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Chapter 11 of 12

महफ़िल

बहू नंबर तीन by Avni Oberoi

राठौड़ हवेली ने वैसा दिन सालों में नहीं देखा था।

आँगन फूलों से भरा था, झूमरों की रोशनी में, और पूरा ख़ानदान इकट्ठा था, दूर-दूर के रिश्तेदार, शहर के बड़े लोग, और बीच में, एक ऊँचे आसन पर, बड़ी दादी, अपनी सबसे अच्छी साड़ी में, छोटी और राजसी। आज उनका आशीर्वाद समारोह था। आज वो अपनी नई बहू को पूरे समाज के सामने अपनाने वाली थीं।

और मिश्री जानती थी कि आज सब कुछ टूटने वाला है। बस ये नहीं पता था कि किस तरफ़।

क्योंकि अनन्या युवराज के पास थी, कहीं, और दादी का सावधानी से बुना जाल अब आधा खुल चुका था, और वीर का चेहरा शांत था पर उसकी मुट्ठियाँ बँधी थीं, और मिश्री की जेब में उसका फ़ोन था जिसमें युवराज के गुनाह क़ैद थे, पर उसे पता था कि एक एक्ट्रेस की तस्वीरों पर इस महफ़िल में कोई यक़ीन नहीं करेगा।

युवराज ने इंतज़ार नहीं किया।

जैसे ही दादी ने मिश्री को आशीर्वाद के लिए आगे बुलाया, और मिश्री झुकने को हुई, युवराज की आवाज़ पूरे आँगन में गूँजी, साफ़, शांत, और ज़हरीली।

"रुकिए, दादी।"

सब पलटे।

"इससे पहले कि आप इसे अपनी बहू कहें," युवराज मुस्कुराते हुए आगे आया, हाथ में अपना फ़ोन, "मैं चाहता हूँ पूरा परिवार एक चीज़ सुने। ये औरत, जिसे वीर भैया अपनी पत्नी कहकर लाए हैं, अनन्या सिंघवी नहीं है।" उसने नाटकीय अंदाज़ में रुककर कहा। "इसका नाम मिश्री शर्मा है। ये एक थिएटर की एक्ट्रेस है। वीर भैया ने इसे पैसे देकर ख़रीदा है, एक मरती हुई दादी को धोखा देने के लिए।"

आँगन में एक हलचल दौड़ी, फिर एक भयानक ख़ामोशी।

युवराज ने बटन दबाया, और मिश्री की अपनी आवाज़ पूरी महफ़िल में फैल गई, "...ये मेरा घर नहीं है, बोबी। मैं यहाँ एक रोल हूँ।"

रिश्तेदार फुसफुसाने लगे। ताऊजी महेंद्र खड़े हो गए, चेहरा क्रोध से लाल। वीर ने आगे बढ़ना चाहा पर मिश्री ने एक हल्का सा इशारा किया, रुको। दादी का चेहरा पत्थर था।

और मिश्री शर्मा, जिसे अभी-अभी पूरे समाज के सामने नंगा किया गया था, ने वो किया जो उसने पूरी ज़िंदगी सीखा था।

वो मंच पर चढ़ गई।

"वाह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक पूरे आँगन को भर गई, वो थिएटर वाली आवाज़ जो आख़िरी कतार तक पहुँचती है। उसने ताली बजाई, धीरे-धीरे। "क्या एंट्री थी, युवराज जी। टाइमिंग परफ़ेक्ट। एक अच्छे विलेन की तरह।" वो मुस्कुराई, और उस मुस्कान में अब कोई डर नहीं था। "हाँ। मैं एक एक्ट्रेस हूँ। मेरा नाम मिश्री शर्मा है। मुझे पैसे देकर लाया गया था। ये सच है। पूरा परिवार सुन ले, मैं इनकार नहीं करती।"

रिश्तेदार चौंके। युवराज की मुस्कान एक पल को लड़खड़ाई, क्योंकि शिकार का इस तरह ख़ुद आगे बढ़कर आना उसकी स्क्रिप्ट में नहीं था।

"पर अब जब हम सच बोल ही रहे हैं," मिश्री ने आगे कहा, और टहलने लगी, धीरे-धीरे, पूरी महफ़िल को अपनी मुट्ठी में लेते हुए, जैसे कोई कलाकार अपने मंच पर, "तो आज की रात सच की रात बना देते हैं। मैंने पिछले एक हफ़्ते में इस घर के बारे में बहुत कुछ सीखा। और सबसे बड़ी बात जो मैंने सीखी, वो ये थी कि इस घर में सबसे बड़ा झूठ मैं नहीं हूँ।" उसने युवराज की तरफ़ देखा। "सबसे बड़ा झूठ सात साल पुराना है। एक आग। एक फ़ैक्ट्री। और एक आदमी जिसने किसी और का गुनाह अपने सिर लिया।"

ताऊजी की भौंहें सिकुड़ीं। "क्या बकवास है ये?"

"बकवास?" मिश्री ने मासूमियत से कहा। "मुझे क्या पता, ताऊजी, मैं तो बस एक एक्ट्रेस हूँ। मेरी बात का क्या भरोसा। है ना, युवराज जी? आप ही ने तो कहा, एक किराए की एक्ट्रेस की बात पर कौन यक़ीन करेगा।" वो उसके क़रीब आई, और अपनी आवाज़ धीमी की, पर इतनी नहीं कि महफ़िल न सुने, बस इतनी कि वो एक जाल जैसी लगे। "तो आप बेफ़िक्र रहिए। आपका राज़, फ़ैक्ट्री के पैसे, वो आग जो आपने सबूत मिटाने के लिए लगाई, ये सब मेरे साथ ही दफ़न हो जाएगा। आख़िर मेरी बात पर कौन यक़ीन करेगा। आप जीत गए। बस ज़रा मुस्कुराकर दिखा दीजिए, ताकि मैं हारी हुई एक्ट्रेस अपनी आख़िरी तस्वीर ले सकूँ।"

और युवराज, जिसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी उसका घमंड था, जो सात साल से अपनी जीत का नशा पी रहा था, जिसे लगता था कि उसने अभी-अभी जीत लिया है, वो मुस्कुराया, और उस घमंड में, उस एक पल की लापरवाही में, उसने वो कह दिया जो उसे कभी नहीं कहना था।

"यक़ीन तो किसी को नहीं करना था," उसने धीरे से कहा, सिर्फ़ उसकी तरफ़ झुककर, जीत के मद में, "इसीलिए तो वो आग इतनी सफ़ाई से लगी थी। चाचा की फ़ैक्ट्री, चाचा की लापरवाही, और वीर भैया का बेवक़ूफ़ प्यार। मैंने तो बस माचिस जलाई, बाक़ी सब इस परिवार ने ख़ुद कर लिया।"

मिश्री मुस्कुराई।

और पीछे हटी।

और उसने ज़ोर से, पूरी महफ़िल को सुनाते हुए कहा, "शुक्रिया, युवराज जी। पूरे परिवार के सामने ये कबूल करने के लिए।"

युवराज का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

उसने चारों तरफ़ देखा। हर रिश्तेदार उसे देख रहा था। ताऊजी का मुँह खुला था। और तभी, आँगन के दूसरे सिरे से, एक और आवाज़ आई।

"और मैं गवाह हूँ कि इसने मुझे धमकी दी थी, जब मैंने इसके काग़ज़ों के बारे में सवाल पूछा था।"

अनन्या थी। असली वाली। और उसके साथ, उसका हाथ थामे, हाँफता हुआ पर सीना तानकर खड़ा, बोबी था, जिसने उस रात युवराज की गाड़ी का पीछा किया था, एक स्कूटर पर, जयपुर के आधे शहर में, और उस गोदाम तक पहुँचा था जहाँ अनन्या को रखा गया था, और अपनी ज़िंदगी में पहली बार, बिना किसी स्क्रिप्ट के, एक हीरो बन गया था।

"और सबूत?" मिश्री ने अपना फ़ोन ऊपर उठाया। "वो भी है। दादी के नक़ली दस्तख़त, गिरवी के काग़ज़, फ़र्ज़ी कंपनी, सब। आपकी अपनी तिजोरी से।"

और तब, ऊँचे आसन से, बड़ी दादी की आवाज़ आई, धीमी, पर उस महफ़िल में सबसे भारी।

"बैठ जा, युवराज।" उन्होंने कहा। "खेल ख़त्म हुआ। और हाँ, ये पूरा खेल मैंने रचा था। मैंने वीर को बुलाया, मैंने इस लड़की को इस घर में रहने दिया, सिर्फ़ इसलिए कि तू अपने घमंड में ख़ुद को बेनक़ाब कर दे। और तूने कर दिया।" उनकी आँखों में पैंसठ साल का दर्द और एक पल की जीत दोनों थे। "तूने मेरे सीधे बेटे को बदनाम किया। तूने मेरे पोते की ज़िंदगी जलाई। और तू मेरे दस्तख़त चुराकर मेरा घर बेच रहा था। आज, इन सबके सामने, इस घर ने सच सुन लिया है।"

युवराज ने भागना चाहा, पर रिश्तेदारों की दीवार ने उसे रोक लिया, और ताऊजी, उसके अपने पिता, ने उसका हाथ पकड़ा, और उस बूढ़े सख़्त आदमी की आँखों में आँसू थे, क्रोध के, शर्म के, और एक पिता के टूटने के। "मेरे साथ चल," उन्होंने कहा। "अभी।"

महफ़िल इंसाफ़ की एक लहर में बह गई। वीर सात साल बाद आज़ाद था। उसके पिता का नाम साफ़ था।

और फिर कुछ हुआ जो मिश्री ने अपने किसी शो में नहीं देखा था।

वो महफ़िल, जो कुछ पल पहले उसे 'नौटंकी वाली' कहकर फुसफुसा रही थी, अब चुप थी। और फिर, एक-एक करके, लोग खड़े होने लगे। किसी एक ने ताली बजाई। फिर किसी और ने। और देखते-देखते राठौड़ हवेली का वो पूरा आँगन तालियों से गूँज उठा, उस लड़की के लिए जो एक झूठ बनकर आई थी और इस घर का सबसे पुराना सच बाहर खींच ले गई थी। एक बूढ़े रिश्तेदार ने अपनी आँखें पोंछते हुए ज़ोर से कहा, "अरे छोड़ो ये नक़ली-असली। यही तो है इस घर की असली बहू।" और उसे सुधारने कोई नहीं आया।

मिश्री मंच जैसे उस ऊँचे आसन पर खड़ी रही, और बारह साल में पहली बार, वो तालियाँ किसी रानी के लिए नहीं, किसी किरदार के लिए नहीं, मिश्री शर्मा के लिए थीं। और ये उसकी ज़िंदगी की सबसे मीठी, और सबसे अकेली, ताली थी।

क्योंकि तालियाँ शो के लिए होती हैं। और शो के बाद, कलाकार हमेशा अकेला घर जाता है।

और जब रोशनी और शोर अपने चरम पर था, जब वीर रिश्तेदारों के बीच घिरा था, जब दादी की आँखें भर आई थीं, तब किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उस आसन पर खड़ी वो लड़की धीरे-धीरे पीछे हट रही थी।

क्योंकि मिश्री ने वो सब सुना था जो रिश्तेदार फुसफुसा रहे थे। "एक्ट्रेस।" "नौटंकी वाली।" "वीर बाबा अब किसी अच्छे घर में शादी करेंगे।" और उसके अंदर वो पुराना डर वापस आ गया था, और इस बार और ज़ोर से। वीर ने उसे महफ़िल में, झूठ में, रोल में चाहा था। पर ये महफ़िल ख़त्म हो रही थी। और मिश्री को नहीं पता था कि महफ़िल के बाद, असली दुनिया की रोशनी में, क्या वो आदमी एक एक्ट्रेस को अपना पाएगा, या वो भी सिर्फ़ एक किरदार से प्यार कर बैठा था।

रोल ख़त्म हो गया था। और कलाकार, जैसा कलाकार करता है, परदा गिरने से पहले चुपचाप मंच से उतर गई।

जब वीर ने भीड़ से निकलकर मुड़कर देखा, उस जगह जहाँ वो खड़ी थी, वहाँ सिर्फ़ झूमर की रोशनी थी।

मिश्री जा चुकी थी।

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