अध्याय 7 / 12
दो दुल्हनें
बहू नंबर तीन द्वारा Avni Oberoi
असली दुल्हन हवेली पहुँच जाती है, जबकि नक़ली अंदर है, और मिश्री, वीर और बोबी का एक पागल दिन शुरू होता है, दो दुल्हनों को एक कमरे में आने से रोकने का। नीचे ही नीचे एक दर्द है, मिश्री का टिकट आ गया है, आज़ादी, पैसे, और उसे जाने का दुख हो रहा है, और ये डर कि वो वीर के लिए सिर्फ़ एक रोल थी। पर अनन्या वो नहीं है जो सब समझते हैं। और जब दोनों औरतें आमने-सामने आती हैं, अनन्या एक बात कहती है जो सब कुछ पलट देती है।
"आज रात की ट्रेन से?" वीर का चेहरा सफ़ेद हो गया था। "अगर अनन्या सीधे हवेली आ गई, और पिंकी बुआ या ताऊजी ने दरवाज़ा खोला, और दो अनन्या एक साथ खड़ी हुईं..."
"तो ये पूरा घर ताश के पत्तों की तरह गिर जाएगा," मिश्री ने पूरा किया। "और तुम्हारा सबूत ढूँढने का मौक़ा भी।"
रात का वो पल जो अभी-अभी बीता था, वो बोसा, वो माथे से टिका माथा, सब एक झटके में पीछे चला गया, और उसकी जगह एक ठंडी हक़ीक़त आ गई। असली दुल्हन आ रही थी। और असली दुल्हन के आते ही, नक़ली की ज़रूरत ख़त्म।
मिश्री ने वो ख़याल अपने अंदर बहुत गहरे दबा दिया, वहाँ जहाँ वीर उसे न देख सके।
"हमें उसे स्टेशन पर ही रोकना होगा," उसने कहा, अपनी आवाज़ को संभालते हुए। "इससे पहले कि वो हवेली पहुँचे। मैं और तुम यहाँ से नहीं निकल सकते, सब शक करेंगे। तो..." उसने फ़ोन उठाया।
जयपुर स्टेशन पर, बोबी एक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा था, हाथ में एक तख़्ती जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था "अनन्या सिंघवी", और एक गुलाब का गुलदस्ता जो उसने रास्ते में किसी ठेले से उधार लिया था।
"मैं इस काम के लिए नहीं बना हूँ, दीदी," वो फ़ोन पर फुसफुसाया, इधर-उधर देखते हुए जैसे वो कोई बम निरोधक दस्ते का आदमी हो। "मैं एक लाइट बोर्ड चलाता हूँ। मैं असली दुल्हनों को अगवा करने के लिए ट्रेंड नहीं हूँ।"
"तुम्हें अगवा नहीं करना, बोबी। बस उसे रोकना है, उससे बात करनी है, उसे समझाना है कि सीधे हवेली मत जाए।"
"और अगर वो न माने? अगर वो चिल्लाए? दीदी, मैं डरपोक हूँ, मेरी अपनी परछाईं मुझे डराती है..."
"वो रही," मिश्री ने कहा, क्योंकि वीर ने उसे ट्रेन की जानकारी दे दी थी। "नीली साड़ी। अकेली। बोबी, बस... इंसान बन जा। तेरे अंदर एक हीरो है, मैंने उसे स्टेज पर देखा है।"
"वो रोल था, दीदी!"
"सबसे अच्छे हीरो वही होते हैं जो रोल में हीरो बनते-बनते सच में बन जाते हैं। जा।"
और बोबी, जयपुर का सबसे डरपोक लाइट बोर्ड ऑपरेटर, ने एक गहरी साँस ली, अपनी तख़्ती उठाई, और उस नीली साड़ी वाली औरत की तरफ़ बढ़ा।
"माफ़ कीजिए," उसने गुलदस्ता आगे करते हुए कहा, उसकी आवाज़ एक सुर ऊँची। "क्या आप अनन्या सिंघवी हैं? मैं... मैं आपको लेने आया हूँ। राठौड़ परिवार की तरफ़ से। वेलकम टू जयपुर।"
अनन्या ने गुलदस्ते को देखा, फिर बोबी को, फिर उस तख़्ती को जिस पर उसका नाम लिखा था, और उसकी आँखें सिकुड़ीं। "राठौड़ परिवार ने भेजा है? मेरे आने की तो किसी को ख़बर ही नहीं थी।"
"हाँ... मतलब... सरप्राइज़!" बोबी ने एक कमज़ोर मुस्कान दी। "वो लोग बहुत सरप्राइज़ देने वाले लोग हैं।"
"तुम राठौड़ परिवार से नहीं हो।" अनन्या ने गुलदस्ता नहीं लिया। "तुम्हारी शर्ट पर पेंट के दाग़ हैं, और तुम झूठ इतने बुरे बोलते हो कि या तो तुम बच्चे हो या ईमानदार आदमी। सच बताओ। किसने भेजा?"
और बोबी, जिसके पास झूठ का कोई कवच नहीं था, सिर्फ़ सच का एक घबराया हुआ ढेर, ने वही किया जो वो सबसे अच्छा करता था। वो टूट गया।
"देखिए मैडम, मैं एक लाइट बोर्ड ऑपरेटर हूँ, और आज सुबह तक मेरी सबसे बड़ी समस्या ये थी कि स्टेज की एक बत्ती टिमटिमाती है," उसने एक ही साँस में कहा, "और अब मैं एक स्टेशन पर एक उधार के गुलदस्ते के साथ खड़ा हूँ, एक ऐसी औरत को रोकने जो एक हवेली जा रही है जहाँ एक दूसरी औरत उसका रोल कर रही है, और वो दूसरी औरत मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, और मुझे सच में एक चाय की ज़रूरत है।"
अनन्या ने उसे एक लंबे पल तक देखा। फिर, हैरानी की बात, उसके होंठ के कोने में एक हल्की मुस्कान आई। "चाय," उसने कहा, "मैं पिलाती हूँ। और तुम मुझे सब कुछ बताओगे।"
अगले दो घंटे मिश्री की ज़िंदगी के सबसे लंबे थे।
क्योंकि उसी शाम, जैसी क़िस्मत थी, पिंकी बुआ ने ऐलान कर दिया कि वो नई बहू को लेकर बाज़ार जाएँगी, समारोह की ख़रीदारी, और मिश्री को मुस्कुराते हुए हाँ कहना पड़ा, जबकि उसका फ़ोन हर दो मिनट में बोबी के मैसेज से काँप रहा था।
"वो मान नहीं रही।"
"उसने मुझे चाय पिला दी। उल्टा। मैं उसे रोकने आया था।"
"दीदी ये औरत बहुत तेज़ है। ये पूछ रही है कि तुम कौन हो।"
"दीदी इसने अब मुझे समोसा भी खिला दिया है। मैं confused हूँ कि मैं अगवा कर रहा हूँ या date पर हूँ।"
और बीच-बीच में पिंकी बुआ, "बहू, ये लाल अच्छा रहेगा या गुलाबी? अरे फ़ोन रख, ससुराल में इतना फ़ोन अच्छा नहीं लगता, सास क्या कहेगी? अच्छा सास तो मैं नहीं हूँ, पर बुआ सास तो हूँ ना।"
मिश्री मुस्कुराती रही, हाँ कहती रही, कपड़े चुनती रही, और अंदर से एक रस्सी पर चल रही थी जिसके नीचे कुछ नहीं था।
क्योंकि बाज़ार की उस भीड़ में, लाल और गुलाबी चूड़ियों के बीच, एक बात उसे लगातार चुभ रही थी। कल रात वीर ने उसे चूमा था। पर किसे? मिश्री को, या उस लड़की को जो वो बहू बनकर निभा रही थी? सात दिन से वो एक किरदार जी रही थी, और अब उसे ख़ुद नहीं पता था कि वो बोसा किरदार को मिला था या उसे। और कल तक, असली अनन्या के आते ही, मिश्री इस घर से जा चुकी होगी, पैसे लेकर, अपने टूटे थिएटर वापस। और वीर के पास उसकी असली बीवी होगी, या उसकी अपनी आज़ादी, और दोनों ही तस्वीरों में मिश्री के लिए कोई जगह नहीं थी। वो एक रोल थी। और रोल का काम होता है ख़त्म होना, ताकि असली कहानी शुरू हो सके।
"बहू, कहाँ खो गई?" पिंकी बुआ ने उसका हाथ हिलाया, एक चूड़ियों का सेट उसके सामने करते हुए।
"कहीं नहीं, बुआजी।" मिश्री ने मुस्कुराकर कहा, और सोचा कि उसने ज़िंदगी में हज़ार किरदार निभाए थे, पर 'मैं ठीक हूँ' आज तक का सबसे मुश्किल किरदार था।
रात को, आख़िरकार, वो हुआ जिससे वो बच रही थी।
बोबी अनन्या को हवेली के पीछे वाले पुराने बाग़ तक ले आया, चुपके से, उस हिस्से में जहाँ कोई नहीं आता था, और मिश्री वहाँ पहुँची, अकेली, और पहली बार उस औरत के सामने खड़ी हुई जिसकी ज़िंदगी वो एक हफ़्ते से जी रही थी।
अनन्या सिंघवी सुंदर थी, शांत थी, और उसकी आँखों में वो थकान थी जो डर से नहीं, लड़ने से आती है।
दोनों एक-दूसरे को देखती रहीं। एक नाम, दो चेहरे।
"तो तुम हो," अनन्या ने आख़िरकार कहा। "वो जो मेरी जगह खड़ी है।"
"मुझे माफ़ कर दो," मिश्री ने कहा, और ये सच था। "मुझे नहीं पता था, शुरू में, कि ये कितना बड़ा है। मुझे बस पैसे चाहिए थे। पर अब... देखो, अगर तुम चाहो तो मैं अभी चली जाऊँ। ये तुम्हारी जगह है। तुम्हारा परिवार, तुम्हारा..." उसका गला रुका। "तुम्हारा पति।"
अनन्या ने उसे ध्यान से देखा, और उसके चेहरे पर एक अजीब सी, थकी हुई मुस्कान आई।
"मेरा पति।" उसने वो शब्द ऐसे दोहराया जैसे वो किसी और भाषा का हो। "तुम्हें लगता है मैं वीर से शादी न करके भागी क्योंकि मुझे वीर से डर था?" उसने सिर हिलाया। "मैं वीर को जानती तक नहीं। वो रिश्ता हमारे परिवारों ने तय किया था, फ़ोन पर, जैसे कोई सौदा हो। और हाँ, मेरा एक कारण और था भागने का, कोई और था जिसे मैं... ख़ैर, वो अलग कहानी है।" उसकी आवाज़ नरम हुई, फिर वापस सख़्त। "पर मैं उस वजह से नहीं भागी।"
मिश्री ने महसूस किया कि बाग़ की हवा बदल गई है।
"फिर क्यों?" उसने पूछा।
अनन्या उसके क़रीब आई, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, उस तरह जैसे कोई कोई ख़तरनाक बात कहने से पहले होती है।
"क्योंकि शादी से पहले, जब मैं इस घर को समझने आई थी, तो मैंने कुछ देख लिया। युवराज के बारे में। वो इस परिवार के साथ क्या कर रहा है। काग़ज़, दस्तख़त, ये पूरी हवेली। मैंने उससे एक सवाल पूछा, बस एक, और उस रात मेरे होटल के कमरे में कोई आया था। कुछ नहीं हुआ, बस एक चेतावनी। 'घर लौट जाओ, बेटी। चुपचाप।'" उसने मिश्री की आँखों में देखा। "तो मैं भाग गई। डर के मारे। और मैंने सोचा कि बच गई।"
बाग़ में कहीं एक मोर बोला, और वो आवाज़ अचानक बहुत अकेली लगी।
"पर फिर मुझे पता चला," अनन्या ने कहा, "कि किसी और लड़की को मेरी जगह खड़ा कर दिया गया है। एक अजनबी। तुम। और मैं वापस आई, इस घर में, उसी ख़तरे में, सिर्फ़ तुम्हें ये बताने।" उसने मिश्री का हाथ पकड़ा, और उसकी पकड़ ठंडी थी और मज़बूत थी। "मैं वीर से नहीं भागी थी, मिश्री। मैं युवराज से भागी थी, उससे जो वो इस घर के साथ कर रहा है। और तुम..." उसकी आवाज़ काँपी। "तुम ठीक वहीं खड़ी हो जहाँ उस रात मैं खड़ी थी।"