Chapter 6 of 12
झूठ के सात फेरे
वीर समझता है कि मिश्री ने उसे धोखा दिया, और दोनों के बीच एक लड़ाई छिड़ती है, जिसमें वो सारी कशिश फट पड़ती है जो हफ़्ते भर से पक रही थी। फिर सच सामने आता है, मिश्री युवराज के पास वीर को बचाने गई थी, और वीर का कवच गिर जाता है। पहली बार वो अपनी सच्चाई खोलता है, उस आग की, जो उसने नहीं लगाई पर जिसका इल्ज़ाम उसने अपने मरते पिता की इज़्ज़त बचाने के लिए अपने सिर ले लिया। झूठ इक़रार बन जाता है। और एक बोसा। फिर, बोबी का फ़ोन, और एक नाम जो सब कुछ हिला देता है।
वीर ने मिश्री से पूरा दिन बात नहीं की।
नाश्ते पर उसने उसे नहीं देखा। दोपहर को वो हवेली में कहीं ग़ायब रहा। और जब शाम को वो कमरे में आया, तो उसका चेहरा वैसा था जैसा पहले दिन था, बंद, सपाट, उस आदमी का जिसने अपने चारों तरफ़ दीवार खड़ी कर रखी हो।
"तुम युवराज के कमरे में क्या कर रही थीं?" उसने पूछा, बिना भूमिका के।
मिश्री ने उसे देखा। वो जानती थी ये सवाल आएगा।
"वीर, ये वो नहीं है जो तुम सोच रहे हो।"
"रात के अँधेरे में, चोरों की तरह, मेरे उस भाई के कमरे से निकलते हुए जिसने मुझे इस घर से निकलवाया।" उसकी आवाज़ शांत थी, और शांति में एक धार थी। "मैं क्या सोचूँ, मिश्री? तुम्हें युवराज ने ख़रीद लिया? कितने में? मैंने जो दिया उससे ज़्यादा?"
और कुछ मिश्री के अंदर टूटा।
"हाँ," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ भी तेज़ थी, "मुझे ख़रीदा गया। तुमने ख़रीदा, याद है? एक चेक, एक ख़ाली थिएटर में, एक लड़की जिसके पास अड़तालीस रुपए थे। तुम्हें मुझ पर भरोसा करने का हक़ नहीं, क्योंकि तुमने ख़ुद ही मुझे एक ख़रीदी हुई चीज़ बनाया।" वो एक क़दम आगे आई। "पर एक बात सुन लो, वीर राठौड़। मैं युवराज के कमरे में तुम्हें बेचने नहीं गई थी। मैं तुम्हें बचाने गई थी।"
वीर रुका।
"तुम्हारे प्यारे भाई के पास मेरी असली पहचान है। मेरा पोस्टर, मेरा नाम, सब। उसने मुझे धमकी दी, उसकी जासूस बन जाओ, उस पर नज़र रखो जो वीर इस घर में ढूँढ रहा है, वरना समारोह के दिन वो सबके सामने बता देगा कि तुम एक किराए की एक्ट्रेस को बहू बनाकर लाए हो।" उसकी आवाज़ काँपी। "तो मैं उसके कमरे में गई। एक झूठी फ़ाइल छोड़ने। उसे बेकार की जानकारी देने। उसे उलझाए रखने, ताकि वो तुम्हें असली नुक़सान न पहुँचा सके। मैं रात के अँधेरे में चोरों की तरह तुम्हें बचा रही थी, और तुम मुझे ख़रीदी हुई कह रहे हो।"
कमरे में ख़ामोशी छा गई।
वीर उसे देख रहा था, और धीरे-धीरे, उसके चेहरे की वो दीवार दरकने लगी, ईंट दर ईंट, जब तक उसके पीछे का आदमी दिखने न लगा, थका हुआ, अकेला, और अचानक बहुत छोटा।
"तुमने... मेरे लिए ये किया?" उसने कहा। "क्यों? तुम्हारा हफ़्ता ख़त्म होने वाला है। तुम पैसे लेकर जा सकती थीं। तुम्हें मुझे बचाने की क्या ज़रूरत थी?"
और मिश्री के पास इसका कोई चालाक जवाब नहीं था। कोई अदाकारी नहीं। बस सच।
"क्योंकि मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो किसी को डूबता देखकर किनारे चले जाते हैं," उसने धीरे से कहा। "और क्योंकि... मैं अब जानती हूँ कि तुम कौन हो, वीर। और मुझसे वो आदमी डूबते हुए नहीं देखा जाता।"
वीर बहुत देर तक चुप रहा। और फिर, जैसे कोई दरवाज़ा जो सात साल से बंद था, उसने उसे खोल दिया।
"मेरे पिता इस फ़ैक्ट्री को चलाते थे," उसने कहा, और खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगा, क्योंकि कुछ बातें आँख में आँख डालकर नहीं कही जातीं। "राठौड़ की पुरानी फ़ैक्ट्री। दादी के दो बेटे, ताऊजी बड़े, मेरे पिता छोटे। ताऊजी को मुख्य कारोबार मिला, मेरे पिता को वो पुरानी फ़ैक्ट्री, जो घाटे में थी। पर मेरे पिता ने कभी शिकायत नहीं की। वो कहते थे, ईमानदारी की रोटी छोटी हो तो भी पूरी पचती है।"
मिश्री चुप रही। उसे पता था कि इस तरह की कहानी को बीच में रोका नहीं जाता।
"फिर एक रात, आग लगी।" वीर की आवाज़ धीमी हुई। "फ़ैक्ट्री जल गई। लाखों का नुक़सान। और जाँच में पता चला कि वो आग किसी की लापरवाही से लगी थी। हिसाब-किताब में गड़बड़ थी, पैसे इधर-उधर हुए थे, और किसी ने सबूत मिटाने के लिए आग लगाई थी।" वो रुका। "वो युवराज था। उसने फ़ैक्ट्री के पैसे चुराए थे, सालों से, और जब पकड़े जाने का डर हुआ, तो उसने सब जला दिया।"
"और इल्ज़ाम तुम्हारे पिता पर आया," मिश्री ने धीरे से कहा।
"मेरे पिता की फ़ैक्ट्री थी। उनकी निगरानी थी। क़ानून की नज़र में, गुनहगार वो थे।" वीर मुड़ा, और उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, उससे भी बुरा कुछ था, सूखापन। "और मेरे पिता उन दिनों मर रहे थे, मिश्री। दिल की बीमारी। डॉक्टर ने कहा था कुछ महीने। और मैं एक ऐसी दुनिया में उन्हें जाते नहीं देख सकता था जहाँ उनका नाम एक चोर और मुजरिम का नाम हो। जहाँ उनकी आख़िरी साँस जेल या अदालत में हो।"
कमरे की हवा भारी हो गई।
"तो मैंने कहा कि आग मैंने लगाई।" वीर ने कहा, बहुत सीधे, जैसे ये कोई बड़ी बात न हो, और यही सबसे बड़ी बात थी। "मैंने कहा, मैं लापरवाह था, मेरी ग़लती थी, मेरी जवानी का पागलपन था। किसी को यक़ीन करने में देर नहीं लगी, क्योंकि मैं हमेशा से 'बिगड़ा हुआ' बेटा था। मुझे घर से निकाल दिया गया। कारोबार से बेदख़ल। और मेरे पिता..." उसकी आवाज़ टूटी, पहली बार। "मेरे पिता तीन महीने बाद चले गए। साफ़ नाम के साथ। ये सोचते हुए कि उनका बेटा बिगड़ैल था, पर उनकी इज़्ज़त बची रही। और मैंने उन्हें कभी सच नहीं बताया। मैंने उन्हें ये मानते हुए जाने दिया कि मैं... कि मैं वो था।"
मिश्री की आँखों में पानी था।
"और युवराज?" उसने पूछा।
"युवराज को इनाम मिला। मेरी जगह। मेरा हिस्सा। और सात साल वो इस घर को वैसे ही खाता रहा जैसे उसने फ़ैक्ट्री को खाया था।" वीर ने उसे देखा। "मेरे पास सबूत नहीं था, मिश्री। तब भी नहीं, अब भी नहीं। मैं चला गया क्योंकि रुकता तो मेरे पिता का नाम मिट्टी में मिल जाता। और मैं अब वापस आया हूँ, इस झूठी शादी के बहाने, इस घर के अंदर, सिर्फ़ एक चीज़ के लिए। वो सबूत ढूँढने, इससे पहले कि दादी ये पूरी हवेली युवराज के हाथ में सौंप दें।"
और अब मिश्री समझ गई। सब कुछ। वो छोटा सा झूठ जिसमें वो हाँ कहकर आई थी, बहू बनने का झूठ, वो एक बहुत बड़े, बहुत पुराने, बहुत गहरे ज़ख़्म के ऊपर बँधी एक पट्टी थी। और इसीलिए वीर सच नहीं बोल सकता था, किसी से नहीं, क्योंकि एक झूठ की डोर खींचो तो दूसरा खुल जाता, और उसके पीछे एक मरे हुए पिता का नाम बँधा था।
"तुमने एक मरते हुए आदमी को बचाने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी जला दी," उसने कहा, और उसका हाथ अपने आप उठा, और वीर के गाल पर उस जगह रुका जहाँ दो दिन पहले उसने बेसन पोंछा था। "तुम बुरे आदमी नहीं हो, वीर। तुम इस घर के अकेले अच्छे आदमी हो। और इस घर ने तुम्हें इसकी सबसे बड़ी सज़ा दी।"
वीर ने उसका हाथ अपने गाल पर महसूस किया, और इस बार वो पीछे नहीं हटा।
"सात साल में," उसने धीरे से कहा, "किसी ने मुझसे ये नहीं कहा।"
"किसी ने तुम्हें देखा ही नहीं," मिश्री ने कहा।
और कमरा बहुत छोटा हो गया, और बहुत गरम, और इस बार कोई बेसन नहीं था, कोई बहाना नहीं था, कोई रोल नहीं था, और जब वीर ने झुककर उसे चूमा, तो मिश्री ने ख़ुद को ये नहीं समझाया कि ये भी एक अदाकारी है, क्योंकि वो जानती थी कि ये उसकी ज़िंदगी का इकलौता पल था जिसमें वो कोई किरदार नहीं निभा रही थी।
वो बस मिश्री थी। और वो बस वीर था। और बीच में अब कोई तकियों की सरहद नहीं थी।
बहुत देर बाद, जब वो अलग हुए, वीर ने अपना माथा उसके माथे से टिकाया और हँसा, उस दुर्लभ हँसी से, "ये हमारी स्क्रिप्ट में नहीं था।"
"अच्छे एक्टर स्क्रिप्ट से थोड़ा हट जाते हैं," मिश्री ने फुसफुसाकर कहा।
और तभी उसका फ़ोन बजा।
बोबी। मिश्री ने मुस्कुराते हुए उठाया, "बोबी, अभी नहीं, मैं..."
"दीदी!" बोबी की आवाज़ काँप रही थी, और उसमें कोई मसखरी नहीं थी, और यही सबसे डरावना था। "दीदी, अभी थिएटर पर एक औरत आई थी। आपको ढूँढ रही थी। आपका असली नाम जानती थी। और दीदी..." बोबी ने साँस ली। "उसने कहा उसका नाम अनन्या सिंघवी है। असली वाली। और वो जयपुर आ रही है। राठौड़ हवेली। आज रात की ट्रेन से।"
मिश्री का हाथ फ़ोन पर जम गया।
कमरे के उस पार, वीर अब भी मुस्कुरा रहा था, उस पल में जो अभी-अभी बीता था, ये जाने बिना कि असली दुल्हन, वो जिसकी जगह मिश्री खड़ी थी, अब इस घर की तरफ़ चल पड़ी थी।