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अध्याय 5 / 12

जेठ जी का सौदा

बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi

सुबह-सुबह मिश्री का फ़ोन बजा, और दूसरी तरफ़ बोबी था, और वो रो रहा था।

"दीदी, बहुत बुरी ख़बर है।"

मिश्री का दिल बैठ गया। "थिएटर? मकान मालिक?"

"नहीं, उससे भी बुरी।" बोबी ने नाक सुड़की। "मैंने वो सीरियल देखना शुरू किया जो आप कहती थीं फ़ालतू है, और दीदी, आप सही थीं, बहू सच में पिछले जन्म में नागिन थी, और मैं अब सो नहीं पा रहा।"

मिश्री ने आँखें बंद कीं और मुस्कुराई, और एक पल के लिए राठौड़ हवेली, युवराज, झूठ, सब ग़ायब हो गया, और सिर्फ़ उसका बेवक़ूफ़ दोस्त बचा जो उसे याद दिलाता था कि उसकी एक असली ज़िंदगी भी थी।

"बोबी।"

"हाँ दीदी।"

"मुझे तेरी आवाज़ की ज़रूरत थी। पता नहीं थी, पर थी।"

लाइन पर एक पल चुप्पी रही। फिर बोबी ने, अपनी सारी मसखरी छोड़कर, धीरे से पूछा, "दीदी, आप ठीक हैं ना? वहाँ सब... ठीक है ना?"

और मिश्री, जो झूठ बोलने में माहिर थी, ने पाया कि वो अपने इकलौते दोस्त से झूठ नहीं बोल पाई।

"पता नहीं, बोबी," उसने कहा। "मुझे लगा था मैं एक हफ़्ता एक्टिंग करूँगी और निकल जाऊँगी। पर ये घर... ये लोग मुझमें घुसते जा रहे हैं। और मुझे डर लग रहा है कि जब मैं जाऊँगी, तो कुछ छूट जाएगा।"

"तो मत जाओ," बोबी ने सीधा कहा, जैसे ज़िंदगी इतनी आसान हो।

"ये मेरा घर नहीं है, बोबी। मैं यहाँ एक रोल हूँ।" उसने ये बात उतनी ही ख़ुद से कही जितनी उससे। "रोल ख़त्म होता है। हमेशा।"

उसने फ़ोन रखा, और मुड़ी, और युवराज दरवाज़े पर खड़ा था।

मिश्री को नहीं पता वो कितनी देर से वहाँ था, या उसने कितना सुना। पर उसके चेहरे की मुस्कान बता रही थी, काफ़ी।

"रोल," युवराज ने वो शब्द ऐसे चखा जैसे मिठाई हो। "कितना सही शब्द है, भाभीजी। या मैं आपको आपके असली नाम से बुलाऊँ?" उसने जेब से वो पोस्टर निकाला, मोड़ा हुआ, और खोला। रौनक थिएटर। मिश्री शर्मा। "मिश्री।"

मिश्री का गला सूख गया, पर उसका चेहरा नहीं बदला। बारह साल का थिएटर इसी एक पल के लिए था।

"अच्छी तस्वीर है," उसने ठंडी आवाज़ में कहा। "फ़ोटोग्राफ़र को टिप कम दी थी, फिर भी।"

युवराज हँसा, सच में, पहली बार उसकी हँसी आँखों तक पहुँची, और वो उसे और भी डरावना बनाती थी। "मुझे आप पसंद आईं, मिश्री। सच में। आप डरती नहीं, ये दुर्लभ है।" वो अंदर आया, दरवाज़ा बंद किया। "तो सीधी बात करता हूँ। मुझे नहीं पता वीर भैया आपको लाए क्यों हैं, और सच कहूँ तो मुझे परवाह नहीं कि उनकी असली बीवी कहाँ है। पर वीर भैया सात साल बाद अचानक लौटे हैं, और बेवजह नहीं लौटे। वो कुछ ढूँढ रहे हैं इस घर में। और मुझे जानना है क्या।"

"और मैं आपकी क्या मदद करूँ?" मिश्री ने कहा, हालाँकि उसे जवाब पता था।

"आप उनके सबसे क़रीब हैं। उनके कमरे में। उनके बिस्तर में।" उसने पल्ला छोड़ा। "आप मेरी आँखें बनेंगी। जो वीर भैया करते हैं, ढूँढते हैं, बोलते हैं, मुझे पता चलेगा। बदले में, समारोह के दिन, जब पूरा परिवार इकट्ठा होगा और दादी आख़िरी बार सबको आशीर्वाद देंगी, मैं चुप रहूँगा। ये पोस्टर किसी को नहीं दिखाऊँगा। वरना..." उसने कंधे उचकाए, बहुत सहज, बहुत भयानक। "वरना मैं सबको बता दूँगा कि वीर राठौड़ एक मरती हुई दादी के सामने एक किराए की एक्ट्रेस को बहू बनाकर खड़ा कर गया। सोचिए वीर भैया की कितनी इज़्ज़त बचेगी। और उनके हिस्से की दौलत का क्या होगा। और इस परिवार की नाक का।"

उसने Dadi का ज़िक्र नहीं किया, मिश्री ने ग़ौर किया। उसकी धमकी में दादी की जान नहीं थी, सिर्फ़ इज़्ज़त, पैसा, नाम। शायद वो भी जानता था कि उस बूढ़ी औरत को इतनी आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता।

"मुझे सोचने का वक़्त चाहिए," मिश्री ने कहा।

"समारोह में चार दिन हैं," युवराज ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा। "उतना ही वक़्त है।" और वो चला गया, जैसे उसने अभी मौसम की बात की हो।

मिश्री वहीं खड़ी रही, और उसे एक बात समझ आ गई, ठंडी और साफ़। वो युवराज की जासूस नहीं बनेगी। पर अगर उसने सीधे मना किया, तो वो आज ही बेनक़ाब कर देगा। तो उसे वही करना था जो वो सबसे अच्छा करती थी। नाटक। उसे युवराज को यक़ीन दिलाना था कि वो उसके साथ है, उसे बेकार की, झूठी, बेज़रूरी जानकारी देनी थी, और वीर को बचाना था, सबकी नज़रों के बीच।

एक दोहरा खेल। और मिश्री को डर इस बात का नहीं था कि वो हार जाएगी। डर इस बात का था कि वो जानती थी वो जीत सकती है। वो इसमें इतनी अच्छी थी। और जो इंसान झूठ में इतना अच्छा हो, उसे कैसे पता चले कि वो ख़ुद से कब झूठ बोल रहा है?

उस दोपहर, दादी ने उसे बुलाया।

बड़ी दादी का कमरा हवेली के सबसे ऊपर था, धूप से भरा, और दीवारों पर पुरानी तस्वीरें थीं, काले-सफ़ेद चेहरे जो मिश्री को नहीं पहचानते थे। दादी खिड़की के पास बैठी थीं, एक शॉल ओढ़े, और उन्होंने मिश्री को पास बुलाया, अपने बिस्तर के किनारे।

"मेरे पैर दबा दे, बेटा," उन्होंने कहा। "बहुओं के यही काम होते हैं। और इसी बहाने हम बात कर लेंगे।"

मिश्री बैठ गई, और दादी के पतले पैर अपने हाथ में लिए, और दबाने लगी, और कुछ देर दोनों चुप रहीं।

"तुझे पता है ये घर कैसे बना?" दादी ने आख़िरकार पूछा, खिड़की के बाहर देखते हुए। "मेरे ससुर ने एक छोटी सी दुकान से शुरू किया था। एक कड़ाही, एक तराज़ू, और ईमानदारी। वो कहते थे, मिठाई झूठ नहीं बोल सकती। जो डालोगे, वही स्वाद आएगा। प्यार डालो तो प्यार, लालच डालो तो लालच।" उन्होंने रुककर कहा। "आज इस घर में बहुत मिठाई बनती है, बेटा। पर मुझे डर है कि किसी ने उसमें लालच डालना शुरू कर दिया है।"

मिश्री ने ऊपर देखा। दादी की आँखें अब भी खिड़की के बाहर थीं।

"मेरे दो पोते हैं," दादी ने कहा। "एक को इस घर ने सिर पर बिठाया। एक को निकाल दिया। और सात साल से मैं रात को सोचती हूँ कि कहीं हमने उल्टा तो नहीं कर दिया।" उन्होंने धीरे से मिश्री का हाथ थपथपाया। "मैंने वीर को वापस बुलाया, बेटा। मैंने ही। मैंने कहा, घर आ जा, एक शर्त पर, कि तू अपनी ज़िंदगी सँवार ले, बस ले, ताकि मैं सुकून से जा सकूँ। पर सच बताऊँ?" वो मिश्री की तरफ़ मुड़ीं, और उन आँखों में कुछ था, गहरा, पैना। "मैंने उसे इसलिए नहीं बुलाया कि मैं उसकी शादी देखना चाहती थी। मैंने उसे इसलिए बुलाया क्योंकि सच को बाहर लाने का सिर्फ़ एक तरीक़ा है। उसे अंदर लाना।"

मिश्री के हाथ रुक गए।

दादी मुस्कुराईं, बूढ़ी, थकी, और किसी तरह सबसे जागी हुई मुस्कान। "ख़ैर। एक बूढ़ी औरत की बातें हैं। तू ध्यान मत दे।" उन्होंने आँखें बंद कीं। "बस इतना जान, बेटा। इस घर में जो दिख रहा है, वो पूरा सच नहीं है। न मेरे बारे में, न वीर के बारे में।" एक पल रुककर। "और शायद न तेरे बारे में।"

मिश्री की साँस अटकी।

पर दादी की आँखें बंद थीं, और उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी, और उन्होंने और कुछ नहीं कहा, और मिश्री को समझ नहीं आया कि वो क्या जानती थीं और क्या सिर्फ़ एक बूढ़ी औरत की थकान थी।

वो उस कमरे से निकली, और उसका दिल भारी था, और हल्का, दोनों एक साथ। ये अब कोई काम नहीं रहा था। कहीं रास्ते में, इस घर ने, इस मरती हुई औरत ने, उस जली हुई आँखों वाले आदमी ने, उसे चुरा लिया था।

और उसी रात, उसने वो किया जो ज़रूरी था। उसने युवराज को एक झूठा सुराग़ दिया, बस इतना कि वो ख़ुश रहे, और चुप रहे। वो युवराज के कमरे में गई, चुपके से, अँधेरे में, और एक बेकार सी फ़ाइल उसकी मेज़ पर छोड़ आई, जिसमें वीर के बारे में आधा सच और आधा झूठ था, बस उसे उलझाए रखने के लिए।

और जब वो युवराज के कमरे से निकली, दरवाज़ा धीरे से बंद करते हुए, चोरों की तरह, तो उसने सिर उठाया।

और गलियारे के दूसरे सिरे पर, वीर खड़ा था।

उसने मिश्री को देखा। युवराज के कमरे से निकलते। रात के अँधेरे में। चुपके से।

और मिश्री ने उसका चेहरा देखा, और देखा कि कैसे एक चीज़ टूटती है जब उसके टूटने की आवाज़ नहीं आती। वीर ने कुछ नहीं कहा। उसने बस उसे देखा, उस आदमी की तरह जो अभी-अभी समझा हो कि उसने एक बार फिर ग़लत इंसान पर भरोसा किया।

और फिर वो मुड़ा, और चला गया, और मिश्री गलियारे में अकेली खड़ी रह गई, उस झूठ के साथ जो उसने उसे बचाने के लिए बोला था, और जो अब उसे ही खा रहा था।

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