उस तरह जैसे शिकारी तब मुस्कुराता है जब जाल का आख़िरी सिरा उसके हाथ में आ जाता है।

"तो," उसने धीरे से कहा, तस्वीर पर उँगली फेरते हुए। "भाभीजी एक्ट्रेस हैं।"

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