अध्याय 3 / 12
एक कमरा, दो अजनबी
बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi
नई बहू और नए पति को एक ही कमरा मिलता है, और मिश्री और वीर को नवविवाहित होने का नाटक बहुत क़रीब से करना पड़ता है, बीच में तकिए की एक सरहद के साथ। मिश्री देखती है कि ये घर वीर को एक भूत की तरह देखता है, सिवाय बूढ़े काका के। और वीर के बंद पड़े पुराने कमरे की सफ़ाई करते हुए उसे कुछ मिलता है, एक फटा हुआ क़ानूनी काग़ज़ और एक बच्चे की ड्रॉइंग, जो बताते हैं कि वीर अपनी मर्ज़ी से घर नहीं छोड़ गया था। और अब वो सच मिश्री के हाथ में है।
"मैं अपनी फ़ोटो से नहीं मिलती," मिश्री ने कहा, और मुस्कुराई, "क्योंकि शादी के बाद नींद पूरी नहीं हुई, देवरजी। आपके भैया घुर्राटे लेते हैं।"
आँगन में कुछ लोग हँसे। पिंकी बुआ सबसे ज़ोर से। युवराज की मुस्कान एक पल को जमी, फिर वापस आ गई, पर अब उसमें थोड़ी धार थी।
"वाह," उसने धीरे से कहा। "भाभी मज़ाक भी करती हैं।" उसने वीर को देखा। "बड़े छुपे रुस्तम निकले आप, भैया। सात साल कोई ख़बर नहीं, और अचानक शादी करके सीधे घर। कुछ तो ख़ास बात होगी इनमें।" उसकी नज़र वापस मिश्री पर आई, एक सेकंड ज़्यादा देर तक रुकी। "मैं पता लगाऊँगा क्या।"
और वो चला गया, फ़ोन कान से लगाते हुए, जैसे ये सब उसके लिए कोई खेल हो जिसमें उसे जल्दी नहीं थी।
मिश्री ने साँस छोड़ी, और महसूस किया कि उसकी हथेली में अब भी दादी की दी हुई वो चीज़ बंद थी, और उसने अब तक उसे देखा नहीं था।
रात को, जब हवेली सो गई, उसने देखा।
वो एक छोटी सी चाँदी की चाबी थी, बहुत पुरानी, जिस पर एक फूल खुदा था। वो किस ताले की थी, मिश्री को नहीं पता था। पर दादी ने उसे ऐसे दिया था जैसे उसका मतलब हो। उसने उसे अपने पल्लू के कोने में बाँध लिया।
"ये कमरा हमारा है," वीर ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा।
मिश्री ने कमरे को देखा। एक बड़ा सा पुराना कमरा, ऊँची छत, एक खिड़की जिससे हवेली का पिछला बाग़ दिखता था। और बीच में, एक पलंग।
एक।
"एक पलंग," मिश्री ने कहा।
"नवविवाहित जोड़े को एक ही पलंग मिलता है," वीर ने कहा, अपनी टाई खोलते हुए, बिना उसकी तरफ़ देखे। "वरना नौकर बात करेंगे, नौकर पिंकी बुआ को बताएँगे, और पिंकी बुआ पूरे राजस्थान को।"
"ठीक है।" मिश्री ने तकिए उठाए और पलंग के बीचोंबीच एक दीवार बना दी, तकिए, एक कंबल, और उसका अपना दुपट्टा सबसे ऊपर, जैसे किसी देश की सरहद। "ये लाइन है। उधर तुम्हारा मुल्क, इधर मेरा। जो सरहद पार करेगा, वो जंग का ऐलान समझा जाएगा।"
वीर ने पहली बार उस पूरी रात उसे देखा। और उसके होंठ के कोने में फिर वही चीज़ हिली, मुस्कान का वो दूर का रिश्तेदार।
"तुम हमेशा इतना बोलती हो?" उसने पूछा।
"सिर्फ़ तब जब मैं डरी हुई होती हूँ," मिश्री ने सच कहा, इससे पहले कि वो ख़ुद को रोक पाती, और फिर दोनों एक पल के लिए चुप हो गए, क्योंकि सच कमरे में आ गया था और उसे वापस भेजने का कोई तरीक़ा नहीं था।
वीर सरहद के अपनी तरफ़ लेट गया, मुँह दूसरी तरफ़। मिश्री अपनी तरफ़।
रात के तीन बजे, मिश्री जाग रही थी। ये उसकी पुरानी आदत थी, नई जगह में नींद नहीं आती थी, और ये जगह तो सबसे नई थी। उसने करवट बदली, और उसका पैर ग़लती से तकियों की सरहद पार कर गया, और वीर की पिंडली से टकराया।
"सरहद," वीर की आवाज़ अँधेरे से आई, पूरी जागी हुई।
"माफ़ करना। युद्धविराम तोड़ने का इरादा नहीं था।" मिश्री ने पैर खींचा। एक पल चुप्पी। फिर, "तुम भी जाग रहे हो।"
"अपना ही घर है। यहाँ मुझे और भी नींद नहीं आती।"
मिश्री अँधेरे में मुस्कुराई, जहाँ कोई देख नहीं सकता था। "ज़रा सोचो। दो लोग एक पलंग पर, एक-दूसरे से डरते हुए, जागते हुए, और बीच में तकियों की दीवार। अगर पिंकी बुआ ने सुबह ये नज़ारा देख लिया, तो उन्हें वहीं दिल का दौरा पड़ जाएगा।"
वीर की तरफ़ से एक आवाज़ आई, हँसी रोकने की नाकाम कोशिश। "और वो पूरे राजस्थान को बता देंगी कि नई बहू पति को तकिए के उस पार रखती है।"
"और मिट्ठू गवाही देगा।" मिश्री ने तोते की नक़ल उतारी, हूबहू, तीखी और बूढ़ी, "नक़ली आई गई! नक़ली आई गई!"
और इस बार वीर सच में हँसा, अँधेरे में, धीमे से, ताकि कोई और न सुने। और मिश्री ने वो हँसी कहीं अपने अंदर रख ली, क्योंकि उसे लगा कि वो दुर्लभ थी, और शायद किसी ने उसे बहुत दिनों से नहीं सुना था।
फिर एक नरम सी चुप्पी आई। और उसी चुप्पी में, छत को घूरते हुए, मिश्री ने पूछा, "तुम्हारा परिवार तुमसे ऐसे क्यों बात करता है?"
"कैसे?"
"जैसे तुम यहाँ हो भी और नहीं भी। ताऊजी तुमसे आँख नहीं मिलाते। नौकर तुम्हारे पास से ऐसे गुज़रते हैं जैसे तुम कोई पुरानी तस्वीर हो दीवार पर। सिर्फ़ वो बूढ़े काका हैं जो तुम्हें... इंसान की तरह देखते हैं।"
वीर बहुत देर तक चुप रहा।
"सो जाओ, मिश्री," उसने आख़िरकार कहा। "कल लंबा दिन है।"
पर मिश्री ने उसकी साँसों से जाना कि वो सोया नहीं। बहुत देर तक नहीं।
सुबह, नहाने से पहले, उसने चुपके से बोबी को फ़ोन किया।
"दीदी!" बोबी फुसफुसाया, जैसे वो ख़ुद किसी जासूसी फ़िल्म में हो। "बताओ, ऑपरेशन कैसा चल रहा है? पकड़ी तो नहीं गईं?"
"अभी तक नहीं। बस एक तोते ने मुझे आते ही 'नक़ली' बोल दिया था।"
"तोते?" बोबी की आवाज़ ऊँची हुई, फिर वापस फुसफुसाहट में आई। "दीदी, एक तोता आपका भांडा फोड़ने वाला है? ये तो सबसे बेकार खलनायक है। उसे कुछ खिला दो, मिर्ची, बिस्किट, कुछ भी, मुँह बंद कर दो उसका।"
"मैंने उससे डील कर ली है।"
एक पल की चुप्पी। "आपने तोते से डील कर ली।" बोबी ने धीरे से कहा। "दीदी, आप या तो दुनिया की सबसे बड़ी एक्ट्रेस हो, या आपका दिमाग़ हिल गया है। और मुझे डर है दोनों एक ही चीज़ है।"
मिश्री हँसी, और फ़ोन रखते-रखते बोबी ने वही कहा जो वो अब हर रोज़ कहने लगा था। "जल्दी आ जाओ, दीदी। थिएटर आपके बिना अजीब लगता है।" मिश्री ने 'हाँ' कहा, पर अंदर कहीं उसे एहसास हुआ कि ये हवेली अब उतनी अजीब नहीं लग रही थी जितनी पहले दिन लगी थी। और यही सबसे ख़तरनाक बात थी।
उसी सुबह, थोड़ी देर बाद, उसकी मुलाक़ात काका से हुई।
वो रसोई के पीछे वाले आँगन में मिले, जहाँ काका एक छोटी अंगीठी पर कुछ पका रहे थे, और जब मिश्री वहाँ पहुँची तो उन्होंने एक कटोरी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"चखो, बहूरानी," उन्होंने कहा। "बेसन का हलवा। छोटे को बचपन से पसंद था।"
छोटे। मिश्री ने वो शब्द पकड़ा। पूरे घर में सिर्फ़ काका वीर को 'छोटे' कहते थे, उस लड़के का नाम जो वो कभी था।
"आपको कैसे पता ये अब भी इन्हें पसंद है?" मिश्री ने पूछा। "सात साल हो गए।"
काका की झुर्रियाँ मुस्कान में सिमट गईं, पर उनकी आँखें उदास रहीं। "सात साल में आदमी की पसंद नहीं बदलती, बेटा। सिर्फ़ उसे पसंद करने वाले बदल जाते हैं।" उन्होंने हलवा हिलाया। "इस घर ने उसे छोड़ दिया। मैंने नहीं छोड़ा। मैंने उसे गोद में खिलाया है। मुझे आज भी पता है कि वो जो दिखाता है, उसके पीछे क्या है।"
"और उसके पीछे क्या है, काका?"
बूढ़े आदमी ने उसे देखा, बहुत देर तक, और मिश्री को लगा कि वो कुछ कहने वाले हैं। पर फिर उन्होंने सिर हिला दिया।
"जो उसे ख़ुद बताना है, वो मैं नहीं बताऊँगा," उन्होंने कहा। "बस इतना जान लो, बहूरानी। इस घर में जिसे सबसे बुरा कहा जाता है, वो सबसे बुरा नहीं है। और जो सबसे अच्छा दिखता है..." उन्होंने हलवे की कटोरी मिश्री के हाथ में रखी। "खैर। तुम समझदार हो। ख़ुद देख लोगी।"
मिश्री ने वो हलवा लेकर ऊपर कमरे में आई, और वीर वहाँ नहीं था, और कमरा दिन की रोशनी में पहली बार उसे साफ़ दिखा।
ये सिर्फ़ एक कमरा नहीं था। ये एक लड़के का कमरा था जो सात साल पहले रुक गया था।
अलमारी में स्कूल की पुरानी किताबें थीं। दीवार पर एक क्रिकेट टीम का फीका पोस्टर। एक कोने में धूल से ढकी ट्रॉफ़ियाँ, किसी कॉलेज की डिबेट की। ये किसी ने जान-बूझकर वैसा ही छोड़ दिया था, या शायद किसी को इतनी परवाह नहीं थी कि बदलता। मिश्री को नहीं पता था कौन सी बात ज़्यादा दुखद थी।
उसने नाटक की ख़ातिर सफ़ाई शुरू की, क्योंकि एक नई बहू अपने पति का कमरा सँवारती है, और क्योंकि उसके हाथ कुछ करना चाहते थे। और अलमारी के सबसे निचले ख़ाने में, पुरानी किताबों के पीछे, उसका हाथ किसी चीज़ से टकराया।
एक लोहे का छोटा बक्सा। बंद।
और उसके पल्लू में बंधी चाँदी की चाबी, जिस पर फूल खुदा था, उस बक्से के ताले में ऐसे घूमी जैसे वो हमेशा से उसी के लिए बनी थी।
मिश्री के हाथ काँपे। दादी ने उसे ये चाबी क्यों दी थी? क्या दादी को पता था? पर उसने ढक्कन उठा दिया, क्योंकि एक्टर का सबसे बड़ा गुनाह और सबसे बड़ा हुनर एक ही है, उत्सुकता।
बक्से में ज़्यादा कुछ नहीं था। एक बच्चे की ड्रॉइंग, क्रेयॉन से बनी, दो आदमियों की, एक बड़ा एक छोटा, हाथ पकड़े हुए, और नीचे टेढ़े अक्षरों में लिखा था, "पापा और मैं, राठौड़ मिठाई।" और उसके नीचे एक फटा हुआ काग़ज़, क़ानूनी, पीला पड़ा हुआ, आधा जला हुआ जैसे किसी ने उसे आग में फेंका हो और फिर निकाल लिया हो।
मिश्री ने उसे पढ़ा। और कमरे की हवा बदल गई।
वो एक बयान था। पुलिस का। सात साल पुराना। राठौड़ मिष्ठान की पुरानी फ़ैक्ट्री में लगी आग के बारे में, जिसमें लाखों का नुक़सान हुआ था। और उसमें एक नाम था जिसने सब अपने सिर ले लिया था, जिसने लिखकर दिया था कि गलती उसकी थी, लापरवाही उसकी थी, और जिसके बाद उसे घर और कारोबार दोनों से बेदख़ल कर दिया गया था।
वीर राठौड़।
पर काग़ज़ के हाशिये पर, पेंसिल से, किसी और के हाथ की लिखावट में, जो वक़्त के साथ फीकी पड़ गई थी पर मिटी नहीं थी, एक लाइन लिखी थी। और वो लाइन वीर की नहीं थी, क्योंकि वो उसी के बारे में थी।
"इसने झूठ बोला है। आग इसने नहीं लगाई। पर ये किसके लिए चुप है?"
मिश्री ने वो काग़ज़ पकड़े रखा, और उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था, क्योंकि अब उसे समझ आ रहा था कि वो जिस छोटे से झूठ में हाँ कहकर आई थी, बहू बनने का झूठ, वो एक बहुत बड़े झूठ के ऊपर रखा था। वीर ने किसी की आग अपने सिर ली थी। सात साल पहले। और इस घर ने उसे बुरा मान लिया था, और असली गुनहगार अभी भी इसी घर में कहीं था।
और वीर ने उससे एक ही वादा माँगा था। तुम कभी नहीं पूछोगी कि मैं घर क्यों छोड़ गया था।
अब उसे पता था।
दरवाज़ा खुला।
मिश्री ने पलटकर देखा, और वीर दहलीज़ पर खड़ा था, और उसकी नज़र मिश्री के हाथ में पकड़े उस फटे काग़ज़ पर थी, और उसके चेहरे का रंग धीरे-धीरे उतर रहा था।
"वो नीचे रख दो," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, और यही सबसे डरावना था। "अभी।"